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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषाधर्मसंहिता ॥ ५

चेतरेषाम् ॥ ३०॥ श्मशानाध्ययने चैवम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीगौतमीये धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

प्रागुपनयनात्कामचारवादभक्षोऽहुतोऽब्रह्मचारी यथोपपादंमूत्रपुरीषो भवति नास्याचमनकल्पो विद्यतेऽन्यत्रापमार्ज्जनप्रधावनावोक्षणेभ्यो न तदुपस्पर्शनादशौचं नत्वेवैनमग्निहवनबलिवरणयोर्नियुञ्ज्यान्न ब्रह्माभिव्याहारयेदन्यत्र स्वधानिनयनात् ॥ १ ॥ उपनयनादिनियमः ॥ २॥ उक्तं ब्रह्मचर्यमग्नीन्धनभैक्षचरणे सत्यवचनमपामुपस्पर्शनम् ॥ ३ ॥

प्राणायाम करके घृत को चाटै ॥३०॥ श्मशान (मरघट) के समीप वेद पढ़ने में भी यही प्रायश्चित्त करै ॥ ३१ ॥

यह गौतम स्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

यज्ञोपवीत से पहिले बाल्यावस्था में बातचीत करने, बोलने, और भोजन में कामचार है (धर्म शास्त्र के अनुसार नियम नहीं) होम और ब्रह्मचर्य के नियम भी उस बालक के लिये नहीं हैं। चाहे जैसे चाहे जिस ओर मुख करके मूत्र पुरीष (मल मूत्र का त्याग) करै । आचमन की रीति भी इस बालक के लिये नहीं है। किन्तु मार्जन करना हाथ पग आदि धोना, और भूमिपर जल को छिड़क के भोजनादि करना उस को भी उचित है । और उस अशुद्ध बालक के स्पर्श से अशुद्धि भी नहीं लगती, इस बालक को अग्निहोत्र तथा वैश्वदेव करने में भी न लगावै । और स्वधानिनयन (पिंडदान) के बिना वेद मन्त्रों का उच्चारण भी यज्ञोपवीत से पहिले बालक को न करावै अर्थात् ब्राह्मणादि द्विजों के बालक भी यज्ञोपवीत संस्कार से पहिले शूद्र के तुल्य होते हैं इससे उनको वेद मन्त्र न पढ़ावे न बुलवावै किन्तु स्मृति पुराणादि में लिखे स्तोत्र मन्त्रादि भले ही पढ़ावे और यदि उपनयन से पहिले पिता मर जावै तो वही असंस्कृत पुत्र वेद मन्त्रों द्वारा होने वाले अपने पिता के और्ध्वदेहिक श्राद्ध को करे वहाँ वेद मन्त्रोच्चारण में उसको दोष नहीं लगेगा यही बात मनु० अ० २।१३२ में कही है ॥ १ ॥ यज्ञोपवीत के आरम्भ से द्विज बालक के लिये धर्मशास्त्र में कहे सब नियम हैं ॥ २ ॥ पूर्व कहा ब्रह्मचर्य, अग्नि का प्रज्वालन (समिदाधान) भिक्षा मांगना, सच बोलना, जल से मार्जन आचमनादि करना, उपनयन के पश्चात इन सब को नियम से करे ॥ ३ ॥

६ गौतमस्मृतिः ॥

एके गोदानादि ॥ ४ ॥ बहिः संध्यार्थंचातिष्ठेत्पूर्वा मातीतो- त्तरां सज्योतिष्याज्योतिषोदर्शनाद्वाग्यतोनादित्यमीक्षेत ॥ ५ ॥ वर्जयेन्मधुमांसगन्धमाल्यदिवास्वप्नाञ्जनाभ्यञ्जनया- नोपानच्छत्रकामक्रोधलोभमोह वाद्यवादनस्नानदन्तधावन- हर्षनृत्यगीतपरिवादभयानि गुरुदर्शने कर्णप्रावृतावसक्थिका- याश्रयणपादप्रसारणानि निष्ठीवितहसितविजृम्भितास्फोट- नानिस्त्रीप्रेक्षणालम्भने मैथुनशंकायां द्यूतं हीनसेवामदत्तादानं हिंसामाचार्यतत्पुत्रस्त्रीदीक्षितनामानिशुष्कां वाचं मदं नित्यं ब्राह्मणः ॥६॥ अधःशय्याशायी पूर्वोत्थायी जघन्यसंवेशी वा- ग्बाहूदरसंयतः ॥७॥ नामगोत्रे गुरोः संमानतो निर्द्दिशेत् ॥८॥

कोई आचार्य्य इन नियमों को गोदान ( १६ सोलह आदि वर्षों में होने वाले केशान्त) संस्कार से आगे कहते हैं ॥ ४ ॥ संध्या के लिये ग्राम से बाहर जाय प्रातःकाल की पहिली संध्या सूर्यके दीखने समय तक खड़े होकर करे और सायंकाल की सूर्य दीखने समय से तारागणों के उदय होने तक बैठ के करे। दोनों सन्ध्या मौन होकर करे और सूर्यनारायण को न देखें ॥ ५ ॥ मदिरा, शहद, मांस, सुगन्ध, (इतर फुलेल आदि लगाना) फूलमाला, दिन में सोना, आंखों में अंजन सुरमा लगाना, शरीर में तैल मलना, यान (सवारी पर च- ढ़ना,) जूता, छत्री, काम, क्रोध, लोभ, मोह, बाजे (सितार आदि) बजाना, जल में धस कर स्नान करना, दातौन, हर्ष (आनन्द मानना,) नाचना, गाना, किसी की निन्दा, और भय इन मदिरा आदि सब को ब्रह्मचारी छोड़ देवे । गुरु के देखते कानों को बांधना वा शिर कण्ठ में कपड़ा लपेटना, गोड़े उठाकर बैठना, पग फैलाना, थूकना, हंसना, जंभाई लेना, आस्फोटन (किसी अंग को हाथ से बजाना) ताली बजाना, मैथुन की शंका के लिये स्त्रीको देखना व स्पर्श कर- ना, जुआ खेलना, नीच की सेवा करना, बिना दिये किसी के वस्तु को लेना, हिंसा करना, आचार्य और गुरु के पुत्र, स्त्री और दीक्षित इन का नाम लेना, सूखी कठोर वाणी बोलना, और भांगादि नशा पीना इन कर्मों को भी ब्रा- ह्मण ब्रह्मचारी नित्य ही त्याग देवै ॥ ६ ॥ गुरु से नीचे भूमि पर सोवे, गुरु से पहिले उठे, गुरु के बैठ जाने पर पीछे बैठे, लेट जाने पर लेटे, वाणी, भु- जा, और उदर इन को वश में रक्खे ॥७॥ गुरु का वा उनके गोत्र का नाम जब कभी उच्चारण करने पड़े तो सम्मान सूचक श्रीमान् आदि शब्द लगा के बोले ॥८॥

भाषार्थसहिता ॥ ९

अर्च्चिते श्रेयसि चैवम् ॥ ९ ॥ शय्यासनस्थानानि वि- हाय प्रतिश्रवणमभिक्रमणं वचनं नादृष्टेनाधःस्थानासनस्ति- र्यग्वा तत्सेवायाम् ॥ १० ॥ गुरुदर्शने चोत्तिष्ठेत्, गच्छन्तमनु- व्रजेत्, कर्म्म विज्ञाप्याख्यायाऽहूताध्यायी युक्तः प्रियहितयो- स्तद्भार्यापुत्रेषु चैवम् ॥ ११ ॥ नोच्छिष्टाशनस्नपनप्रसाधन- पादप्रक्षालनोन्मर्द्दनोपसंग्रहणानि ॥ १२ ॥ विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणां तत्पुत्रस्य च ॥ १३ ॥ नैके युवतीनाम् ॥ १४ ॥ व्यवहारप्राप्तेन सार्व्ववर्णिकं भैक्षचरणमभिशस्तपतितवर्ज्जम् ॥ १५॥ आदिमध्यान्तेषु भवच्छब्दः प्रयोज्यो वर्णानुपूर्व्येण॥१६॥


