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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्थसहिता ॥ ३३

अध्यात्मदण्डयुक्तोयः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३४ ॥
वाग्दण्डोऽथमनोदण्डः कर्मदण्डश्चतेत्रयः ।
यस्यैतेतुत्रयोदण्डाः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३५ ॥
त्रिदण्डव्यपदेशेन जीवन्तिबहवोनराः ।
यस्तुब्रह्म नजानाति नत्रिदण्डीहिसस्मृतः ॥ ३६ ॥
नाध्येतव्यंन वक्तव्यं नश्रोतव्यंकथञ्चन ।
एतैः सर्वैःसुसंपन्नोयतिर्भवतिनेतरः ॥ ३७ ॥
पारिव्राज्यंगृहीत्वातु यःस्वधर्मेनतिष्ठति ।
श्वपदेनाङ्कयित्वातं राजाशीघ्रंप्रवासयेत् ॥ ३८ ॥
एकोभिक्षुर्यथोक्तस्तु द्वौभिक्षुमिथुनंस्मृतम् ।
त्रयोग्रामःसमाख्यात ऊर्ध्वंतुनगरायते ॥ ३९ ॥
नगरंहिनकर्त्तव्यं ग्रामोवामिथुनंतथा ।
एतत्त्रयंप्रकुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवतेयतिः ॥ ४० ॥
राजवार्त्तादितेषांतु भिक्षावार्त्तापरस्परम् ।


त्रिदण्डी नहीं कहाता किन्तु अध्यात्म विचार से काम क्रोध लोभ को पकड़ के वश में रखने ते त्रिदण्डी कहाता है ॥३४॥ तथा द्वितीय प्रकार यह है कि वाणी, मन, और शरीर को दण्ड के समान पकड़ के वश में रखने से भी संन्यासी त्रिदण्डी कहाता है ॥३५॥ त्रिदण्ड के बहाने से कि हम त्रिदण्डी संन्यासी सर्वमान्य जगद्गुरु हैं ऐसा प्रसिद्ध करते हुए बहुत से साधु जीविका करते हैं परन्तु जो ब्रह्म को नहीं जानता वह त्रिदंडी ( संन्यासी ) नहीं है ॥ ३६ ॥ न पढ़े न उपदेश व्याख्यान करे, न कथा उपदेशादि सुने किन्तु इन से जो युक्त हो वही संन्यासी है अन्य नहीं ॥ ३७ ॥ जो संन्यास लेकर अपने धर्म पर स्थिर न रहे उस के मस्तक पर कुत्ते के पग का दाग देकर शीघ्र ही राजा देश से निकलवा देवे ॥ ३८ ॥ संन्यासी अकेला रहे तो ठीक उचित है दो मिलकर रहे तो मिथुन कहाते हैं । तीन मनुष्यों के संगम को ग्राम कहते हैं इस से अधिकों का संग नगर कहाता है ॥ ३९ ॥ इस से संन्यासी ग्राम नगर दोनों ही को त्यागे और किसी दूसरे को भी साथ न रक्खे दूसरे का साथी होना मिथुन है । इन तीन को जो संन्यासी करता है वह अपने धर्म से पतित हो जाता है ॥४०॥ क्योंकि एक से अधिक दो आदि के मिलने से राजा की अथवा भिक्षा की बातें परस्पर होती हैं ।

३४ दक्षस्मृति ॥

स्नेहपैशुन्यमात्सर्यं सन्निकर्षान्नसंशयः ॥ ४१ ॥
लाभपूजानिमित्तं हि व्याख्यानं शिष्यसंग्रहः ।
एते चान्ये च बहवः प्रपञ्चास्तु तपस्विनाम् ॥ ४२ ॥
ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता ।
भिक्षोश्चत्वारिकर्माणि पञ्चमंनोपपद्यते ॥ ४३ ॥
यस्मिन्देशे वसेद्योगी ध्यानयोगविचक्षणः ।
सोऽपि देशो भवेत्पूतः किं पुनस्तस्य बान्धवाः ॥ ४४ ॥
तपोजपैः कृशीभूत्वा व्याधितावसथार्हणः ।
वृद्धारोगगृहीताश्च ये चान्ये विकलेन्द्रियाः ॥ ४५ ॥
नारुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथार्हतः ।
संदूषयति तत्स्थानं वृद्धादीन्पीडयत्यपि ॥ ४६ ॥
नीरुजश्च युवा चैव ब्रह्मचर्याद्विनश्यति ।


प्रेम की बाते, चुगली की चर्चा, निन्दा स्तुति, मत्सरता, ये राज वार्त्तादि कई के मिलने से अवश्य निःसन्देह होती हैं ॥ ४१ ॥ उपदेश व्याख्यान करना कथा सुनाना और बहुत शिष्यों को रखना, इन इत्यादि कामों को संन्यासी लोग धन वस्त्रादि का लाभ और प्रशंसा प्रतिष्ठा होने के लिये करते हैं । सो ऐसे अन्य भी बहुत प्रपञ्च तपस्वी लोगोंको अधोगति में गिराते हैं ॥ ४२ ॥ ध्यान करना, शुद्धि करना, भिक्षा मांगकर खाना, और सब से पृथक् एकान्त में ठहरने का स्वभाव, संन्यासी के ये चार कर्म मुख्य तथा नित्य कर्त्तव्य हैं पांचवां सिद्ध नहीं होता ॥ ४३ ॥ ध्यान योगाभ्यास करने में चतुर योगी संन्यासी जिस देश में बसता है। वह देश भी जब पवित्र होजाता है तब उसके कुटुम्बी लोग पवित्र क्यों न होंगे ? ॥ ४४ ॥ तप तथा जप करनेसे कृश हल्के शरीर वाले होके जो रोगी हो गये हैं वे किसी छये पटे घर में निवास करें। तथा जो वृद्ध हों, रोग से युक्त हों और जो लूले, लंगड़े, अन्धे आदि हो गये हों वेभी किसी घर में बसें ॥ ४५ ॥

जो रोगसे हीन युवा अवस्था का संन्यासी हो वह घर में बसाने योग्य नहीं है। वह उस स्थान को दोष युक्त करता और वृद्ध आदि को दुःख देता है ॥ ४६ ॥ रोग हीन और युवा अवस्था का भिक्षु ब्रह्मचर्य से नष्ट हो जाता

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३५

ब्रह्मचर्याद्विनष्टश्च कुलगोत्रंचनाशयेत् ॥ ४७ ॥
वसन्नावसथेभिक्षुर्मैथुनंयदिसेवते ।
तस्यावसथनाशःस्यात्कुलान्यपिनिकृन्तति ॥ ४८ ॥
आश्रमेतुयतिर्यस्य मुहूर्तर्मापविश्रमेत् ।
किंतस्यान्येनधर्मेण कृतकृत्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥
संचितंयदगृहस्थेन पापमामरणान्तिकम् ।
निर्दहत्येवतत्सर्वमेकरात्रोषितोयतिः ॥ ५० ॥
अध्वश्रमपरिश्रान्तं यस्तुभोजयतेयतिम् ।
अखिलंभोजितंतेन त्रैलोक्यंसचराचरम् ॥ ५१ ॥
द्वैतंचैवतथाद्वैतं द्वैताद्वैतंतथैवच ।
नद्वैतं नापिचाद्वैत मित्येतत्पारमार्थिकम् ॥ ५२ ॥
नाहंनैवतुसंबंधो ब्रह्मभावेनभावितः ।
ईदृशायांत्ववस्थायामवाप्तं परंमपदम् ॥ ५३ ॥
द्वैतपक्षःसमाख्यातो यद्वै तेतुव्यवस्थिताः ।


है। ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट हुआ अपने कुल और गोत्र को भी नष्ट करदेता है ॥४७॥ किसी के घरमें बसता हुआ संन्यासी यदि मैथुन करे तो-उस घर के स्वामी को और कुलों को जड़मूल से नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ जिस के आश्रम में शुद्ध संन्यासी मुहूर्त मात्र दो घड़ी भी विश्राम करे, उसको अन्य धर्म के करने से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि वह उस के विश्राम से ही कृतकृत्य हो जाता है ॥ ॥४९॥ अपने देह में गृहस्थ पुरुष ने जो पाप जन्मभर में संचय (इकट्ठा) किया है ॥ उस सब को एक रात भर बसा हुआ भी यति नष्ट कर ही देता है ॥५०॥ मार्ग में चलने के परिश्रम से श्रांत (थके) हुए यति संन्यासी को जो जिमाता है। उस ने जानो चर अचर सब त्रिलोकी को जिमादिया ॥ ५१ ॥ द्वैत ( दो जीव ब्रह्म वा प्रकृति पुरुष को पृथक् २ देखना ), अद्वैत ( केवल एक ब्रह्म को देखना ) द्वैत, अद्वैत, दोनों को संसार परमार्थ भेद से ठीक मानना ये तीन पक्ष हैं। न द्वैत है और न अद्वैत है यही पारमार्थिक ( सच्चा ) ज्ञान है ॥ ५२ ॥ न मैं कोई हूं और न मेरा कुछ है न मेरा किसी से संबंध है किन्तु मैं ब्रह्म रूप हूं ऐसी अवस्था में परम पद प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥ जो द्वैत विचार में स्थित हैं उन के लिये द्वैत पक्ष कहा गया है। अद्वैत पक्ष वालों का

३६ दक्षस्मृतिः ॥

अद्वैतानांप्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रस्यनिश्चयः ॥ ५४ ॥
अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंयोनपश्यति ।
अतःशास्त्राण्यधीयन्ते श्रूयन्तेग्रन्थविस्तराः ॥ ५५ ॥
दक्षशास्त्रेयथाप्रोक्तमाश्रमप्रतिपालनम् ।
अधीयन्तेतुयेविप्रास्तेयान्त्यमरलोकताम् ॥ ५६ ॥
इदंतुयःपठेद्भक्त्या श्रृणुयादपियोनरः ।
सपुत्रपौत्रपशुमान् कीर्त्तिंचसमवाप्नुयात् ॥ ५७ ॥
श्रावयित्वात्विदंशास्त्रं श्राद्धकालेऽपियोद्विजः ।
अक्षय्यंभवतित्छ्राद्धं पितॄंश्चैवोपतिष्ठते ॥ ५८ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इति दक्षस्मृतिः समाप्ता ॥


शास्त्रानुसार जैसा निश्चय है उस को कहते हैं ॥ ५४ ॥ इस अद्वैत विषय में जो अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता इसी से शास्त्रों को पढ़ते और ग्रन्थों के विस्तारों को सुनते हैं ॥ ५५ ॥ दक्ष ऋषि के इस धर्म शास्त्र में कहे आश्रमों के धर्म का प्रतिपालन करते और जो ब्राह्मण इस धर्म शास्त्र को पढ़ते हैं वे देवलोक को प्राप्त होते हैं ॥ ५६ ॥ जो इस शास्त्र को भक्ति से पढ़े अथवा जो अधम वर्ण भी इस को सुने वह मनुष्य पुत्र पौत्र और पशु-ओं वाला होकर कीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ श्राद्ध के समय इस शास्त्र को जो द्विज सुनाता है। उस का श्राद्ध अक्षय फलदायी होता और पितरों को श्राद्ध का फल प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥

यह दक्षस्मृति के पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ और यह स्मृति भी समाप्त हुई ॥

अथ गौतमस्मृतिप्रारम्भः

वेदो धर्ममूलं तद्विदां च स्मृतिशीले ॥१॥ दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महतां नतु दृष्टोऽर्थोऽवरदौर्बल्यात्तुल्यबलविरोघे विकल्पः ॥२॥ उपनयनं ब्राह्मणस्याष्टमे नवमे पंचमे वा काम्यं गर्भादिः संख्यावर्षाणां तद्द्वितीयं जन्म ॥३॥ तद्यस्मात्स आचार्यों वेदानुवचनाच्च ॥ ४ ॥ एकादशद्वादशयोः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ५ ॥ आषोडशाद्ब्राह्मणस्यापतिता सावित्री द्वाविंशतेराजन्यस्य द्व्यधिकाया वैश्यस्य ॥६ ॥ मौञ्जीज्यामौर्वी सौत्र्यो मेखलाः क्रमेण कृष्णरुरुबस्ताजिनानि


भाषार्थः—धर्मका मूल वेद है और वेदको जानने वाले मनु आदि महर्षियों के स्मृति और स्वभाव भी धर्मके मूल हैं ॥ १ ॥ धर्मका व्यतिक्रम (कुछ का कुछ हो जाना) और धर्मबाधक साहस [बिना विचारे काम करना] भी देखा जाता है। परन्तु महापुरुषों के विचार से दृष्टार्थ (जिस का फल इसी लोक में हो) धर्म उत्तम नही है। दृष्टार्थ अदृष्टार्थ दोनों में तुल्य बल विरोध प्रतीत हो तो अवर नाम दृष्टार्थ के निर्बल होने से अदृष्टार्थ को मुख्य जानो ॥ २ ॥ ब्राह्मण का यज्ञोपवीत गर्भस्थिति के समय से आठवें वा नववें वर्ष में करना चाहिये। यदि ब्रह्मतेज की कामना से उपनयन करना होय तो पांचवें वर्ष में करे। वर्षों की गिनती सर्वत्र गर्भसे लेनी चाहिये। यज्ञोपवीत संस्कार दूसरा जन्म है ॥ ३ ॥ द्वितीय जन्मका दाता आचार्य है। वेद पढ़ाने से भी आचार्य द्वितीय जन्म का पिता है ॥ ४ ॥ ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत करना चाहिये ॥ ५ ॥ सोलह वर्ष तक ब्राह्मण बाईस वर्ष तक क्षत्रिय और चौबीस वर्ष तक वैश्य सावित्री नाम अपने २ गुरु मन्त्र से पतित नहीं होते अर्थात् मन्त्रोपदेश के गौण अधिकारी रहते हैं ॥ ६ ॥ ब्राह्मण की मूंज की क्षत्रिय की मूर्वा नामक घास की

२ गौतमस्मृति ॥

वासांसि शाणक्षौमचीरकुतपाः सर्वेषां कार्पासं चाविकृतम् ॥ ७ ॥ काषायमप्येके ॥ ८ ॥ वार्क्षं ब्राह्मणस्य माञ्जिष्ठहारिद्रे इतरयोः ॥ ९ ॥ बैल्वपालाशौ ब्राह्मणस्य दण्डौ ॥१०॥ आश्वत्थपैलवौ शेषे ॥ ११ ॥ यज्ञिया वा सर्वेषाम् ॥ १२ ॥ अपीडितायूपवक्राः सबल्कला मूर्द्धललाटनासाग्रप्रमाणा मुण्डजटिलशिखाजटाश्च ॥ १३ ॥ द्रव्यहस्तउच्छिष्टोऽनिधायाचामेत् ॥ १४ ॥ द्रव्यशुद्धिः परिमार्जनप्रदाहतक्षणनिर्णेजनानि तैजसमार्त्तिकदारवतान्र्तवानाम् ॥ १५ ॥ तैजसवदुपलमणिशंखशुक्तीनां दारुवदस्थिभूम्योरावपनं च

