अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३३
अध्यात्मदण्डयुक्तोयः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३४ ॥
वाग्दण्डोऽथमनोदण्डः कर्मदण्डश्चतेत्रयः ।
यस्यैतेतुत्रयोदण्डाः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३५ ॥
त्रिदण्डव्यपदेशेन जीवन्तिबहवोनराः ।
यस्तुब्रह्म नजानाति नत्रिदण्डीहिसस्मृतः ॥ ३६ ॥
नाध्येतव्यंन वक्तव्यं नश्रोतव्यंकथञ्चन ।
एतैः सर्वैःसुसंपन्नोयतिर्भवतिनेतरः ॥ ३७ ॥
पारिव्राज्यंगृहीत्वातु यःस्वधर्मेनतिष्ठति ।
श्वपदेनाङ्कयित्वातं राजाशीघ्रंप्रवासयेत् ॥ ३८ ॥
एकोभिक्षुर्यथोक्तस्तु द्वौभिक्षुमिथुनंस्मृतम् ।
त्रयोग्रामःसमाख्यात ऊर्ध्वंतुनगरायते ॥ ३९ ॥
नगरंहिनकर्त्तव्यं ग्रामोवामिथुनंतथा ।
एतत्त्रयंप्रकुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवतेयतिः ॥ ४० ॥
राजवार्त्तादितेषांतु भिक्षावार्त्तापरस्परम् ।
त्रिदण्डी नहीं कहाता किन्तु अध्यात्म विचार से काम क्रोध लोभ को पकड़ के वश में रखने ते त्रिदण्डी कहाता है ॥३४॥ तथा द्वितीय प्रकार यह है कि वाणी, मन, और शरीर को दण्ड के समान पकड़ के वश में रखने से भी संन्यासी त्रिदण्डी कहाता है ॥३५॥ त्रिदण्ड के बहाने से कि हम त्रिदण्डी संन्यासी सर्वमान्य जगद्गुरु हैं ऐसा प्रसिद्ध करते हुए बहुत से साधु जीविका करते हैं परन्तु जो ब्रह्म को नहीं जानता वह त्रिदंडी ( संन्यासी ) नहीं है ॥ ३६ ॥ न पढ़े न उपदेश व्याख्यान करे, न कथा उपदेशादि सुने किन्तु इन से जो युक्त हो वही संन्यासी है अन्य नहीं ॥ ३७ ॥ जो संन्यास लेकर अपने धर्म पर स्थिर न रहे उस के मस्तक पर कुत्ते के पग का दाग देकर शीघ्र ही राजा देश से निकलवा देवे ॥ ३८ ॥ संन्यासी अकेला रहे तो ठीक उचित है दो मिलकर रहे तो मिथुन कहाते हैं । तीन मनुष्यों के संगम को ग्राम कहते हैं इस से अधिकों का संग नगर कहाता है ॥ ३९ ॥ इस से संन्यासी ग्राम नगर दोनों ही को त्यागे और किसी दूसरे को भी साथ न रक्खे दूसरे का साथी होना मिथुन है । इन तीन को जो संन्यासी करता है वह अपने धर्म से पतित हो जाता है ॥४०॥ क्योंकि एक से अधिक दो आदि के मिलने से राजा की अथवा भिक्षा की बातें परस्पर होती हैं ।