इसी प्रकार पूजा सत्कार के योग्य श्रेष्ठ उत्तम मान्य पुरुषों का नाम लेने में भी आचरण करे ॥ ९ ॥ गुरु जी जब कुछ कहें तब शय्या, आसन, और स्थान को छोड़के समीप जा कर गुरु के वचन को सुने किन्तु शय्यादि पर बैठा २ बात न करे। यदि गुरु जी खड़े हों तो उनके इधर उधर चलता हुआ बात करे, गुरु से अदृष्ट छिपा हुआ न बोले, गुरु से नीचे स्थलमें खड़ा हो वा बैठे, गुरु की सेवा में तिरछा भी न बैठा रहे ॥ १० ॥ गुरु के देखने पर खड़ा होजाय, और गुरुजी टहलने लगें तो पीछे २ चल, कोई भी काम हो गुरु को जता कर वा कह कर करे बिना पूछे कुछ न करे। गुरु जब पढ़ने को बुलावें तब नम्रता से समीप बैठ के पढ़ाकरे। गुरु का प्रिय और हित करने में तत्पर रहै। गुरु के स्त्री पुत्रों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव करे ॥ ११॥ उच्छिष्ट भोजन, स्नान कराना, प्रसाधन (श्रृंगार करना) पग धोना, शरीर मलना, वा उबटना, पगों का स्पर्श, ये काम गुरु की स्त्री पुत्रों के कभी न करे ॥ १२॥ जब परदेश से आवे तब गुरुपत्नियों और गुरुपुत्रों के भी पगों का स्पर्श करे ॥ १३ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि युवति गुरुपत्नी के पाद् स्पर्श न करे ॥ १४ ॥ व्यवहार (न्याय) से प्राप्त हुये वस्तु की भिक्षा सब वर्णों से मांग लेवे परन्तु हिंसक वा निन्दित और पतितों को छोड़देवे ॥ १५ ॥ ब्राह्मण के यहां भिक्षा मांगे तब (भवति ! भिक्षां देहि) क्षत्रिय के घर पर (भिक्षां भवति ! देहि) और वैश्यके घर में भिक्षा मांगने को जावे तब (भिक्षां देहि भवति !) ऐसा वाक्य कहे ॥ १६ ॥

८ | गौतमस्मृतिः ॥

आचार्यज्ञातिगुरुष्वेव्वलाभेडन्यत्र॥१७॥ तेषां पूर्वं पूर्वं परिह- रन्निवेद्य गुरवेऽनुज्ञातो भुञ्जीत ॥ १८ ॥ असंनिधौ तद्भार्या- पुत्रसब्रह्मचारिसद्भ्यः ॥ १९ ॥ वाग्यतस्तृप्यन्नलोलुप्यमान- स्सन्निधायोदकं स्पृशेत् ॥ २० ॥ शिष्यशिष्टिरवधेनाशक्तौ रज्जुवेणुविदलाभ्यां तनुभ्यामन्येन घ्नन् राज्ञा शास्यः ॥२१॥ द्वादशवर्षाण्येकैकवेदे ब्रह्मचर्य्यं चरेत् प्रतिद्वादशसु सर्वेषु ग्रहणान्तं वा ॥२२॥ विद्यान्ते गुरुमर्थेन निमन्त्र्यः ॥२३॥ ततः कृतानुज्ञातस्य स्नानम् ॥ २४ ॥ आचार्यः श्रेष्ठो गुरूणां मा- तेत्येके ॥ २५ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


यदि आचार्य, अपने कुटुम्बी और जगत् में विशेष मान्य गुरु लोग इन से अन्यत्र निर्वाह योग्य भिक्षा मिल जाय तो इनके घरों से न मांगे ॥ १७ ॥ यदि अन्यत्र भिक्षा न मिले तो भी आचार्यादि पहिले २ को छोड़के अगले २ के घर से मांगे, फिर भिक्षा के अन्न का गुरु के समीप निवेदन कर उन की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥१८॥ यदि गुरू जी कहीं गये हों, समीपमें न हों तो गुरुपत्नी, गुरुपुत्र, संग पढ़नेवाले ब्रह्मचारी, और कोई सज्जन पुरुष इनके समीप निवेदन करके भोग लगावे ॥ १९ ॥ प्रथम भोजन को समीप रख कर जल से आचमन करे तब मौन हो कर चंचलता को छोड़ के तृप्त होता हुआ भोजन करे ॥२०॥ गुरु शिष्यको ऐसी ताड़ना करे जिससे वध (हिंसा) नहो, और गुरु अशक्त असमर्थ बीमार होतो छोटे २ रस्सी, बेंत, बांस, से धीरे २ शिक्षा करें जिससे अधिक चोट न लगे। यदि अन्य बड़े कठोर दण्ड से मारे तो राजा गुरुको दण्ड देवे ॥२१॥ एक २ वेदके पढ़नेमें बारह २ वर्ष ब्रह्मचर्य धारण करें। अथवा प्रत्येक बारह वर्ष में जब तक एक २ वेद को पढ़ सके तब तक ब्रह्मचारी रहे ॥ २२ ॥ और विद्या पढ़ने की समाप्ति में धनादि देने के लिये गुरू से प्रार्थना करे कि भगवन् ! आज्ञा कीजिये क्या दक्षिणा उपस्थित करूं ॥२३॥ तदनन्तर गुरुकी आज्ञासे ही गृहस्थाश्रम के लिये समावर्त्तन स्नान करे ॥२४॥ सम्पूर्ण गुरुओं में आचार्य (उपनयन कराके साङ्ग वेद पढ़ाने वाला गुरु) श्रेष्ठ हे और कोई महर्षि लोग माता को श्रेष्ठ कहते मानते हैं ॥ २५ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में द्वितीय अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

भाषाधर्मसंहिता ॥

तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते ब्रह्मचारी गृहस्थो भिक्षुर्वैखानस इति तेषां गृहस्थो योनिरप्रजनत्वादितरेषाम् ॥ १ ॥
तत्रोक्तं ब्रह्मचारिण आचार्य्याधीनत्वमात्रं गुरोः कर्म्मशेषेण जपेत्, गुर्वभावे तदपत्यवृत्तिस्तदभावे वृद्धे सब्रह्मचारिण्यग्नौ वा ॥२॥
एवं वृत्तो ब्रह्मलोकमेवाप्नोति जितेन्द्रियः॥३॥
उत्तरेषां चेतदविरोधी अनिचयो भिक्षुरूर्ध्वरेता ध्रुवशोली वर्षासु भिक्षार्थी ग्राममियात् ॥४॥
जघन्यनिवृत्तं चरेन् ॥५॥
निवृत्ताशीर्वाक्चक्षुः कर्म्मसंयतः॥६॥
कौपीनाच्छादनार्थं वासो बिभृयात्


कोई आचार्य ब्रह्मचारी के इस प्रकार आश्रमों का विकल्प कहते हैं कि वह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु (संन्यासी) वैखानस (वानप्रस्थ) इन गृहस्थादि तीनों आश्रमों को स्वीकार करे अथवा निम्न प्रकार जन्म भर केवल ब्रह्मचर्याश्रम ही रक्खे। इन सब आश्रमों का गृहस्थ मूल है क्योंकि अन्य तीनों में सन्तान नहीं होते, गृहस्थ से ही उत्पन्न हो २ के ब्रह्मचारी आदि बनते हैं। इससे गृहस्थ सब का मूल है ॥१॥

और उस प्रथम मुख्य आश्रम में ब्रह्मचारी को आचार्य की आधीनता सेवा करना मात्र ही मुख्य कर्म है। गुरु सेवा के कामों से जितना अवकाश मिले उसमें वेद पाठ वा गायत्री का जप करे। गुरु के स्वर्गवास होने पर सुपात्र हों तो गुरुपुत्रों की सेवा में रहे। उनके भी अभाव में अपने से वृद्ध साधर्मी ब्रह्मचारी की वा अग्नि की सेवा जन्म भर करे ॥२॥

ऐसा बर्ताव करता हुआ ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होने से ब्रह्मलोक को ही प्राप्त होता है ॥३॥

और ब्रह्मचारी का यह काम अगले तीनों [गृहस्थ, भिक्षु, वैखानस] का विरोधी नहीं है। ब्रह्मचारी अन्नादि का संचय न करे, ऊर्द्धरेता [वीर्य जिस का मस्तक तक चढ़ गया हो इस से नीचे को कदापि न गिरे मस्तक में परमोत्तम शक्ति बढ़ जाय] भिक्षा मांग कर खाया करे, वर्षाकाल में ध्रुवशील (चले फिरे नहीं एक स्थान में) रहे, केवल भिक्षा के लिये ग्राम में जावे ॥४॥