और वैश्य ब्रह्मचारी की सूत की मेखला नाम कन्धनी बनावे। काले मृग का रुरुमृग का, और बकरे का चर्म, शण अलसी, और पहाड़ी ऊन के वस्त्र क्रम से हों अथवा कोई आचार्य यह कहते हैं कि तीनों वर्षों के ब्रह्मचारियों को कपासके नवीन वस्त्र हों ॥ ७ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि गेरूंमें रंगे वस्त्र सब ब्रह्मचारी धारण करें ॥ ८ ॥ वृक्ष की बल्कल का खाखी वा बदामी सुनहरी रंग का वस्त्र ब्राह्मण ब्रह्मचारी का, मजीठ का लाल रंग क्षत्रिय का और हल्दी का पीला रंग वैश्य ब्रह्मचारी के वस्त्रों का होना चाहिये ॥ ९ ॥ बेल वा ढांक का दण्ड ब्राह्मण का हो ॥ १० ॥ पीपल का क्षत्रिय और पीलू [ जाल वृक्ष ] का दण्ड वैश्य ब्रह्मचारी धारण करे ॥ ११ ॥ अथवा सब वर्णों के ब्रह्मचारी किसी यज्ञिय वृक्ष का दण्ड धारण करें ॥ १२ ॥ और वे तीनों दण्ड फटे टूटे नहीं वा यज्ञके यूपस्तम्भ कीसी बनावट के हों, बल्कल सहित हों, ब्राह्मण का दण्ड मूर्द्धा तक, क्षत्रिय का मस्तक तक और वैश्य का नासिका तक प्रमाण का हो, और तीनों ब्रह्मचारी मुण्ड, जटिल, अथवा केवल शिखामात्रजटा रखने वाले हों ॥ १३ ॥ यदि कोई द्रव्य (वस्तु) हाथ में होय और उच्छिष्ट हो जाय तो उस को नीचे रक्खे विना ही आचमन करे ॥ १४ ॥ अब द्रव्यों की शुद्धि कहते हैं-तेजस् धातु के पात्रों की मांजने धोने से, मट्टी के पात्रों की फिर अग्नि में पकाने से, लकड़ी के पात्रों की छीलने से, और सूत के वस्त्रों की पखोरने से शुद्धि होती है ॥ १५ ॥ पत्थर, मणि (मूंगा) शंख, सीपी, इन की शुद्धि तेजस (धातु) के समान मांजने धोने से होती है। हड्डी से बने पदार्थों और भूमिकी शुद्धि काष्ठ के समान छीलने से होती है।

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३

भूमेरश्चै लवद्रज्जुविदलचर्म्मणामुत्सर्गो ऽवात्यन्तोपहतानाम्। १६ प्राङ्मुखउदङ्मुखो वा शौचमारभेत् ॥ १७ ॥ शुचौ देश आसीनो दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा कृत्वा यज्ञोपवीत्यामणि- बन्धनात्पाणी प्रक्षाल्य वाग्यतो हृदयस्पृशस्त्रिश्चतुर्वाऽप- आचामेद् द्विःपरिमृज्यात्पादौ चाभ्युक्षेत् खानिचोपस्पृशे- च्छीर्षण्णानि मूर्द्धनि च दद्यात् ॥ १८ ॥ सुप्त्वा भुक्त्वा क्षुत्वा चपुनः ॥ १९ ॥ दन्तश्लिष्टेषु दन्तवदन्यत्र जिह्वा भिमर्शनात् प्राक्च्युतेरित्येके ॥ २० ॥ च्युतेरास्राववद्विद्यान्निगिरन्नेवत- च्छुचिः ॥ २१॥ न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्ति ताश्चेदङ्- गे निपतन्ति ॥ २२॥ लेपगन्धापकर्षणे शौचममेध्यस्य ॥२३॥ तदद्भिः पूर्वं मृदा च मूत्रपुरीषरेतोविसंसनाभ्यवहारसंयोगेषु


भूमि की शुद्धि जोतने से भी होती है। रस्सी बिदल (बांस के पात्र) तथा चर्म पात्रों की शुद्धि वस्त्रों के समान पछारने से होती है। यदि ये सब अत्यन्त भ्रष्ट हो गये हों तो त्याग देवे ॥ १६ ॥ पूर्व को वा उत्तर को मुख करके शौच (मल मूत्र के त्याग) का प्रारंभ करै ॥१७॥ अब आचमन करने की विधि कहते हैं कि शुद्ध देश में बैठा दहिनी भुजा को गोड़ों के बीच करके सव्य यज्ञोपवीत धारण किये हुये गट्टों (पहुंचो) तक दोनों हाथ धोकर मौन हुआ जो हृदय तक पहुंचे इतने जल से तीन वा चार वार आचमन करै पश्चात् दो बार मुख को शुद्ध करै और पगों को भी धोवे। शिर के आंखें, नाक, कान, मुख इन सातों छिद्रों का स्पर्श करै और मूर्द्धा पर भी जल का मार्जन करै ॥ १८ ॥ शयन, भोजन, करके तथा छींक कर फिर आचमन और इन्द्रिय स्पर्श करै ॥१९॥ यदि जिह्वा से स्पर्श न हो तो दांतों में लगा अन्नादि दांतों के समान अशुद्ध नहीं है। कोई आचार्य यह कहते हैं कि जब तक दांतों से पृथक् न हो तब तक दांतों के समान है ॥ २० ॥ और दांतों से पृथक् होने पर आस्राव (मुख से जल गिरना) के समान है इस से उस को निगल लेने पर शुद्ध हो जाता है ॥ २१ ॥ जो मुख के जल की बूंद वा छींटें अपने अंग पर गिरें तो वे अशुद्ध नहीं करतीं ॥ २२ ॥ अशुद्ध वस्तु का लेप और गन्ध दूर कर देने पर अशुद्ध वस्तु के लगी अशुद्धि निवृत्त हो जाती है ॥ २३ ॥ उस अशुद्ध वस्तु को प्रथम

४ गौतमस्मृतिः ॥

च यत्र चाम्नायो विदध्यात् ॥ २४ ॥ पाणिना सव्यमुपसंगृ- ह्याऽङ्गुष्ठमधीहि भोइत्यामन्त्रयेत गुरुः ॥ २५ ॥ तत्र चक्षुर्मनः प्राणोपस्पर्शनं दर्भैःप्राणायामास्त्रयः पञ्चदशमात्राः प्राक्कूले- ष्वासनं च ओंपूर्वा व्याहृतयः पञ्चसप्तान्ताः ॥ २६ ॥ गुरोः पा- दोपसंग्रहणं प्रातर्ब्रह्मानुवचने चाद्यन्तयोरनुज्ञातउपविशेत् ॥२७॥ प्राङ्मुखो दक्षिणतः शिष्य उदङ्मुखो वा सावित्रीं चानु- वचनमादितो ब्राह्मण आदाने ओंकारस्यांन्यत्रापि ॥ २८ ॥ अन्तरागमने पुनरुपसदनंश्वनकुलमण्डूकसर्प्पमार्ज्जाराणां त्र्यहमुपवासो विप्रवासश्च ॥ २९ ॥ प्राणायामा घृतप्राशनं


जल से धो कर फिर मट्टी से मांज कर जल से धोवे । यदि मूत्र, विष्ठा लग- जाय वा वीर्य स्खलित हो जाय वा अशुद्ध वस्तु खालेवे इन में जहां वेद वा स्मृतियों में जैसी शुद्धि कही हो वहां वैसी ही मट्टी जल से शुद्धि करे ॥ २४॥ अपने हाथ से शिष्य का दाहिने हाथ का अंगूठा पकड़ कर भोः शिष्य ! तूं पढ़ ऐसे गुरु बुलावे ॥ २५ ॥ शिष्य जब गुरु के पास वेद पढ़ने को बैठे उस से पहिले आंखें हृदय और नासिका का कुशों से मार्जन करे फिर पूर्व को जिन का अग्रभाग हो ऐसे कुश विछा कर उन पर बैठ कर से गुरु मुख से वेद पढ़ने के समय वा अन्यत्र वेदाध्ययन के आरम्भ में अथवा ओंकार के जप के प्रारम्भ में पन्द्रह अंगुल तक जिन के श्वास वायु की गति हो ऐसे तीन प्राणायाम करे फिर (प्रणव) ओं पूर्वक पांच वा सात व्याहृतियों का उ- च्चारण करे ॥ २६ ॥ प्रातःकाल वेद पढ़ाने के आरम्भ तथा समाप्ति समय शि- ष्य खड़ा होकर गुरु के पगों का स्पर्श (व्यत्यस्त हाथों से जिस में दहिने हाथ से दहिना पग और वाम से बांया छुआ जाय) करके खड़ा रहे और गुरु आज्ञा देवें तब बैठ जावे ॥ २७ ॥ गुरु से दक्षिण ओर पूर्व अथवा उत्तर को मुख करके शिष्य बैठ कर प्रथम प्रणव व्याहृति सहित गायत्री मन्त्र का उच्चारण करे ॥ २८ ॥ यदि वेदाध्ययन के समय कुत्ता, न्योला, मेंढक सांप, विलाव, ये जीव गुरुशिष्य के बीच से निकल जायं तो ब्राह्मण वेदपढ़ना रोक देवे तथा तीन दिन बन में रहकर उपवास करे ॥२९॥ क्षत्रिय और वैश्य

