अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ दक्षस्मृति ॥
स्नेहपैशुन्यमात्सर्यं सन्निकर्षान्नसंशयः ॥ ४१ ॥
लाभपूजानिमित्तं हि व्याख्यानं शिष्यसंग्रहः ।
एते चान्ये च बहवः प्रपञ्चास्तु तपस्विनाम् ॥ ४२ ॥
ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता ।
भिक्षोश्चत्वारिकर्माणि पञ्चमंनोपपद्यते ॥ ४३ ॥
यस्मिन्देशे वसेद्योगी ध्यानयोगविचक्षणः ।
सोऽपि देशो भवेत्पूतः किं पुनस्तस्य बान्धवाः ॥ ४४ ॥
तपोजपैः कृशीभूत्वा व्याधितावसथार्हणः ।
वृद्धारोगगृहीताश्च ये चान्ये विकलेन्द्रियाः ॥ ४५ ॥
नारुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथार्हतः ।
संदूषयति तत्स्थानं वृद्धादीन्पीडयत्यपि ॥ ४६ ॥
नीरुजश्च युवा चैव ब्रह्मचर्याद्विनश्यति ।
प्रेम की बाते, चुगली की चर्चा, निन्दा स्तुति, मत्सरता, ये राज वार्त्तादि कई के मिलने से अवश्य निःसन्देह होती हैं ॥ ४१ ॥ उपदेश व्याख्यान करना कथा सुनाना और बहुत शिष्यों को रखना, इन इत्यादि कामों को संन्यासी लोग धन वस्त्रादि का लाभ और प्रशंसा प्रतिष्ठा होने के लिये करते हैं । सो ऐसे अन्य भी बहुत प्रपञ्च तपस्वी लोगोंको अधोगति में गिराते हैं ॥ ४२ ॥ ध्यान करना, शुद्धि करना, भिक्षा मांगकर खाना, और सब से पृथक् एकान्त में ठहरने का स्वभाव, संन्यासी के ये चार कर्म मुख्य तथा नित्य कर्त्तव्य हैं पांचवां सिद्ध नहीं होता ॥ ४३ ॥ ध्यान योगाभ्यास करने में चतुर योगी संन्यासी जिस देश में बसता है। वह देश भी जब पवित्र होजाता है तब उसके कुटुम्बी लोग पवित्र क्यों न होंगे ? ॥ ४४ ॥ तप तथा जप करनेसे कृश हल्के शरीर वाले होके जो रोगी हो गये हैं वे किसी छये पटे घर में निवास करें। तथा जो वृद्ध हों, रोग से युक्त हों और जो लूले, लंगड़े, अन्धे आदि हो गये हों वेभी किसी घर में बसें ॥ ४५ ॥
जो रोगसे हीन युवा अवस्था का संन्यासी हो वह घर में बसाने योग्य नहीं है। वह उस स्थान को दोष युक्त करता और वृद्ध आदि को दुःख देता है ॥ ४६ ॥ रोग हीन और युवा अवस्था का भिक्षु ब्रह्मचर्य से नष्ट हो जाता