नीचों को छोड़ कर उत्तमों से भिक्षा मांगे ॥ ५ ॥

किसी से आशीर्वाद न चाहे, वाणी, नेत्र, अपने हाथ, पांव, आदि को वश में रक्खे चंचल न करे ॥६॥

कौपीन, और केवल ओढ़नेके वस्त्रको धारणकरे ॥७॥

१० गौतमस्मृतिः ॥

॥७॥ प्रहीणमेके निर्णेजनाविवृधुक्तम् ॥८॥ ओषधिवनस्पतीना- मङ्गमपाददीत ॥९॥ न द्वितीयामपहर्तुं रात्रिं ग्रामे वसेत् ॥ १० ॥ मुण्डः शिखी वा वर्ज्जयेज्जीववधम् ॥ ११ ॥ समो भूतेषु हिंसानुग्रहयारनार्थी ॥१२॥ वैखानसो वने मूलफला- शी तपःशीलः श्रामणकेनाग्निमाधायाग्राम्यभोजी देवपितृ- मनुष्यभूतर्षिपूजकः सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्ज्जं भैक्षमप्युप- युञ्जीत न फालकृष्टमधितिष्ठेत्, ग्रामं च न प्रविशेत्, जटि- लश्चीराजिनवासा नातिशयं भुञ्जीत ॥ १३ ॥ ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद्गार्हस्थ्यस्य ॥ १४ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥


कोई आचार्य कहते हैं कि गुरु के पुराने वस्त्रों को धारण करे जो निर्मल सफेद न हों और धोबी से धुलाये न हों, किन्तु खाकी आदि हों ॥ ८ ॥ अथवा ओषधी वा वनस्पतियों के वक्कल वा पत्ते आदि के वस्त्र बनावे। अथवा इस सूत्र का द्वितीयार्थ यह हो सकता है कि ओषधि वनस्पतियों के कन्द, मूल, फलादि खाके निर्वाह करे भिक्षा भी न मांगे ॥ ९ ॥ दूसरी बार भिक्षा के लिये रात को ग्राम में न बसे ॥ १० ॥ शिर के सब बाल मुंडाया करे, अथवा केवल चोटी रक्खे, जीवों की हिंसा न करे ॥ ११ ॥ सब प्राणियों पर सम उदासीन दृष्टि रक्खे, न किसी को दुःख देवे, और न किसी पर अधिक दया वा कृपा करे। स्वयं दुःख भी न माने न हर्ष माने ॥१२॥ वानप्रस्थ के धर्म ये हैं कि वन में रहता हुआ मूल वा फल खावे, परिश्रम के साथ पंचाग्नि ताप करे, तपस्वी हो, ग्राम का भोजन न करे, पञ्चमहायज्ञां द्वारा देव, पितर, मनुष्य, ( अतिथि ) ऋषि इन को पूजे, और सबका अतिथि के तुल्य आदर करे, निषिद्धों ( निन्दित शूद्रादि वा दुराचारियों ) को छोड़कर भिक्षा को भी मांग ले, जोते हुए खेत में न बैठे, वा निवास न करे, जोतने से जो पैदा हो उस अन्न को न खावे, ग्राम में भी प्रवेश न करे, वा न बसे, जटाओं को धारण करे, शिर के बाल न मुंडावे । चीर नाम फटे पुराने चिथरे वा मृग चर्म के वस्त्र रक्खे, भोजन में अधिक अन्न वा फलादि को न खावे ॥१३॥ वेद में गृहस्थ का प्रत्यक्ष विधान होने से कोई २ आचार्य लोग यह कहते हैं कि एक गृहस्थाश्रम ही रक्खे बानप्रस्थादि न बने ॥ १४ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥

भाषासंहिता ॥ ११

गृहस्थः सदृशीं भार्यां विन्देतानन्यपूर्वां यवीयसीम् ॥१॥

असमानप्रवरैर्विवाहं ऊर्ध्वं सप्तमात् पितृबन्धुभ्यो बीजिन- श्च मातृबन्धुभ्यः पञ्चमात् ॥ २ ॥ ब्राह्मो विद्याचारित्रबन्धु- शीलसंपन्नाय दद्यादाच्छाद्यालङ्कृतां संयोगमन्त्रः प्राजाप- त्ये सह धर्मं चरतामिति, आर्षे गोमिथुनं कन्यावते दद्या- दन्तर्वेद्यृत्विजे दानं दैवोऽलङ्कृत्येच्छन्त्याः स्वयं संयोगो गान्धर्व्वो वित्तेनानतिक्रीमतामासुरः प्रसह्यादानाद्राक्ष- सोऽसंविज्ञातोपसंगमनात्पैशाचः ॥ ३ ॥ चत्वारो धर्म्याः प्रथमाः षडित्येके ॥ ४ ॥


गृहस्थ पुरुष ऐसी स्त्री को विवाहै जो अपने समान उत्तम कुल की हो, जिस की किसी के साथ सगाई न हुई हो, जो ठीक युवती हो ॥ १ ॥ जो अपने प्रवर की न हो, अथवा यदि अपने प्रवरों की भी हो तो पितृकुल की सातवीं से ऊपर पुत्रवाली पीढ़ी की हो, और मातृकुल की पांचवीं पीढ़ी से ऊपर की कन्या से विवाह होसकता है ॥ २ ॥ विद्यावान्, सदाचारी, भाई बंधु वाले सीधे सच्चे स्वभाव वाले, वर को जो कन्या देना वह पहिला ब्राह्म विवाह है। कपड़ों से आच्छादन और भूषणों से शोभित करके (सह धर्मं चरताम् । तुम दोनों संग संग धर्म करो) ऐसा कह कर जो कन्या दी जाय वह दूसरा प्राजापत्य विवाह है। कन्या के पिता को एक गौ एक बैल वा उन का मूल्य देकर जो कन्या विवाही जाय वह तीसरा आर्ष विवाह है। वेदी के भीतर यज्ञ कर्म करते हुए ऋत्विज् वर को आभूषणों से युक्त कन्या को देना वह चौथा दैव विवाह है। परस्पर स्वयं कन्या की इच्छा से जो दोनों का संयोग हो वह पांचवां गांधर्व विवाह है। कम कन्यावाले मनुष्य को यथाशक्ति धन देकर जो विवाह करे वह छठा आसुर विवाह है। बल पूर्वक मार पीट कर जो कन्या को ले आना वह सातवां राक्षस विवाह है। अज्ञान (बेहोश नशादि खाके पागल हुई) कन्या के साथ संयोग करे वह आठवां पैशाच विवाह है ॥३॥ इन आठों में ब्राह्मण के लिये पहिले चार धर्मानुकूल कर्त्तव्य हैं। कोई आचार्य पहिले छः विवाहों को धर्मानुसार कर्त्तव्य कहते मानते हैं ॥ ४ ॥

१२ गौतमस्मृतिः ॥

अनुलोमानन्तरेकान्तरद्व्यन्तरासु जाताः सवर्णाम्बष्ठो- ग्रनिषाददौष्मन्तपारशवाः ॥ ५ ॥ प्रतिलोमासु सूतमाग- धायोगवक्षत्रवैदेहकचाण्डालाः ॥ ६ ॥ ब्राह्मण्यजीजनत्पु- त्रान् वर्णेभ्य आनुपूर्व्यात् , ब्राह्मणसूतमागधचाण्डालान् , तेभ्यएव क्षत्रिया मूर्द्धावसिक्तक्षत्रियधीवरपुल्कसान् ,तेभ्यएव वैश्या भृज्जकण्टकमाहिष्यवैश्यवैदेहान् ,तेभ्यएव पारशवयव नकरणशूद्रान् शूद्रेत्येके ॥७॥ वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमेन पञ्चमेन चाचार्याः ॥८॥ सृष्ट्यन्तरजातानां च प्रति-


जिस सन्तान की उत्पत्ति में उत्तम वर्ण का पिता तथा नीचे वर्ण की माता हो वह अनुलोम उत्पत्ति होगी । ब्राह्मण पुरुष से ब्राह्मणी कन्या में अनुलोम अनन्तर हुआ सन्तान ब्राह्मण ही होगा । ब्राह्मण से एक के अन्तर पर वैश्य कन्या में हुआ सन्तान अम्बष्ठ, क्षत्रिय से एक के अन्तर पर शूद्र की कन्या में हुआ उग्र, ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में हुआ निषाद ब्राह्मण से उग्र कन्या में दौष्मन्त और ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में पारशव होता है। ये वर्णसंकर अनुलोम से होते हैं ॥ ५ ॥