भाषाधर्मसंहिता ॥ ५

चेतरेषाम् ॥ ३०॥ श्मशानाध्ययने चैवम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीगौतमीये धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

प्रागुपनयनात्कामचारवादभक्षोऽहुतोऽब्रह्मचारी यथोपपादंमूत्रपुरीषो भवति नास्याचमनकल्पो विद्यतेऽन्यत्रापमार्ज्जनप्रधावनावोक्षणेभ्यो न तदुपस्पर्शनादशौचं नत्वेवैनमग्निहवनबलिवरणयोर्नियुञ्ज्यान्न ब्रह्माभिव्याहारयेदन्यत्र स्वधानिनयनात् ॥ १ ॥ उपनयनादिनियमः ॥ २॥ उक्तं ब्रह्मचर्यमग्नीन्धनभैक्षचरणे सत्यवचनमपामुपस्पर्शनम् ॥ ३ ॥

प्राणायाम करके घृत को चाटै ॥३०॥ श्मशान (मरघट) के समीप वेद पढ़ने में भी यही प्रायश्चित्त करै ॥ ३१ ॥

यह गौतम स्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

यज्ञोपवीत से पहिले बाल्यावस्था में बातचीत करने, बोलने, और भोजन में कामचार है (धर्म शास्त्र के अनुसार नियम नहीं) होम और ब्रह्मचर्य के नियम भी उस बालक के लिये नहीं हैं। चाहे जैसे चाहे जिस ओर मुख करके मूत्र पुरीष (मल मूत्र का त्याग) करै । आचमन की रीति भी इस बालक के लिये नहीं है। किन्तु मार्जन करना हाथ पग आदि धोना, और भूमिपर जल को छिड़क के भोजनादि करना उस को भी उचित है । और उस अशुद्ध बालक के स्पर्श से अशुद्धि भी नहीं लगती, इस बालक को अग्निहोत्र तथा वैश्वदेव करने में भी न लगावै । और स्वधानिनयन (पिंडदान) के बिना वेद मन्त्रों का उच्चारण भी यज्ञोपवीत से पहिले बालक को न करावै अर्थात् ब्राह्मणादि द्विजों के बालक भी यज्ञोपवीत संस्कार से पहिले शूद्र के तुल्य होते हैं इससे उनको वेद मन्त्र न पढ़ावे न बुलवावै किन्तु स्मृति पुराणादि में लिखे स्तोत्र मन्त्रादि भले ही पढ़ावे और यदि उपनयन से पहिले पिता मर जावै तो वही असंस्कृत पुत्र वेद मन्त्रों द्वारा होने वाले अपने पिता के और्ध्वदेहिक श्राद्ध को करे वहाँ वेद मन्त्रोच्चारण में उसको दोष नहीं लगेगा यही बात मनु० अ० २।१३२ में कही है ॥ १ ॥ यज्ञोपवीत के आरम्भ से द्विज बालक के लिये धर्मशास्त्र में कहे सब नियम हैं ॥ २ ॥ पूर्व कहा ब्रह्मचर्य, अग्नि का प्रज्वालन (समिदाधान) भिक्षा मांगना, सच बोलना, जल से मार्जन आचमनादि करना, उपनयन के पश्चात इन सब को नियम से करे ॥ ३ ॥

६ गौतमस्मृतिः ॥

एके गोदानादि ॥ ४ ॥ बहिः संध्यार्थंचातिष्ठेत्पूर्वा मातीतो- त्तरां सज्योतिष्याज्योतिषोदर्शनाद्वाग्यतोनादित्यमीक्षेत ॥ ५ ॥ वर्जयेन्मधुमांसगन्धमाल्यदिवास्वप्नाञ्जनाभ्यञ्जनया- नोपानच्छत्रकामक्रोधलोभमोह वाद्यवादनस्नानदन्तधावन- हर्षनृत्यगीतपरिवादभयानि गुरुदर्शने कर्णप्रावृतावसक्थिका- याश्रयणपादप्रसारणानि निष्ठीवितहसितविजृम्भितास्फोट- नानिस्त्रीप्रेक्षणालम्भने मैथुनशंकायां द्यूतं हीनसेवामदत्तादानं हिंसामाचार्यतत्पुत्रस्त्रीदीक्षितनामानिशुष्कां वाचं मदं नित्यं ब्राह्मणः ॥६॥ अधःशय्याशायी पूर्वोत्थायी जघन्यसंवेशी वा- ग्बाहूदरसंयतः ॥७॥ नामगोत्रे गुरोः संमानतो निर्द्दिशेत् ॥८॥

कोई आचार्य्य इन नियमों को गोदान ( १६ सोलह आदि वर्षों में होने वाले केशान्त) संस्कार से आगे कहते हैं ॥ ४ ॥ संध्या के लिये ग्राम से बाहर जाय प्रातःकाल की पहिली संध्या सूर्यके दीखने समय तक खड़े होकर करे और सायंकाल की सूर्य दीखने समय से तारागणों के उदय होने तक बैठ के करे। दोनों सन्ध्या मौन होकर करे और सूर्यनारायण को न देखें ॥ ५ ॥ मदिरा, शहद, मांस, सुगन्ध, (इतर फुलेल आदि लगाना) फूलमाला, दिन में सोना, आंखों में अंजन सुरमा लगाना, शरीर में तैल मलना, यान (सवारी पर च- ढ़ना,) जूता, छत्री, काम, क्रोध, लोभ, मोह, बाजे (सितार आदि) बजाना, जल में धस कर स्नान करना, दातौन, हर्ष (आनन्द मानना,) नाचना, गाना, किसी की निन्दा, और भय इन मदिरा आदि सब को ब्रह्मचारी छोड़ देवे । गुरु के देखते कानों को बांधना वा शिर कण्ठ में कपड़ा लपेटना, गोड़े उठाकर बैठना, पग फैलाना, थूकना, हंसना, जंभाई लेना, आस्फोटन (किसी अंग को हाथ से बजाना) ताली बजाना, मैथुन की शंका के लिये स्त्रीको देखना व स्पर्श कर- ना, जुआ खेलना, नीच की सेवा करना, बिना दिये किसी के वस्तु को लेना, हिंसा करना, आचार्य और गुरु के पुत्र, स्त्री और दीक्षित इन का नाम लेना, सूखी कठोर वाणी बोलना, और भांगादि नशा पीना इन कर्मों को भी ब्रा- ह्मण ब्रह्मचारी नित्य ही त्याग देवै ॥ ६ ॥ गुरु से नीचे भूमि पर सोवे, गुरु से पहिले उठे, गुरु के बैठ जाने पर पीछे बैठे, लेट जाने पर लेटे, वाणी, भु- जा, और उदर इन को वश में रक्खे ॥७॥ गुरु का वा उनके गोत्र का नाम जब कभी उच्चारण करने पड़े तो सम्मान सूचक श्रीमान् आदि शब्द लगा के बोले ॥८॥

भाषार्थसहिता ॥ ९

अर्च्चिते श्रेयसि चैवम् ॥ ९ ॥ शय्यासनस्थानानि वि- हाय प्रतिश्रवणमभिक्रमणं वचनं नादृष्टेनाधःस्थानासनस्ति- र्यग्वा तत्सेवायाम् ॥ १० ॥ गुरुदर्शने चोत्तिष्ठेत्, गच्छन्तमनु- व्रजेत्, कर्म्म विज्ञाप्याख्यायाऽहूताध्यायी युक्तः प्रियहितयो- स्तद्भार्यापुत्रेषु चैवम् ॥ ११ ॥ नोच्छिष्टाशनस्नपनप्रसाधन- पादप्रक्षालनोन्मर्द्दनोपसंग्रहणानि ॥ १२ ॥ विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणां तत्पुत्रस्य च ॥ १३ ॥ नैके युवतीनाम् ॥ १४ ॥ व्यवहारप्राप्तेन सार्व्ववर्णिकं भैक्षचरणमभिशस्तपतितवर्ज्जम् ॥ १५॥ आदिमध्यान्तेषु भवच्छब्दः प्रयोज्यो वर्णानुपूर्व्येण॥१६॥


