अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ गौतमस्मृतिः ॥
स्वागतमन्ततः पूज्यानत्याशश्च शय्यासनावसथानुव्रज्योपा- सनानिसदृक्श्रेयसोः समान्यल्पशोऽपि हीने असमानग्रामोऽति थिरेकरात्रिकोऽधिवृक्षसूर्योपस्थायी कुशलानामयक्षेमारोग्या- णामनुप्रश्नोऽन्त्यशूद्रस्याब्राह्मणस्यानतिथिर्ब्राह्मणो यज्ञे स- वृत्तरचेद् भोजनं तु क्षत्रियस्योर्ध्वं ब्राह्मणेभ्योऽन्यान् भृत्यैः सहानृशंसार्थमानृशंसार्थम् ॥ १४ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
पादोपसंग्रहणं गुरुसमवायेऽन्वहम् ॥ १ ॥ अभिगम्य तु विप्रो ऽथ मातृपितृतद्बन्धूनां पूर्वजानां विद्यागुरूणां तत्तद्गुरूणां
और स्वागत करे । पूज्य पुरुष का भूल से आदर न कर पावे तो भोजन न करे । शय्या (खटिया वा तख्त,) आसन, घर की कोई कोठरी ठहरने को, पीछे२ चल के पधारना, पास बैठकर प्रेम से बातें करना, इन कामों को (आयु विद्यादि में) अपने बराबर वाले और अपने से बड़े श्रेष्ठ मनुष्य में एकसे ही करे और जो अपने से अवस्थादि में कुछ छोटा भी अतिथि हो उसका भी शय्यादि द्वारा बड़े के तुल्य सत्कार करे। जो अपने गांव से भिन्न गांव का रहने वाला हो और एक रातभर ही (जिस के घर जावे वहां) निवास करे, और वृक्षों के नीचे रहता हो, सूर्यनारायण का उपस्थान करे वह अतिथि कहाता है। ऐसे अतिथि के आने पश्चात् ब्राह्मण हो तो कुशल है ? क्षत्रिय हो तो अनामय है ? वैश्य हो तो क्षेम है ? और शूद्र हो तो आरोग्य है ? ऐसे वाक्यों से पूछे। ब्राह्मण से भिन्न किसी नीच वा शूद्र के यज्ञ में वरण कि हुआ ब्राह्मण भी किसी के यहां अतिथि नहीं माना जायगा । यदि ब्राह्मण के घर पर क्षत्रिय अतिथि आया हो तो ब्राह्मणों के भोजन कर लेने पर उस को भोजन करावे और अन्य वैश्यादि अतिथि आये हों तो दयाधर्म का पालन करने के लिये भृत्यों के साथ उनको भी भोजन करावे ॥ १४ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥
गुरु के सम्बन्ध में गुरु निकट हों तो नित्य २ उनके पादस्पर्श करे ॥ १ ॥ और परदेश से आकर माता, पिता, मामा, चाचा, ज्येष्ठभ्राता, इन सब को संमुख आकर पादस्पर्श पूर्वक अभिवादन करे। तथा विद्या पढ़ानेवाले गुरु, ओर