अब प्रतिलोम नाम नीच वर्ण से उत्तम वर्ण की कन्या में होने वालों को दिखाते हैं — क्षत्रिय से ब्राह्मणा की कन्या में हुआ सूत, वैश्य से क्षत्रिय की कन्या में हुआ मागध, शूद्र से वैश्य की कन्या में हुआ आयोगव, शूद्र पुरुष से क्षत्रिय की कन्या में क्षत्ता, वैश्य से ब्राह्मण की कन्या में वैदेहक, और शूद्र से ब्राह्मण की कन्या में हुआ चाण्डाल वर्णसंकर होता है ॥ ६ ॥

ब्राह्मण की कन्या ब्राह्मणी ब्राह्मण पति से ब्राह्मण को, क्षत्रिय से सूत को, वैश्य से मागध को और शूद्र से चाण्डाल को उत्पन्न करती है । क्षत्रिय की कन्या क्षत्राणी, ब्राह्मण से मूर्द्धाभिषिक्त, क्षत्रिय से क्षत्रिय, वैश्य से धीवर, और शूद्र से पुक्कस वा पुल्कस को उत्पन्न करती है । वैश्य की कन्या ब्राह्मण से भृज्जकण्टक, क्षत्रिय से माहिष्य, वैश्य से वैश्य और शूद्र से वैदेह को उत्पन्न करती है । शूद्रकन्या, ब्राह्मण से पारशव, क्षत्रिय से यवन, वैश्य से करण और शूद्र से शूद्र को उत्पन्न करती है यह किन्ही आचार्यों का मत है ॥ ७ ॥

अनेक आचार्यों का मत यह है कि सातवीं वा पांचवीं पीढ़ी के साथ वर्णसंकर पुरुष अपने पिता की जाति में ऊंच वा नीच हो जाता है ॥८॥

और सृष्ट्यन्तर नाम वर्णसंकरों से जो वर्णसंकर जाति पैदा होतीं वे भी सातवीं वा पांचवीं पीढ़ी

भाषाभाष्यसहिता ॥ १३

लोमास्तु धर्म्महीनाः शूद्रायां चासमानायां च शूद्रात्पति-
तवृत्तिरन्त्यः पापिष्ठः ॥ ९ ॥ पुनन्ति साधवः पुत्रास्त्रिपौरुषा-
नार्षाद्दश दैवाद्दशैव प्राजापत्याद्दशपूर्वान्दशापरानात्मानं
च ब्राह्मीपुत्रा ब्राह्मीपुत्राः ॥ १० ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

ऋतावुपेयात् सर्वत्र वा प्रतिषिद्धवर्जम् ॥१॥ देवपितृमनु-
ष्यभूतर्षिपूजको नित्यस्वाध्यायः ॥ २ ॥ पितृभ्यश्चोदकदानं
यथोत्साहमन्यद्भार्यादिरग्निदीयादिर्वा ॥३॥ तस्मिन् गृह्या-
णि देवपितृमनुष्ययज्ञाः स्वाध्यायश्च ॥ ४ ॥ बलिकर्म्मा-


में अपने २ पिता की जाति में हो जाती हैं। नीच पिता से उत्तम कुल की स्त्री में तथा उत्तम से भी शूद्र कन्या में पैदा हुए धर्महीन होते, उनको धर्म का अधिकार नहीं है । और शूद्र पिता से वैश्यादि की कन्या में होने वाले वर्णसंकर अन्त्यज अत्यन्त पापी और पतित होते हैं ॥ ९ ॥ विधिपूर्वक हुए आर्ष विवाह से सवर्णा स्त्री में उत्पन्न अच्छे सुपुत्र कुल के दीपक साधु पुरुष अपनी तीन पीढ़ी को तार देते हैं। दैव विवाह से तथा प्राजापत्य विवाह से हुआ पुत्र अपने कुल की दश पीढ़ियों को तारने वाला होता और ब्राह्म विवाह से हुए पुत्र दश पिछली और दश अगली पीढ़ियों को तथा अपने को तारने वाले होते हैं ॥ १० ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥

गृहस्थ पुरुष ऋतुकाल में वा ऋतु से भिन्न दिनों में भी निषिद्ध (ऋतु में पहिले चार ग्यारहवें और तेरहवें दिन को तथा अमावस्या, अष्टमी, पौर्णमासी और चतुर्दशी इन निषिद्ध तिथियों को सब दशा में छोड़ के) दिनों को छोड़ के विवाहित पत्नी से समागम करे ॥ १॥ पञ्च महायज्ञों द्वारा देव, पितर, मनुष्य (अतिथि) भूत, ऋषि, इनकी पूजा नित्य करे और नित्य वेदाध्ययन करे ॥ २ ॥ पितरों का जल देना रूप तर्पण नित्य करे । यथाशक्ति यथोत्साह भार्या, और अग्नि आदि की रक्षा करे । असमर्थ रोगी आदि होता अपने दायाद (वारिसों) द्वारा देवपूजनादि करावे ॥ ३ ॥ उस स्थापन किये गृह्याग्नि में अपने शाखा सूत्रानुसार गुह्य कर्म करे । नित्य २ देव, पितृ, और मनुष्य यज्ञ तथा—स्वाध्याय नाम ब्रह्मयज्ञ करे ॥ ४ ॥ अग्निकुण्ड के समीप में बलिकर्म—भूत यज्ञ

१४ गौतमस्मृतिः ॥

अग्निर्धन्वन्तरिविश्वेदेवाः प्रजापतिः स्विष्टकृदिति होमः ॥ ५ ॥ दिग्देवताभ्यश्च यथा स्वद्वारेषु मरुद्भ्यो गृहदेवताभ्यः प्रविश्य ब्रह्मणे मध्ये अद्भ्य उदकुम्भे आकाशायेत्यन्तरिक्षे नक्तञ्चरेभ्यश्च सायम् ॥ ६ ॥ स्वस्ति वाच्य भिक्षादानं प्रश्नपूर्वं तु ददातिषु चैवं धर्मेषु ॥७॥ समद्विगुणसाहस्रानन्त्यानि फलान्यब्राह्मणब्राह्मणश्रोत्रियवेदपारगेभ्यः ॥८॥ गुर्वर्थनिवेशौषधार्थवृत्तिक्षीणयक्ष्यमाणाध्ययनाध्वसंयोगवैश्वजितेषु द्रव्यसंविभागो, बहिर्वेदि भिक्षमाणेषु कृतान्नमितरेषु ॥९॥


करे । देवयज्ञ में अग्नि, धन्वन्तरि, विश्वेदेव, प्रजापति, और स्विष्टकृत इन नामों से अग्नि में हविष्यान्न की पांच आहुति देवे जैसे ( १-अग्नये स्वाहा । २-धन्वन्तरये स्वाहा । ३—विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ४—प्रजापतये स्वाहा । ५-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ) ॥ ५ ॥ फिर भूतयज्ञ में पूर्वादि दिशाओं के इन्द्रादि देवताओं के लिये प्रदक्षिण क्रम से बलि देकर द्वार पर मरुत् देवता के लिये, फिर गृह देवताओं के लिये रंधे हुए कोष्ठ के बीच में ब्रह्मा के लिये, जल के कुम्भस्थान पर अप् देवता के लिये, आकाश के लिये, अन्तरिक्ष में दिखा के और सायंकाल के बलि कर्म में नक्तंचर देवताओं के लिये बलि धरे ॥ ६ ॥ ( इन का विशेष विधान पञ्चमहायज्ञ पद्धति में देखिये ) बुलाके ( स्वस्ति ) ऐसा कहना कर भिक्षा देवे । और इस प्रकार के सभी दान धर्म सुपात्र को अपने यहां सम्मान पूर्वक बुलाकर दिया करे ॥ ७ ॥ ब्राह्मण से भिन्न क्षत्रियादि को भोजनादि दान देने का दान की बराबर फल होता, गुण कर्म हीन मूर्ख ब्राह्मण को देने का द्विगुणा फल, वेद पाठी श्रोत्रिय को देने का हज़ार गुणा फल और वेद पारग ( जिस ने सब वेदों को आद्योपान्त पढ़ा जाना हो ऐसे वेदतत्वार्थ वेत्ता ) को दान देनेका अनन्त फल होता है ॥ ८ ॥ गुरू के लिये, किसी ब्राह्मण का घर बनाने के लिये, औषध करने के लिये, जो जीविका के बिना दुःखी हो उस को, यज्ञ करने वाले को, वेदादि शास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थी को, मुसाफिर को, और विश्वजित् यज्ञ के कर्त्ता को, इन सब को वा उन २ कामों के निमित्त धन का दान देना चाहिये । यज्ञ के समय ऋत्विजों को वेदि के भीतर दक्षिणा देकर