इसी प्रकार पूजा सत्कार के योग्य श्रेष्ठ उत्तम मान्य पुरुषों का नाम लेने में भी आचरण करे ॥ ९ ॥ गुरु जी जब कुछ कहें तब शय्या, आसन, और स्थान को छोड़के समीप जा कर गुरु के वचन को सुने किन्तु शय्यादि पर बैठा २ बात न करे। यदि गुरु जी खड़े हों तो उनके इधर उधर चलता हुआ बात करे, गुरु से अदृष्ट छिपा हुआ न बोले, गुरु से नीचे स्थलमें खड़ा हो वा बैठे, गुरु की सेवा में तिरछा भी न बैठा रहे ॥ १० ॥ गुरु के देखने पर खड़ा होजाय, और गुरुजी टहलने लगें तो पीछे २ चल, कोई भी काम हो गुरु को जता कर वा कह कर करे बिना पूछे कुछ न करे। गुरु जब पढ़ने को बुलावें तब नम्रता से समीप बैठ के पढ़ाकरे। गुरु का प्रिय और हित करने में तत्पर रहै। गुरु के स्त्री पुत्रों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव करे ॥ ११॥ उच्छिष्ट भोजन, स्नान कराना, प्रसाधन (श्रृंगार करना) पग धोना, शरीर मलना, वा उबटना, पगों का स्पर्श, ये काम गुरु की स्त्री पुत्रों के कभी न करे ॥ १२॥ जब परदेश से आवे तब गुरुपत्नियों और गुरुपुत्रों के भी पगों का स्पर्श करे ॥ १३ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि युवति गुरुपत्नी के पाद् स्पर्श न करे ॥ १४ ॥ व्यवहार (न्याय) से प्राप्त हुये वस्तु की भिक्षा सब वर्णों से मांग लेवे परन्तु हिंसक वा निन्दित और पतितों को छोड़देवे ॥ १५ ॥ ब्राह्मण के यहां भिक्षा मांगे तब (भवति ! भिक्षां देहि) क्षत्रिय के घर पर (भिक्षां भवति ! देहि) और वैश्यके घर में भिक्षा मांगने को जावे तब (भिक्षां देहि भवति !) ऐसा वाक्य कहे ॥ १६ ॥

८ | गौतमस्मृतिः ॥

आचार्यज्ञातिगुरुष्वेव्वलाभेडन्यत्र॥१७॥ तेषां पूर्वं पूर्वं परिह- रन्निवेद्य गुरवेऽनुज्ञातो भुञ्जीत ॥ १८ ॥ असंनिधौ तद्भार्या- पुत्रसब्रह्मचारिसद्भ्यः ॥ १९ ॥ वाग्यतस्तृप्यन्नलोलुप्यमान- स्सन्निधायोदकं स्पृशेत् ॥ २० ॥ शिष्यशिष्टिरवधेनाशक्तौ रज्जुवेणुविदलाभ्यां तनुभ्यामन्येन घ्नन् राज्ञा शास्यः ॥२१॥ द्वादशवर्षाण्येकैकवेदे ब्रह्मचर्य्यं चरेत् प्रतिद्वादशसु सर्वेषु ग्रहणान्तं वा ॥२२॥ विद्यान्ते गुरुमर्थेन निमन्त्र्यः ॥२३॥ ततः कृतानुज्ञातस्य स्नानम् ॥ २४ ॥ आचार्यः श्रेष्ठो गुरूणां मा- तेत्येके ॥ २५ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


यदि आचार्य, अपने कुटुम्बी और जगत् में विशेष मान्य गुरु लोग इन से अन्यत्र निर्वाह योग्य भिक्षा मिल जाय तो इनके घरों से न मांगे ॥ १७ ॥ यदि अन्यत्र भिक्षा न मिले तो भी आचार्यादि पहिले २ को छोड़के अगले २ के घर से मांगे, फिर भिक्षा के अन्न का गुरु के समीप निवेदन कर उन की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१८॥ यदि गुरू जी कहीं गये हों, समीपमें न हों तो गुरुपत्नी, गुरुपुत्र, संग पढ़नेवाले ब्रह्मचारी, और कोई सज्जन पुरुष इनके समीप निवेदन करके भोग लगावे ॥ १९ ॥ प्रथम भोजन को समीप रख कर जल से आचमन करे तब मौन हो कर चंचलता को छोड़ के तृप्त होता हुआ भोजन करे ॥२०॥ गुरु शिष्यको ऐसी ताड़ना करे जिससे वध (हिंसा) नहो, और गुरु अशक्त असमर्थ बीमार होतो छोटे २ रस्सी, बेंत, बांस, से धीरे २ शिक्षा करें जिससे अधिक चोट न लगे। यदि अन्य बड़े कठोर दण्ड से मारे तो राजा गुरुको दण्ड देवे ॥२१॥ एक २ वेदके पढ़नेमें बारह २ वर्ष ब्रह्मचर्य धारण करें। अथवा प्रत्येक बारह वर्ष में जब तक एक २ वेद को पढ़ सके तब तक ब्रह्मचारी रहे ॥ २२ ॥ और विद्या पढ़ने की समाप्ति में धनादि देने के लिये गुरू से प्रार्थना करे कि भगवन् ! आज्ञा कीजिये क्या दक्षिणा उपस्थित करूं ॥२३॥ तदनन्तर गुरुकी आज्ञासे ही गृहस्थाश्रम के लिये समावर्त्तन स्नान करे ॥२४॥ सम्पूर्ण गुरुओं में आचार्य (उपनयन कराके साङ्ग वेद पढ़ाने वाला गुरु) श्रेष्ठ हे और कोई महर्षि लोग माता को श्रेष्ठ कहते मानते हैं ॥ २५ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में द्वितीय अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

भाषाधर्मसंहिता ॥

तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते ब्रह्मचारी गृहस्थो भिक्षुर्वैखानस इति तेषां गृहस्थो योनिरप्रजनत्वादितरेषाम् ॥ १ ॥
तत्रोक्तं ब्रह्मचारिण आचार्य्याधीनत्वमात्रं गुरोः कर्म्मशेषेण जपेत्, गुर्वभावे तदपत्यवृत्तिस्तदभावे वृद्धे सब्रह्मचारिण्यग्नौ वा ॥२॥
एवं वृत्तो ब्रह्मलोकमेवाप्नोति जितेन्द्रियः॥३॥
उत्तरेषां चेतदविरोधी अनिचयो भिक्षुरूर्ध्वरेता ध्रुवशोली वर्षासु भिक्षार्थी ग्राममियात् ॥४॥
जघन्यनिवृत्तं चरेन् ॥५॥
निवृत्ताशीर्वाक्चक्षुः कर्म्मसंयतः॥६॥
कौपीनाच्छादनार्थं वासो बिभृयात्


कोई आचार्य ब्रह्मचारी के इस प्रकार आश्रमों का विकल्प कहते हैं कि वह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु (संन्यासी) वैखानस (वानप्रस्थ) इन गृहस्थादि तीनों आश्रमों को स्वीकार करे अथवा निम्न प्रकार जन्म भर केवल ब्रह्मचर्याश्रम ही रक्खे। इन सब आश्रमों का गृहस्थ मूल है क्योंकि अन्य तीनों में सन्तान नहीं होते, गृहस्थ से ही उत्पन्न हो २ के ब्रह्मचारी आदि बनते हैं। इससे गृहस्थ सब का मूल है ॥१॥

और उस प्रथम मुख्य आश्रम में ब्रह्मचारी को आचार्य की आधीनता सेवा करना मात्र ही मुख्य कर्म है। गुरु सेवा के कामों से जितना अवकाश मिले उसमें वेद पाठ वा गायत्री का जप करे। गुरु के स्वर्गवास होने पर सुपात्र हों तो गुरुपुत्रों की सेवा में रहे। उनके भी अभाव में अपने से वृद्ध साधर्मी ब्रह्मचारी की वा अग्नि की सेवा जन्म भर करे ॥२॥

