अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ५
चेतरेषाम् ॥ ३०॥ श्मशानाध्ययने चैवम् ॥ ३१ ॥
इति श्रीगौतमीये धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
प्रागुपनयनात्कामचारवादभक्षोऽहुतोऽब्रह्मचारी यथोपपादंमूत्रपुरीषो भवति नास्याचमनकल्पो विद्यतेऽन्यत्रापमार्ज्जनप्रधावनावोक्षणेभ्यो न तदुपस्पर्शनादशौचं नत्वेवैनमग्निहवनबलिवरणयोर्नियुञ्ज्यान्न ब्रह्माभिव्याहारयेदन्यत्र स्वधानिनयनात् ॥ १ ॥ उपनयनादिनियमः ॥ २॥ उक्तं ब्रह्मचर्यमग्नीन्धनभैक्षचरणे सत्यवचनमपामुपस्पर्शनम् ॥ ३ ॥
प्राणायाम करके घृत को चाटै ॥३०॥ श्मशान (मरघट) के समीप वेद पढ़ने में भी यही प्रायश्चित्त करै ॥ ३१ ॥
यह गौतम स्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥
यज्ञोपवीत से पहिले बाल्यावस्था में बातचीत करने, बोलने, और भोजन में कामचार है (धर्म शास्त्र के अनुसार नियम नहीं) होम और ब्रह्मचर्य के नियम भी उस बालक के लिये नहीं हैं। चाहे जैसे चाहे जिस ओर मुख करके मूत्र पुरीष (मल मूत्र का त्याग) करै । आचमन की रीति भी इस बालक के लिये नहीं है। किन्तु मार्जन करना हाथ पग आदि धोना, और भूमिपर जल को छिड़क के भोजनादि करना उस को भी उचित है । और उस अशुद्ध बालक के स्पर्श से अशुद्धि भी नहीं लगती, इस बालक को अग्निहोत्र तथा वैश्वदेव करने में भी न लगावै । और स्वधानिनयन (पिंडदान) के बिना वेद मन्त्रों का उच्चारण भी यज्ञोपवीत से पहिले बालक को न करावै अर्थात् ब्राह्मणादि द्विजों के बालक भी यज्ञोपवीत संस्कार से पहिले शूद्र के तुल्य होते हैं इससे उनको वेद मन्त्र न पढ़ावे न बुलवावै किन्तु स्मृति पुराणादि में लिखे स्तोत्र मन्त्रादि भले ही पढ़ावे और यदि उपनयन से पहिले पिता मर जावै तो वही असंस्कृत पुत्र वेद मन्त्रों द्वारा होने वाले अपने पिता के और्ध्वदेहिक श्राद्ध को करे वहाँ वेद मन्त्रोच्चारण में उसको दोष नहीं लगेगा यही बात मनु० अ० २।१३२ में कही है ॥ १ ॥ यज्ञोपवीत के आरम्भ से द्विज बालक के लिये धर्मशास्त्र में कहे सब नियम हैं ॥ २ ॥ पूर्व कहा ब्रह्मचर्य, अग्नि का प्रज्वालन (समिदाधान) भिक्षा मांगना, सच बोलना, जल से मार्जन आचमनादि करना, उपनयन के पश्चात इन सब को नियम से करे ॥ ३ ॥