भाषार्थसहिता ॥ १५

प्रतिश्रुत्याप्यधर्म्मसंयुक्ताय न दद्यात् ॥१०॥ क्रुद्धहृष्टभीतातर्त्त-
लुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृतान्यपातकानि ॥११॥
भोजयेत्पूर्वमतिथिकुमारव्याधितगर्भिणीसुवासिनीस्थविरा-
न् जघन्यांश्च ॥ १२ ॥ आचार्य्यपितृसखीनां च निवेद्य व-
चनक्रिया ऋत्विगाचार्य्यश्वशुरपितृव्यमातुलानामुपस्थाने
मधुपर्कः संवत्सरे पुनःपूजिता यज्ञविवाहयोरर्वाग्राज्ञश्च
श्रोत्रियस्य ॥ १३॥ अश्रोत्रियस्यासनोदके श्रोत्रियस्य तु पा-
द्यमर्घ्यमन्नविशेषांश्च प्रकारयेन्नित्यं वा संस्कारविशिष्टं
मध्यतोऽन्नदानमवैद्ये साधुवृत्ते विपरीते तु तृणोदकभूमिः


मांगने वालों को वेदि से बाहर यथाशक्ति देवे तथा अन्य दीन दुःखियों को पूड़ी मिठाई आदि पक्वान्न देना चाहिये ॥ ९॥ अधर्मी को प्रतिज्ञा करने पर भी कुछ नहीं देना चाहिये ॥ १० ॥ क्रोधी, अतिहर्ष में मग्न, भयभीत, दुःख में निमग्न, लोभी, बालक, वृद्ध, अज्ञानी ( बेसमझ, ) नशाबाज, पागल, इन को मिथ्या बोलने पर पाप नहीं लगता है ॥ ११ ॥ गृहस्थ पुरुष पञ्चमहायज्ञों के पश्चात् पहिले अतिथि, बालक, रोगी, गर्भिणी स्त्री, विवाहिता पुत्री, और वृद्ध पुरुष बाया आदि तथा छोट भाई आदि इन सब को भोजन कराके तब पीछे स्वयं खावे ॥ १२ ॥ गुरु, पिता, और मित्र इन से निवेदन करे कि भोजन तय्यार है । तब जैसी आज्ञा आचार्य्य आदि करें वैसा करे अर्थात् इन की आज्ञा लेकर भोजन करे । ऋत्विज्, आचार्य, श्वशुर, चाचा, मामा, ये लोग अकस्मात् आवें तो मधुपर्क से पूजन करे । प्रत्येक वर्ष में कई बार मिलें तो यज्ञ और विवाह से भिन्न एक ही बार मधुपर्क विधि से पूजे । यज्ञ में ऋत्विजों का और विवाह में वर का मधुपर्क विधि से पूजन करे । राजा और श्रोत्रिय ( वेदपाठी ) का भी मधुपर्क विधि से पूजन करे ॥ १३ ॥ अन्य वेदाङ्गादि पढ़े विद्वान् का आसन और जलादि से सत्कार करे और श्रोत्रिय का तो पाद्य अर्घ्य और उत्तमोत्तम भोजनादि से भी सत्कार करे । अथवा उत्तम संस्कारों से सिद्ध किये अन्न के बीच में से लेके नित्य ही गृहस्थ पुरुष अन्न का दान किसी सुपात्र ब्राह्मण को वा वैद्य से भिन्न सदाचारी पुरुष को देवे । कोई साधारण मनुष्य आवे तो भी ठहरने की जगह, बैठने को आसन, और जल

१६ गौतमस्मृतिः ॥

स्वागतमन्ततः पूज्यानत्याशश्च शय्यासनावसथानुव्रज्योपा- सनानिसदृक्श्रेयसोः समान्यल्पशोऽपि हीने असमानग्रामोऽति थिरेकरात्रिकोऽधिवृक्षसूर्योपस्थायी कुशलानामयक्षेमारोग्या- णामनुप्रश्नोऽन्त्यशूद्रस्याब्राह्मणस्यानतिथिर्ब्राह्मणो यज्ञे स- वृत्तरचेद् भोजनं तु क्षत्रियस्योर्ध्वं ब्राह्मणेभ्योऽन्यान् भृत्यैः सहानृशंसार्थमानृशंसार्थम् ॥ १४ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

पादोपसंग्रहणं गुरुसमवायेऽन्वहम् ॥ १ ॥ अभिगम्य तु विप्रो ऽथ मातृपितृतद्बन्धूनां पूर्वजानां विद्यागुरूणां तत्तद्गुरूणां

और स्वागत करे । पूज्य पुरुष का भूल से आदर न कर पावे तो भोजन न करे । शय्या (खटिया वा तख्त,) आसन, घर की कोई कोठरी ठहरने को, पीछे२ चल के पधारना, पास बैठकर प्रेम से बातें करना, इन कामों को (आयु विद्यादि में) अपने बराबर वाले और अपने से बड़े श्रेष्ठ मनुष्य में एकसे ही करे और जो अपने से अवस्थादि में कुछ छोटा भी अतिथि हो उसका भी शय्यादि द्वारा बड़े के तुल्य सत्कार करे। जो अपने गांव से भिन्न गांव का रहने वाला हो और एक रातभर ही (जिस के घर जावे वहां) निवास करे, और वृक्षों के नीचे रहता हो, सूर्यनारायण का उपस्थान करे वह अतिथि कहाता है। ऐसे अतिथि के आने पश्चात् ब्राह्मण हो तो कुशल है ? क्षत्रिय हो तो अनामय है ? वैश्य हो तो क्षेम है ? और शूद्र हो तो आरोग्य है ? ऐसे वाक्यों से पूछे। ब्राह्मण से भिन्न किसी नीच वा शूद्र के यज्ञ में वरण कि हुआ ब्राह्मण भी किसी के यहां अतिथि नहीं माना जायगा । यदि ब्राह्मण के घर पर क्षत्रिय अतिथि आया हो तो ब्राह्मणों के भोजन कर लेने पर उस को भोजन करावे और अन्य वैश्यादि अतिथि आये हों तो दयाधर्म का पालन करने के लिये भृत्यों के साथ उनको भी भोजन करावे ॥ १४ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥

गुरु के सम्बन्ध में गुरु निकट हों तो नित्य २ उनके पादस्पर्श करे ॥ १ ॥ और परदेश से आकर माता, पिता, मामा, चाचा, ज्येष्ठभ्राता, इन सब को संमुख आकर पादस्पर्श पूर्वक अभिवादन करे। तथा विद्या पढ़ानेवाले गुरु, ओर

भाषार्थसहिता ॥ ९१

च सन्निपाते परस्य ॥२॥ स्वनाम प्रोच्याहमयमित्यभित्रादो ऽज्ञसमवाये स्त्रीपुंयोगेऽभिवादतोऽनियममेके नाविप्रोष्य स्त्री- णाममातृपितृव्यभार्याभगिनीनां नोपसंग्रहणं भ्रातृभार्याणां श्वश्रूवाश्च ॥३॥ ऋत्विक्श्वशुरपितृव्यमातुलानां तु यवीयसां प्रत्युत्थानमनभिवाद्यास्तथान्यः पौर्व्वः पौरोऽशीतिकावरः शूद्रोप्यपत्यसमेनावरोऽप्यार्य्यः शूद्रेण नाम चास्य वर्ज्जयेद् राज्ञश्चाजपःप्रेष्यो भोभवन्निति वयस्यः समानेऽहनि जातो दशवर्षवृद्धः पौरः पञ्चभिः कलाभ रःश्रोत्रियस्सदाचरणस्त्रिभिः,