ऐसा बर्ताव करता हुआ ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होने से ब्रह्मलोक को ही प्राप्त होता है ॥३॥

और ब्रह्मचारी का यह काम अगले तीनों [गृहस्थ, भिक्षु, वैखानस] का विरोधी नहीं है। ब्रह्मचारी अन्नादि का संचय न करे, ऊर्द्धरेता [वीर्य जिस का मस्तक तक चढ़ गया हो इस से नीचे को कदापि न गिरे मस्तक में परमोत्तम शक्ति बढ़ जाय] भिक्षा मांग कर खाया करे, वर्षाकाल में ध्रुवशील (चले फिरे नहीं एक स्थान में) रहे, केवल भिक्षा के लिये ग्राम में जावे ॥४॥

नीचों को छोड़ कर उत्तमों से भिक्षा मांगे ॥ ५ ॥

किसी से आशीर्वाद न चाहे, वाणी, नेत्र, अपने हाथ, पांव, आदि को वश में रक्खे चंचल न करे ॥६॥

कौपीन, और केवल ओढ़नेके वस्त्रको धारणकरे ॥७॥

१० गौतमस्मृतिः ॥

॥७॥ प्रहीणमेके निर्णेजनाविवृधुक्तम् ॥८॥ ओषधिवनस्पतीना- मङ्गमपाददीत ॥९॥ न द्वितीयामपहर्तुं रात्रिं ग्रामे वसेत् ॥ १० ॥ मुण्डः शिखी वा वर्ज्जयेज्जीववधम् ॥ ११ ॥ समो भूतेषु हिंसानुग्रहयारनार्थी ॥१२॥ वैखानसो वने मूलफला- शी तपःशीलः श्रामणकेनाग्निमाधायाग्राम्यभोजी देवपितृ- मनुष्यभूतर्षिपूजकः सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्ज्जं भैक्षमप्युप- युञ्जीत न फालकृष्टमधितिष्ठेत्, ग्रामं च न प्रविशेत्, जटि- लश्चीराजिनवासा नातिशयं भुञ्जीत ॥ १३ ॥ ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद्गार्हस्थ्यस्य ॥ १४ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥


कोई आचार्य कहते हैं कि गुरु के पुराने वस्त्रों को धारण करे जो निर्मल सफेद न हों और धोबी से धुलाये न हों, किन्तु खाकी आदि हों ॥ ८ ॥ अथवा ओषधी वा वनस्पतियों के वक्कल वा पत्ते आदि के वस्त्र बनावे। अथवा इस सूत्र का द्वितीयार्थ यह हो सकता है कि ओषधि वनस्पतियों के कन्द, मूल, फलादि खाके निर्वाह करे भिक्षा भी न मांगे ॥ ९ ॥ दूसरी बार भिक्षा के लिये रात को ग्राम में न बसे ॥ १० ॥ शिर के सब बाल मुंडाया करे, अथवा केवल चोटी रक्खे, जीवों की हिंसा न करे ॥ ११ ॥ सब प्राणियों पर सम उदासीन दृष्टि रक्खे, न किसी को दुःख देवे, और न किसी पर अधिक दया वा कृपा करे। स्वयं दुःख भी न माने न हर्ष माने ॥१२॥ वानप्रस्थ के धर्म ये हैं कि वन में रहता हुआ मूल वा फल खावे, परिश्रम के साथ पंचाग्नि ताप करे, तपस्वी हो, ग्राम का भोजन न करे, पञ्चमहायज्ञां द्वारा देव, पितर, मनुष्य, ( अतिथि ) ऋषि इन को पूजे, और सबका अतिथि के तुल्य आदर करे, निषिद्धों ( निन्दित शूद्रादि वा दुराचारियों ) को छोड़कर भिक्षा को भी मांग ले, जोते हुए खेत में न बैठे, वा निवास न करे, जोतने से जो पैदा हो उस अन्न को न खावे, ग्राम में भी प्रवेश न करे, वा न बसे, जटाओं को धारण करे, शिर के बाल न मुंडावे । चीर नाम फटे पुराने चिथरे वा मृग चर्म के वस्त्र रक्खे, भोजन में अधिक अन्न वा फलादि को न खावे ॥१३॥ वेद में गृहस्थ का प्रत्यक्ष विधान होने से कोई २ आचार्य लोग यह कहते हैं कि एक गृहस्थाश्रम ही रक्खे बानप्रस्थादि न बने ॥ १४ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥

भाषासंहिता ॥ ११

गृहस्थः सदृशीं भार्यां विन्देतानन्यपूर्वां यवीयसीम् ॥१॥

असमानप्रवरैर्विवाहं ऊर्ध्वं सप्तमात् पितृबन्धुभ्यो बीजिन- श्च मातृबन्धुभ्यः पञ्चमात् ॥ २ ॥ ब्राह्मो विद्याचारित्रबन्धु- शीलसंपन्नाय दद्यादाच्छाद्यालङ्कृतां संयोगमन्त्रः प्राजाप- त्ये सह धर्मं चरतामिति, आर्षे गोमिथुनं कन्यावते दद्या- दन्तर्वेद्यृत्विजे दानं दैवोऽलङ्कृत्येच्छन्त्याः स्वयं संयोगो गान्धर्व्वो वित्तेनानतिक्रीमतामासुरः प्रसह्यादानाद्राक्ष- सोऽसंविज्ञातोपसंगमनात्पैशाचः ॥ ३ ॥ चत्वारो धर्म्याः प्रथमाः षडित्येके ॥ ४ ॥


गृहस्थ पुरुष ऐसी स्त्री को विवाहै जो अपने समान उत्तम कुल की हो, जिस की किसी के साथ सगाई न हुई हो, जो ठीक युवती हो ॥ १ ॥ जो अपने प्रवर की न हो, अथवा यदि अपने प्रवरों की भी हो तो पितृकुल की सातवीं से ऊपर पुत्रवाली पीढ़ी की हो, और मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी से ऊपर की कन्या से विवाह होसकता है ॥ २ ॥ विद्यावान्, सदाचारी, भाई बंधु वाले सीधे सच्चे स्वभाव वाले, वर को जो कन्या देना वह पहिला ब्राह्म विवाह है। कपड़ों से आच्छादन और भूषणों से शोभित करके (सह धर्मं चरताम् । तुम दोनों संग संग धर्म करो) ऐसा कह कर जो कन्या दी जाय वह दूसरा प्राजापत्य विवाह है। कन्या के पिता को एक गौ एक बैल वा उन का मूल्य देकर जो कन्या विवाही जाय वह तीसरा आर्ष विवाह है। वेदी के भीतर यज्ञ कर्म करते हुए ऋत्विज् वर को आभूषणों से युक्त कन्या को देना वह चौथा दैव विवाह है। परस्पर स्वयं कन्या की इच्छा से जो दोनों का संयोग हो वह पांचवां गांधर्व विवाह है। कम कन्यावाले मनुष्य को यथाशक्ति धन देकर जो विवाह करे वह छठा आसुर विवाह है। बल पूर्वक मार पीट कर जो कन्या को ले आना वह सातवां राक्षस विवाह है। अज्ञान (बेहोश नशादि खाके पागल हुई) कन्या के साथ संयोग करे वह आठवां पैशाच विवाह है ॥३॥ इन आठों में ब्राह्मण के लिये पहिले चार धर्मानुकूल कर्त्तव्य हैं। कोई आचार्य पहिले छः विवाहों को धर्मानुसार कर्त्तव्य कहते मानते हैं ॥ ४ ॥

१२ गौतमस्मृतिः ॥

अनुलोमानन्तरेकान्तरद्व्यन्तरासु जाताः सवर्णाम्बष्ठो- ग्रनिषाददौष्मन्तपारशवाः ॥ ५ ॥ प्रतिलोमासु सूतमाग- धायोगवक्षत्रवैदेहकचाण्डालाः ॥ ६ ॥ ब्राह्मण्यजीजनत्पु- त्रान् वर्णेभ्य आनुपूर्व्यात् , ब्राह्मणसूतमागधचाण्डालान् , तेभ्यएव क्षत्रिया मूर्द्धावसिक्तक्षत्रियधीवरपुल्कसान् ,तेभ्यएव वैश्या भृज्जकण्टकमाहिष्यवैश्यवैदेहान् ,तेभ्यएव पारशवयव नकरणशूद्रान् शूद्रेत्येके ॥७॥ वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमेन पञ्चमेन चाचार्याः ॥८॥ सृष्ट्यन्तरजातानां च प्रति-