उत्तर गुरुओं के गुरु एकत्र इकट्ठे हों तो गुरुओं के गुरुओं को अभिवादन करे ॥२॥

अभिवादन की रीति यह है कि “देवशर्माऽहमयमभिवादये” क्षत्रिय हो तो शर्मा के स्थान में वर्मा कहे । बिन पढे पुरुष तथा स्त्री पुरुषों के मेल मिलाप के समय स्त्रियों को अभिवादन करने का अवसर हो तो अभिवादन के वाक्य का नियम नहीं है यह किन्ही आचार्यों की राय है कि वहां लोक भाषा में प्रचरित शब्द बोलकर (, जिसे वे लोग ठीक समझते हों) अभिवादन करे ।

विदेश में गये बिना नाते रिश्ते की सब स्त्रियों को नित्यश अभिवादन न करे । परन्तु माता, चाची, बड़ी भगिनी, बड़ी भौजाई (भावज) और सासु इन सब को तो नित्यश पादस्पर्श पूर्वक अभिवादन करे ॥ ३ ॥

ऋत्विज्, श्वशुर, चाचा, और मामा ये लोग युवावस्था के हों तो आते देख के उठ खड़ा हो किन्तु अभिवादन न करे । तथा अपने ग्राम नगर का निवासी क्षत्रियादि अपने से बड़ा आवे तो भी अभिवादन न करे किन्तु उठके खड़ा हो जावे । ८० अस्सी वर्ष से भीतर के शूद्र को बालक के समान समझे। छोटे भी ब्राह्मणदि द्विज को शूद्र अभिवादन (प्रणाम) करे । जिस को अभिवादन किया जाय उसका नाम नहीं लेना चाहिये । कम बोलने वाला अधिकावस्था का भी राजा का नौकर (भोभवन्नभिवादये) ऐसा कहके अभिवादन बड़ों को करे ।

एक ग्राम वा नगर के रहनेवाले गुण कर्महीन साधारण हों तो चाहें वे बराबर आयुवाले हों वा दशवर्ष तक कम ज्यादा हों तो भी बराबर के माने जावेंगे । बराबर वालों कासा व्यवहार करें । और इन में जो कोई विशेष गुणवान् हो तो वह पांच वर्ष तक बड़ा होने पर बराबर माना जायगा । पांच वर्ष से अधिक बड़ा होगा तो बड़ा

दशमीस्थोऽनुग्राह्यवधूस्नातकराजभ्यः पथो दानं राज्ञातु

१८ गौतमस्मृतिः ॥

राजन्यो वैश्यकर्मा विद्याहीनो दीक्षितस्य प्राक्कुर्यात् ॥४॥ वित्तबन्धुकर्मजातिविद्यावयांसि मान्यानि परबलीयांसि श्रुतं तु सर्वेभ्यो गरीयस्तन्मूलत्वाद्धर्मस्य श्रुतेश्च ॥५॥ चक्रि- दशमीस्थोऽनुग्राह्यवधूस्नातकराजभ्यः पथो दानं राज्ञातु श्रोत्रियाय श्रोत्रियाय ॥ ६ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

आपत्कल्पो ब्राह्मणस्याब्राह्मणविद्योपयोगोऽनुगमनं शु- श्रूषाऽसमाप्तेर्ब्राह्मणो गुर्व्याजनाध्यापनप्रतिग्रहाः सर्वेषां

माना जायगा । यदि स्वग्राम वासी सदाचारी वेदपाठी हो तो तीन वर्ष तक बड़ा होने पर बराबर माना जायगा । तीन से अधिक बड़ा होगा तो मान्य कोटि में बड़ा माना जायगा । यदि कोई क्षत्रिय, वैश्य का व्यापारादि काम करने वाला विद्याहीन हो तो अपने से छोटे भी दीक्षित क्षत्रिय को पहिले प्रणाम करे ॥ ४ ॥ धन, कुटुम्ब; पञ्चमहा-यज्ञादि कर्म, जाति (वर्ण, ) विद्या पढ़ना, और बड़ी अवस्था, ये छः जिस २ के अधिक वा उत्तम हों वे सब मान्य कोटि के हैं । और पहिले २ की अपेक्षा अगला २ अधिक मान्य होगा। जैसे धनी से बड़े कुटुम्ब वाला, उस से उत्तम शास्त्रोक्त कर्मों का करने वाला, उस से भी अधिक मान्य साधारण विद्वान् उससे भी अधिक मान्य १०० वर्ष का वृद्ध होगा । परन्तु वेदका तत्त्व-वेत्ता बड़ा विद्वान्, हो तो सभी मान्यकोटियों के लोगों से अधिक मान्य होगा । क्योंकि वेद शास्त्र ही धर्म का मूल है। और श्रुति में भी वेदज्ञ विद्वान् को ही सर्वोत्तम लिखा है ॥ ५ ॥ गाड़ीवाला, ९० नव्वे वर्ष का वृद्ध, दया के योग्य, बहू, स्नातक (ब्रह्मचर्य पूरा करने वाला) और राजा इन का विशेष मान्य करके इन के सामने मार्ग से अन्यों को हटजाना चाहिये । परन्तु एक ओर से राजा तथा दूसरी ओर से वेदपाठी स्नातक विद्वान् आता हो तो राजा को चाहिये कि स्नातक के लिये मार्ग को छोड़कर मान्य करे ॥ ६ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

ब्राह्मण को चाहिये कि जब आपत्काल में ब्राह्मण अध्यापक न मिले तो क्षत्रियादि से वेदादि शास्त्र पढ़े तथा पढ़ने के समय तक उस क्षत्रियादि अध्यापक के पीछे २ चलनादि शुश्रूषा करे परन्तु उच्छिष्ट भोजन और पादस्पर्शन करे।

भाषार्थसहिता ॥ १९

पूर्वःपूर्वो गुरुस्तदलाभे क्षत्रवृत्तिस्तदलाभे वैश्यवृत्तिः॥१॥तस्या पण्यं गन्धरसकृतान्नतिलशाणक्षौमाजिनानि, रक्तनिर्णिते वाससी क्षीरं च सविकारं मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणोद- कापथ्यानि पशवश्च हिंसासंयोगे पुरुषवशाकुमारीवेहतश्च नित्यं भूमिब्रीहियवाजाव्यृषभधेन्वनडुहश्चैके ॥ २ ॥ वि- निमयस्तु रसानां रसैः पशूनां च न लवणाकृतान्नयोस्तिला- नां च समेनासमेन तु पक्वस्य संप्रत्यर्थे सर्वधातुवृत्तिरशक्ता- वशूद्रेण तदप्येके प्राणसंशये तद्वर्णसंकराद्भक्ष्यनियमस्तु प्रा-


यज्ञ कराना, वेदादि पढ़ाना, और दान लेना ये काम ब्राह्मण गुरु के ही हैं । और नीचे २ वर्षों का अपने से ऊंचा २ गुरु भी हो सकता है । जैसे क्षत्रिय का ब्राह्मण, वैश्य का गुरु क्षत्रिय, और शूद्र का गुरु वैश्य होसकता है । वैसे शुद्ध ब्राह्मण के न मिलने पर क्षत्रिय के कर्म करने वाले ब्राह्मण को वा वैश्यवृत्ति करने वाले ब्राह्मण को क्षत्रियादि गुरु करें ॥१॥ यदि ब्राह्मणको आपत्काल में वैश्य के कामों से जीविका करने पड़े तो, केशर चन्दन हींगादि गन्ध द्रव्य, दूध, लवणादि रस, पूरी मिठाई आदि पकाया भोजन, तिल, शण वा शण के कपड़े, अतीस के (मुकटादि) वस्त्र, मृगचर्म, रंगे और धोये वस्त्र, दूध, दही, रबड़ी, पेड़ा, खोयादि, मूल, फल, पुष्प, औषध, महत, मांस, फूस (पूरा) जल, कुपथ्यकारक वस्तु, जो कसाई के घर जाने सम्भव हों ऐसे पशु, पुरुष, बंध्या गौ वा भैंसी आदि, कुमारी कन्या, गर्भपातिनी गौ आदि, इन सब को कभी भी न बेंचे। पृथिवी, धान, जौ, भेड़, बकरी, ऋषभ— (नये बछड़ा, खैला), काम में चले हुए बैल, इन सबको भी न बेंचे यह किन्हीं आचार्यों का मत है ॥२॥ रसों का रसों के साथ और पशुओं का पशुओं के साथ बदना भले ही कर लेवे । परन्तु कच्चे अन्न और लवण का तथा परस्पर तिलों का बदलना न करे। तौल में अधिक कम का बदला करना हो तो कच्चे अन्न के साथ पकाये अन्न का बदला कर लिया करे । और जिस कालमें धनके विना तंग असमर्थ हो तब लोहा तांबा पीतल कांसादि सब धातुओं के लेन देन द्वारा जीविका कर लेवे । पर शूद्रके साथ जीविका न करे । और कोई आचार्य कहते हैं कि प्राण जाने का भय हो तो शूद्र से भी जीविका कर लेवे । परन्तु उन नीच वर्णसंकरों के घर के पकाये अभक्ष्य अन्न को न खाने का

२० Gautam Smriti page header:

२० गौतमस्मृतिः ॥

णसंशये ब्राह्मणोऽपि शस्त्रमाददीत राजन्यो वैश्यकर्म वैश्यकर्म ॥ ३ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ द्वौ लोके धृतव्रतौ राजा ब्राह्मणश्च बहुश्रुतस्तयोश्चतुर्विधस्य मनुष्यजातस्यान्तःसंज्ञानां चलनपतनसर्पणानामायत्तं जीवनं प्रसूतिरक्षणमसंकरो धर्मः ॥ १ ॥ सएष बहुश्रुतो भवति लोकवेदवेदाङ्गविद् वाकोवाक्येतिहासपुराणकुशलस्तदपेक्षस्तद्वृत्तिश्चत्वारिंशता संस्कारैः संस्कृतस्त्रिषु कर्मस्वभिरतः षट्सु वा समयाचारिकेष्वभिविनीतः षड्भिः परिहा-


नियम तब भी रक्खे । और प्राण जाने का भय हो तो ब्राह्मण भी शस्त्र (हथियारों) का ग्रहण करे । और प्राण संकट के आपत्काल में राजकुल का क्षत्रिय भी वैश्य के कर्मों द्वारा निर्वाह करना स्वीकार करे ॥ ३ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ संसार में एक राजा द्वितीय बहुत पढ़ा लिखा वेद शास्त्रवेत्ता विद्वान् ये दोनों ठीक२ अपने नियमों पर दृढ़ होने चाहिये । इन्हीं दोनों पर सब मनुष्यों और पश्वादि प्राणीमात्र का चलना फिरना चेष्टा करना आदि रूप जीवन का निर्वाह निर्भर है । तथा जीवों की उत्पत्ति, रक्षा और धर्म में चपला न होना भी राजा और विद्वान् ब्राह्मण पर ही निर्भर है ॥१॥ बहुश्रुत ब्राह्मण वह कहलाता है कि जो लोकव्यवहार में चतुर, वेद-वेदाङ्गों का जाननेवाला, वाकोवाक्य (प्रश्नोत्तर रूप वैदिक ग्रन्थ) इतिहास, पुराण, इन सब में कुशल—अच्छा जानकार हो, इन्ही वेदादि की अपेक्षा रक्खे, और इन्ही के द्वारा जिसकी जीविका हो, जिसकी आगे कहे चालीस संस्कारों से शुद्धि हुई हो । वेद का पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान देना इन तीन कर्मों में वा वेदाध्यन, यज्ञ करना और दान लेना इनके सहित छः कर्मों में जो तत्पर हो, समयानुकूल आचार विचारों में जो सर्वथा विनय के साथ बर्ताव कर्त्ता हो, विद्वान् ब्राह्मण अपने छः कर्मों में तत्पर न हो तो राजा उसका निरादर करे वा अधिक अधर्मी हो तो वध करा देवे । और यदि अपने वेदोक्त कर्मों में तत्पर रहता हो तो मार डालने

भाषार्थसहिता ॥ २१

र्यो राजा वध्यश्चावध्यश्चादण्डयश्चावहिष्कार्य्यश्चापरि- वाद्यश्चापरिहार्य्यश्चेति ॥२॥ गर्भाधानपुंसवनसीमन्तोन्नयन- जातकर्मनामकरणान्नप्राशनचौडोपनयनं चत्वारि वेदव्रता- नि स्नानं सहधर्म्मचारिणीसंयोगः पञ्चानां यज्ञानामनुष्ठानं देवपितृमनुष्यभूतब्रह्मणामेतेषां चाष्टकापार्व्वणश्राद्धश्रावण्या- ग्रहायणीचैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकयज्ञसंस्था अग्न्याधेयम ग्निहोत्रदर्शपूर्णमासावाग्रयणं चातुर्मास्यनिरूढपशुबन्धसौ- त्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्था अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थ्यः षोडशी वाजपेयोऽतिरात्रोऽप्तोर्यामइति सप्त सोमसंस्था इ-


दण्डदेने, देश निकाला देने, निन्दित करने और तिरस्कार करने योग्य वह नहीं है ॥ २ ॥ अब चालीस संस्कार गिनाते हैं—१-गर्भाधान। २- पुंसवन । ३-सी- मन्तोन्नयन । ४-जातकर्म । ५-नामकरण । ६-अन्नप्राशन । ७-चूड़ाकर्म । ८- उपनयन । चारो वेदों के व्रत ९ । १० ११ । १२ । चार वेदारम्भ १३-समावर्त्तन स्नान। १४-विवाह ( सहधर्मचारिणी के साथ संयोग) । १५-देवयज्ञ। १६-पितृय ज्ञ । १७-मनुष्य ( अतिथि ) यज्ञ । १८-भूतयज्ञ ( बलिकर्म ) । १९-ब्रह्मयज्ञ । २०-तीनों अष्टका और एक अन्वष्टका श्राद्ध । २१-सद्य पार्व्वण श्राद्ध। २२--पि- ण्ड पितृयज्ञ वा एकोद्दिष्ट त्र्याह आदि श्राद्ध । २३-श्रावणी कर्म (उपाकर्म ) । २४-आग्रहायणी (मार्गशिर की पौर्णमासी को होने वाला यज्ञ ) कर्म । २५ चैत्री ( चैत्र की पौर्णमासी का यज्ञ ) कर्म । २६—आश्वयुजी ( आश्विन की पूर्णमासी का यज्ञ ) कर्म । ये अष्टका श्राद्धादि सात पाकयज्ञ कहाते हैं । २७ श्रौतस्मार्त्त अग्नियों का स्थापन और तत्सम्बन्धी पवमानेष्ट्यादि कर्म । २८- श्रौतस्मार्त्त सायं प्रातःकाल का नित्यग्निहोत्र । २९-दर्शपूर्णमास इष्टि । ३०- आग्रयणेष्टिक (नवान्नेष्टि) ३१-चातुर्मास्ययागों के चारो पर्व। ३२- निरूढ पशु बन्ध ( पशुयाग कर्म यह श्रौत है ) कर्म । ३३-सौत्रामणीयज्ञ । अग्न्याधान से लेकर ये सातो हविष्यान्न ( चरु पुरोडाशादि से होने वाले ) हविर्यज्ञ क- हाते हैं । ३४-अग्निष्टोम । ३५-अत्यग्निष्टोम । ३६-उक्थ्य।३७--षोडशी । ३८-वाजपेय । ३९-अतिरात्र । ४०-अप्तोर्याम । ये अग्निष्टोमादि सात

२२ गौतमस्मृतिः ॥

त्येते चत्वारिंशत्संस्काराः ॥ ३ ॥ अथाष्टावात्मगुणा दंया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासो मङ्गलमकार्प- ण्यमस्पृहेति यस्यैते न चत्वारिंशत्संस्कारा नवाष्टावात्मगु- णा न स ब्रह्मणः सालोक्यं सायुज्यं च गच्छति ॥ ४ ॥ यस्य तु खलु संस्काराणामेकदेशोऽप्यष्टावात्मगुणा अथ स ब्रह्म- णः सालोक्यं सायुज्यं च गच्छति गच्छति ॥ ५ ॥

इति गौतमोये धर्मशास्त्रेऽष्टमोध्यायः ॥ ८ ॥

स विधिपूर्वं स्नात्वा भार्यामधिगम्य यथोक्तान् गृह- स्थधर्मान् प्रयुञ्जान इमानि व्रतान्यनुकर्षेत् स्नातको नित्यं शुचिः सुगन्धः स्नानशीलः सति विभवे न जीर्णमलवद्वासाः