जिस सन्तान की उत्पत्ति में उत्तम वर्ण का पिता तथा नीचे वर्ण की माता हो वह अनुलोम उत्पत्ति होगी । ब्राह्मण पुरुष से ब्राह्मणी कन्या में अनुलोम अनन्तर हुआ सन्तान ब्राह्मण ही होगा । ब्राह्मण से एक के अन्तर पर वैश्य कन्या में हुआ सन्तान अम्बष्ठ, क्षत्रिय से एक के अन्तर पर शूद्र की कन्या में हुआ उग्र, ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में हुआ निषाद ब्राह्मण से उग्र कन्या में दौष्मन्त और ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में पारशव होता है। ये वर्णसंकर अनुलोम से होते हैं ॥ ५ ॥

अब प्रतिलोम नाम नीच वर्ण से उत्तम वर्ण की कन्या में होने वालों को दिखाते हैं — क्षत्रिय से ब्राह्मणा की कन्या में हुआ सूत, वैश्य से क्षत्रिय की कन्या में हुआ मागध, शूद्र से वैश्य की कन्या में हुआ आयोगव, शूद्र पुरुष से क्षत्रिय की कन्या में क्षत्ता, वैश्य से ब्राह्मण की कन्या में वैदेहक, और शूद्र से ब्राह्मण की कन्या में हुआ चाण्डाल वर्णसंकर होता है ॥ ६ ॥

ब्राह्मण की कन्या ब्राह्मणी ब्राह्मण पति से ब्राह्मण को, क्षत्रिय से सूत को, वैश्य से मागध को और शूद्र से चाण्डाल को उत्पन्न करती है । क्षत्रिय की कन्या क्षत्राणी, ब्राह्मण से मूर्द्धाभिषिक्त, क्षत्रिय से क्षत्रिय, वैश्य से धीवर, और शूद्र से पुक्कस वा पुल्कस को उत्पन्न करती है । वैश्य की कन्या ब्राह्मण से भृज्जकण्टक, क्षत्रिय से माहिष्य, वैश्य से वैश्य और शूद्र से वैदेह को उत्पन्न करती है । शूद्रकन्या, ब्राह्मण से पारशव, क्षत्रिय से यवन, वैश्य से करण और शूद्र से शूद्र को उत्पन्न करती है यह किन्ही आचार्यों का मत है ॥ ७ ॥

अनेक आचार्यों का मत यह है कि सातवीं वा पांचवीं पीढ़ी के साथ वर्णसंकर पुरुष अपने पिता की जाति में ऊंच वा नीच हो जाता है ॥८॥

और सृष्ट्यन्तर नाम वर्णसंकरों से जो वर्णसंकर जाति पैदा होतीं वे भी सातवीं वा पांचवीं पीढ़ी

भाषाभाष्यसहिता ॥ १३

लोमास्तु धर्म्महीनाः शूद्रायां चासमानायां च शूद्रात्पति-
तवृत्तिरन्त्यः पापिष्ठः ॥ ९ ॥ पुनन्ति साधवः पुत्रास्त्रिपौरुषा-
नार्षाद्दश दैवाद्दशैव प्राजापत्याद्दशपूर्वान्दशापरानात्मानं
च ब्राह्मीपुत्रा ब्राह्मीपुत्राः ॥ १० ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

ऋतावुपेयात् सर्वत्र वा प्रतिषिद्धवर्जम् ॥१॥ देवपितृमनु-
ष्यभूतर्षिपूजको नित्यस्वाध्यायः ॥ २ ॥ पितृभ्यश्चोदकदानं
यथोत्साहमन्यद्भार्यादिरग्निदीयादिर्वा ॥३॥ तस्मिन् गृह्या-
णि देवपितृमनुष्ययज्ञाः स्वाध्यायश्च ॥ ४ ॥ बलिकर्म्मा-


में अपने २ पिता की जाति में हो जाती हैं। नीच पिता से उत्तम कुल की स्त्री में तथा उत्तम से भी शूद्र कन्या में पैदा हुए धर्महीन होते, उनको धर्म का अधिकार नहीं है । और शूद्र पिता से वैश्यादि की कन्या में होने वाले वर्णसंकर अन्त्यज अत्यन्त पापी और पतित होते हैं ॥ ९ ॥ विधिपूर्वक हुए आर्ष विवाह से सवर्णा स्त्री में उत्पन्न अच्छे सुपुत्र कुल के दीपक साधु पुरुष अपनी तीन पीढ़ी को तार देते हैं। दैव विवाह से तथा प्राजापत्य विवाह से हुआ पुत्र अपने कुल की दश पीढ़ियों को तारने वाला होता और ब्राह्म विवाह से हुए पुत्र दश पिछली और दश अगली पीढ़ियों को तथा अपने को तारने वाले होते हैं ॥ १० ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥

गृहस्थ पुरुष ऋतुकाल में वा ऋतु से भिन्न दिनों में भी निषिद्ध (ऋतु में पहिले चार ग्यारहवें और तेरहवें दिन को तथा अमावस्या, अष्टमी, पौर्णमासी और चतुर्दशी इन निषिद्ध तिथियों को सब दशा में छोड़ के) दिनों को छोड़ के विवाहित पत्नी से समागम करे ॥ १॥ पञ्च महायज्ञों द्वारा देव, पितर, मनुष्य (अतिथि) भूत, ऋषि, इनकी पूजा नित्य करे और नित्य वेदाध्ययन करे ॥ २ ॥ पितरों का जल देना रूप तर्पण नित्य करे । यथाशक्ति यथोत्साह भार्या, और अग्नि आदि की रक्षा करे । असमर्थ रोगी आदि होता अपने दायाद (वारिसों) द्वारा देवपूजनादि करावे ॥ ३ ॥ उस स्थापन किये गृह्याग्नि में अपने शाखा सूत्रानुसार गुह्य कर्म करे । नित्य २ देव, पितृ, और मनुष्य यज्ञ तथा—स्वाध्याय नाम ब्रह्मयज्ञ करे ॥ ४ ॥ अग्निकुण्ड के समीप में बलिकर्म—भूत यज्ञ

१४ गौतमस्मृतिः ॥

अग्निर्धन्वन्तरिविश्वेदेवाः प्रजापतिः स्विष्टकृदिति होमः ॥ ५ ॥ दिग्देवताभ्यश्च यथा स्वद्वारेषु मरुद्भ्यो गृहदेवताभ्यः प्रविश्य ब्रह्मणे मध्ये अद्भ्य उदकुम्भे आकाशायेत्यन्तरिक्षे नक्तञ्चरेभ्यश्च सायम् ॥ ६ ॥ स्वस्ति वाच्य भिक्षादानं प्रश्नपूर्वं तु ददातिषु चैवं धर्मेषु ॥७॥ समद्विगुणसाहस्रानन्त्यानि फलान्यब्राह्मणब्राह्मणश्रोत्रियवेदपारगेभ्यः ॥८॥ गुर्वर्थनिवेशौषधार्थवृत्तिक्षीणयक्ष्यमाणाध्ययनाध्वसंयोगवैश्वजितेषु द्रव्यसंविभागो, बहिर्वेदि भिक्षमाणेषु कृतान्नमितरेषु ॥९॥