सोमयाग कहाते हैं । ये चालीस संस्कार हैं ॥ ३ ॥ अब आत्मा नाम अन्तःक- रण ( मन ) के आठ गुण ( धर्म ) ये हैं कि-१-सब प्राणियों पर दया करना २-असमर्थ दीन दुःखियों वा अपने आधीन स्त्री पुत्रादि के अनुचित बर्ताव को सह लेना । ३—किसी की निन्दा न करना । ४- बाहरी भीतरी शुद्धि करना । ५-परोपकारादि के परिश्रम में कष्ट न मानना । ६-मङ्गल मानना ( शोकादि का त्याग ) ७-उदारता रखना । ८-तृष्णा को त्याग कर स- न्तोष धारण करना । जिस पुरुष के ये चालीस संस्कार न हुये हों और आ- ठो आत्मगुण भी जिस में न हों वह ब्रह्म ( परमात्मा ) के साथ सालोक्य वा सायुज्य मुक्ति को प्राप्त नहीं होता ॥ ४ ॥ और जिस के चालीस संस्कारों में से थोड़े भी संस्कार यथावत् हुये हों और दयादि आठो धर्म जिस में वि- द्यमान हों वह भी मोक्ष को अवश्य प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

अब स्नातक ( गृहस्थ ) पुरुष के नियम धर्म कहते हैं । पहिले गृह्यसूत्रों में लिखे विधान के अनुसार समावर्त्तन ( संस्कार ) स्नान कर के पश्चात् वि- धि पूर्वक विवाह करके ठीक शास्त्रोक्त गृहस्थ के धर्मों का पालन करता हुआ उन आगे कहे नियमों को ठीक २ धारण करे । स्नातक पुरुष ( वा गृहस्थ- मात्र ) नित्य ही शुद्ध रहे, सुगन्ध ( चन्दन केशर इतर आदि ) लगावे, नियम से स्नान करे, सम्पत्ति होने पर फटे वा मलिन वस्त्र कदापि धारण

भाषार्थसंहिता ॥ २३

स्यान्न रक्तमलवदन्यधृतं वा वासो बिभृयान्न स्रगुपानहौ निर्णिंक्तमशक्तौ न रूढश्मश्रुरकस्मान्नाग्निमपश्च युगपद्धा- रयेन्नापो मेध्येन संसृजेन्नाञ्जलिना पिबेन्न तिष्ठन्नुद्धृतेनो- दकेनाचामेन्न शूद्राशुच्येकपाण्यावर्जितेन न वाय्वग्निवि- प्रादित्यापो देवता गाश्च प्रति पश्यन् वा मूत्रपुरीषामेध्या- न्युदस्येन्नैता देवताः प्रति पादौ प्रसारयेन्न पर्णलोष्टाश्मभि र्मूत्रपुरीषापकर्षणं कुर्यान्न भस्मकेशनखतुषकपालामेध्यान्व धितिष्ठेन्न म्लेच्छाशुच्यधार्मिकैः सह संभाषेत संभाष्य वा पु- ण्यकृतो मनसा ध्यायेद् ब्राह्मणेन वा सह संभाषेत ॥ १ ॥ अधेनुं धेनुंभव्येति ब्रूयादभद्रं भद्रमिति कपालं भगलमि-


न करे, मलिन लाली आदि रंग के तथा अन्य किसी के पहिने हुए वस्त्र भी न पहिने, अन्य के पहिने हुए माला और जूता भी धारण न करे, किसी कारण असमर्थ दशा में अन्य का पहिना वस्त्रादि धारण करने ही पड़े तो धोने आदि द्वारा शुद्ध करलेवे। दाढ़ी मूंछे न रखावे किन्तु मुंडाता रहे। अकस्मात् अग्नि और जल को एक साथ न ले चले, शुद्ध जल में मल मूत्रादि अपवित्र वस्तु न गिरावे, अंजुली से जल न पीवे, खड़ा हुआ भी जल न पीवे। जलाशय से अलग निकाले जल से आचमन करे। शूद्र वा अशुद्ध मनुष्य के लाये और एक हाथ से लाये जल से भी आचमन न करे। वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जलाशय, देवस्थान, इनकी ओर मुख करके वा इनको देखता हुआ मल, मूत्र, वा अन्य किसी अपवित्र वस्तु का त्याग न करे। और इन वायु आदि देवताओं की ओर को पग भी न पसारे। पत्ते, ढेला, और पत्थर से मल मूत्रों को इधर उधर न चलावे। भस्म, बाल, नख, भूसी, खप्पर, (मट्टी के बर्तनों के टुकड़े) और अपवित्र वस्तु इन पर न खड़ा हो और न बैठे। म्लेच्छ, अपवित्र (दूषित) और अधर्मियों के साथ संभाषण न करे। यदि किसी कारण इनके साथ बोलने ही पड़े तो मनसे पुण्यात्मा तपस्वियों का ध्यान करे। अथवा उनके साथ बात करने बाद ब्राह्मण के साथ वार्तालाप करे ॥ १ ॥ अधेनु (दूध न देनेवाली गौ) को "धेनु भव्या" कहे। अभद्र (अकल्याण) को "भद्र" कपाल को "भगा-

२४गौतमस्मृतिः ॥

ति मणिधनुरितीन्द्रधनुः ॥ २॥ गां धयन्तीं परस्मै नाचक्षीत न चैनां वारयेन्न मिथुनीभूत्वा शौचं प्रति विलम्बेत नच तस्मिन् शयने स्वाध्यायमधयीत न चापररात्रमधीत्य पुनः प्रतिसंविशेन्नाकल्पां नारीमभिरमयेन्न रजस्वलां नचैनां श्लिष्येन्न कन्यामग्निमुखोपधमनविगृह्यवादबहिर्गन्धमाल्यधारणपापीयसावलेकनभार्यासहभोजनाञ्जन्त्यवेक्षणकुद्वारप्रवेशनपादधावनसंदिग्धभोजननदीबाहुतरणवृक्षवृषमारोहणार्थरोहणप्राणव्यवस्थानि च वर्जयेन्न संदिग्धां नावमधिरोहेत् सर्वतएवात्मानं गोपायेन्न प्रावृत्य शिरोऽहनि पर्यटेत्, प्रावृत्य तु रात्रौ मूत्रोच्चारे च न भूमावनन्तर्द्धाय नाराद्द्वावस-


ल" इन्द्र धनुष को "मणिधनुः" ऐसा कहे ॥ २ ॥ गौ को बछड़ा चौंखता हो तो अन्य से न कहे। और बछड़े से गौ को स्वयंभी न हटावे। मैथुन कर के तत्काल शुद्धि करे बिलम्ब न करे। मैथुन करने की सेज पर वेदपाठ न करे। रात के चौथे प्रहर में वा आधी रात के पश्चात् वेदपाठ करे तो पीछे फिर न सोवे। असमर्थ बाल्यावस्था की (जिसकी छाती पर कुच न उठे हों) स्त्री से संयोग न करे। रजस्वला स्त्री से भी संयोग न करे। रजस्वला स्त्री को शरीर से भी न लिपटावे तथा स्पर्श भी न करे। कुमारी कन्या से भी (विवाह विधि हुए बिना) संयोग न करे। अग्नि को मुख से न धोंके वा न फूंके (परन्तु ऋत्विको प्रज्वलन के समय बांस की धोंकनी से वा दोनों हाथों के बीच से फूके पंखादि से नहीं।) वैर विरोध पूर्वक किसी से वाद विवाद न करे। कण्ठ से बाहर शिर के जुड़े आदि फूलों आदि की माला धारण न करे। अत्यन्त पापी पुरुष के साथ लिखा पढ़ी आदि व्यवहार कदापि न करे। अपनी पत्नी के साथ भोजन, अंजन सुरमा लगाती हुई को देखना, द्वार से भिन्न खिड़की आदि मार्ग से घर में घुसना, कांसे के पात्र में पग धोना, संदिग्ध भोजन करना, भुजाओं से नदी को तरना, वृक्ष पर वा बैलपर चढ़ना, उतरना, इसको और प्राणों की दुरदशा करने वाले अन्य कामों को भी त्याग देवे। सन्दिग्ध नौका पर न चढ़े। सब ओर से अपनी रक्षा करे। दिन में शिर को बांध कर न डोले, परन्तु रात में शिर को बांधकर निकले नंगे शिर रात में कहीं न जावे। मल मूत्र त्याग के समय शिर में वस्त्र लपेट कर और सूखे तृण वा ढेलादि