करे । देवयज्ञ में अग्नि, धन्वन्तरि, विश्वेदेव, प्रजापति, और स्विष्टकृत इन नामों से अग्नि में हविष्यान्न की पांच आहुति देवे जैसे ( १-अग्नये स्वाहा । २-धन्वन्तरये स्वाहा । ३—विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ४—प्रजापतये स्वाहा । ५-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ) ॥ ५ ॥ फिर भूतयज्ञ में पूर्वादि दिशाओं के इन्द्रादि देवताओं के लिये प्रदक्षिण क्रम से बलि देकर द्वार पर मरुत् देवता के लिये, फिर गृह देवताओं के लिये रंधे हुए कोष्ठ के बीच में ब्रह्मा के लिये, जल के कुम्भस्थान पर अप् देवता के लिये, आकाश के लिये, अन्तरिक्ष में दिखा के और सायंकाल के बलि कर्म में नक्तंचर देवताओं के लिये बलि धरे ॥ ६ ॥ ( इन का विशेष विधान पञ्चमहायज्ञ पद्धति में देखिये ) बुलाके ( स्वस्ति ) ऐसा कहना कर भिक्षा देवे । और इस प्रकार के सभी दान धर्म सुपात्र को अपने यहां सम्मान पूर्वक बुलाकर दिया करे ॥ ७ ॥ ब्राह्मण से भिन्न क्षत्रियादि को भोजनादि दान देने का दान की बराबर फल होता, गुण कर्म हीन मूर्ख ब्राह्मण को देने का द्विगुणा फल, वेद पाठी श्रोत्रिय को देने का हज़ार गुणा फल और वेद पारग ( जिस ने सब वेदों को आद्योपान्त पढ़ा जाना हो ऐसे वेदतत्वार्थ वेत्ता ) को दान देनेका अनन्त फल होता है ॥ ८ ॥ गुरू के लिये, किसी ब्राह्मण का घर बनाने के लिये, औषध करने के लिये, जो जीविका के बिना दुःखी हो उस को, यज्ञ करने वाले को, वेदादि शास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थी को, मुसाफिर को, और विश्वजित् यज्ञ के कर्त्ता को, इन सब को वा उन २ कामों के निमित्त धन का दान देना चाहिये । यज्ञ के समय ऋत्विजों को वेदि के भीतर दक्षिणा देकर

भाषार्थसहिता ॥ १५

प्रतिश्रुत्याप्यधर्म्मसंयुक्ताय न दद्यात् ॥१०॥ क्रुद्धहृष्टभीतातर्त्त-
लुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृतान्यपातकानि ॥११॥
भोजयेत्पूर्वमतिथिकुमारव्याधितगर्भिणीसुवासिनीस्थविरा-
न् जघन्यांश्च ॥ १२ ॥ आचार्य्यपितृसखीनां च निवेद्य व-
चनक्रिया ऋत्विगाचार्य्यश्वशुरपितृव्यमातुलानामुपस्थाने
मधुपर्कः संवत्सरे पुनःपूजिता यज्ञविवाहयोरर्वाग्राज्ञश्च
श्रोत्रियस्य ॥ १३॥ अश्रोत्रियस्यासनोदके श्रोत्रियस्य तु पा-
द्यमर्घ्यमन्नविशेषांश्च प्रकारयेन्नित्यं वा संस्कारविशिष्टं
मध्यतोऽन्नदानमवैद्ये साधुवृत्ते विपरीते तु तृणोदकभूमिः


मांगने वालों को वेदि से बाहर यथाशक्ति देवे तथा अन्य दीन दुःखियों को पूड़ी मिठाई आदि पक्वान्न देना चाहिये ॥ ९॥ अधर्मी को प्रतिज्ञा करने पर भी कुछ नहीं देना चाहिये ॥ १० ॥ क्रोधी, अतिहर्ष में मग्न, भयभीत, दुःख में निमग्न, लोभी, बालक, वृद्ध, अज्ञानी ( बेसमझ, ) नशाबाज, पागल, इन को मिथ्या बोलने पर पाप नहीं लगता है ॥ ११ ॥ गृहस्थ पुरुष पञ्चमहायज्ञों के पश्चात् पहिले अतिथि, बालक, रोगी, गर्भिणी स्त्री, विवाहिता पुत्री, और वृद्ध पुरुष बाया आदि तथा छोट भाई आदि इन सब को भोजन कराके तब पीछे स्वयं खावे ॥ १२ ॥ गुरु, पिता, और मित्र इन से निवेदन करे कि भोजन तय्यार है । तब जैसी आज्ञा आचार्य्य आदि करें वैसा करे अर्थात् इन की आज्ञा लेकर भोजन करे । ऋत्विज्, आचार्य, श्वशुर, चाचा, मामा, ये लोग अकस्मात् आवें तो मधुपर्क से पूजन करे । प्रत्येक वर्ष में कई बार मिलें तो यज्ञ और विवाह से भिन्न एक ही बार मधुपर्क विधि से पूजे । यज्ञ में ऋत्विजों का और विवाह में वर का मधुपर्क विधि से पूजन करे । राजा और श्रोत्रिय ( वेदपाठी ) का भी मधुपर्क विधि से पूजन करे ॥ १३ ॥ अन्य वेदाङ्गादि पढ़े विद्वान् का आसन और जलादि से सत्कार करे और श्रोत्रिय का तो पाद्य अर्घ्य और उत्तमोत्तम भोजनादि से भी सत्कार करे । अथवा उत्तम संस्कारों से सिद्ध किये अन्न के बीच में से लेके नित्य ही गृहस्थ पुरुष अन्न का दान किसी सुपात्र ब्राह्मण को वा वैद्य से भिन्न सदाचारी पुरुष को देवे । कोई साधारण मनुष्य आवे तो भी ठहरने की जगह, बैठने को आसन, और जल

१६ गौतमस्मृतिः ॥

स्वागतमन्ततः पूज्यानत्याशश्च शय्यासनावसथानुव्रज्योपा- सनानिसदृक्श्रेयसोः समान्यल्पशोऽपि हीने असमानग्रामोऽति थिरेकरात्रिकोऽधिवृक्षसूर्योपस्थायी कुशलानामयक्षेमारोग्या- णामनुप्रश्नोऽन्त्यशूद्रस्याब्राह्मणस्यानतिथिर्ब्राह्मणो यज्ञे स- वृत्तरचेद् भोजनं तु क्षत्रियस्योर्ध्वं ब्राह्मणेभ्योऽन्यान् भृत्यैः सहानृशंसार्थमानृशंसार्थम् ॥ १४ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

पादोपसंग्रहणं गुरुसमवायेऽन्वहम् ॥ १ ॥ अभिगम्य तु विप्रो ऽथ मातृपितृतद्बन्धूनां पूर्वजानां विद्यागुरूणां तत्तद्गुरूणां

और स्वागत करे । पूज्य पुरुष का भूल से आदर न कर पावे तो भोजन न करे । शय्या (खटिया वा तख्त,) आसन, घर की कोई कोठरी ठहरने को, पीछे२ चल के पधारना, पास बैठकर प्रेम से बातें करना, इन कामों को (आयु विद्यादि में) अपने बराबर वाले और अपने से बड़े श्रेष्ठ मनुष्य में एकसे ही करे और जो अपने से अवस्थादि में कुछ छोटा भी अतिथि हो उसका भी शय्यादि द्वारा बड़े के तुल्य सत्कार करे। जो अपने गांव से भिन्न गांव का रहने वाला हो और एक रातभर ही (जिस के घर जावे वहां) निवास करे, और वृक्षों के नीचे रहता हो, सूर्यनारायण का उपस्थान करे वह अतिथि कहाता है। ऐसे अतिथि के आने पश्चात् ब्राह्मण हो तो कुशल है ? क्षत्रिय हो तो अनामय है ? वैश्य हो तो क्षेम है ? और शूद्र हो तो आरोग्य है ? ऐसे वाक्यों से पूछे। ब्राह्मण से भिन्न किसी नीच वा शूद्र के यज्ञ में वरण कि हुआ ब्राह्मण भी किसी के यहां अतिथि नहीं माना जायगा । यदि ब्राह्मण के घर पर क्षत्रिय अतिथि आया हो तो ब्राह्मणों के भोजन कर लेने पर उस को भोजन करावे और अन्य वैश्यादि अतिथि आये हों तो दयाधर्म का पालन करने के लिये भृत्यों के साथ उनको भी भोजन करावे ॥ १४ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥

गुरु के सम्बन्ध में गुरु निकट हों तो नित्य २ उनके पादस्पर्श करे ॥ १ ॥ और परदेश से आकर माता, पिता, मामा, चाचा, ज्येष्ठभ्राता, इन सब को संमुख आकर पादस्पर्श पूर्वक अभिवादन करे। तथा विद्या पढ़ानेवाले गुरु, ओर