अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 587, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १५
प्रतिश्रुत्याप्यधर्म्मसंयुक्ताय न दद्यात् ॥१०॥ क्रुद्धहृष्टभीतातर्त्त-
लुब्धबालस्थविरमूढमत्तोन्मत्तवाक्यान्यनृतान्यपातकानि ॥११॥
भोजयेत्पूर्वमतिथिकुमारव्याधितगर्भिणीसुवासिनीस्थविरा-
न् जघन्यांश्च ॥ १२ ॥ आचार्य्यपितृसखीनां च निवेद्य व-
चनक्रिया ऋत्विगाचार्य्यश्वशुरपितृव्यमातुलानामुपस्थाने
मधुपर्कः संवत्सरे पुनःपूजिता यज्ञविवाहयोरर्वाग्राज्ञश्च
श्रोत्रियस्य ॥ १३॥ अश्रोत्रियस्यासनोदके श्रोत्रियस्य तु पा-
द्यमर्घ्यमन्नविशेषांश्च प्रकारयेन्नित्यं वा संस्कारविशिष्टं
मध्यतोऽन्नदानमवैद्ये साधुवृत्ते विपरीते तु तृणोदकभूमिः
मांगने वालों को वेदि से बाहर यथाशक्ति देवे तथा अन्य दीन दुःखियों को पूड़ी मिठाई आदि पक्वान्न देना चाहिये ॥ ९॥ अधर्मी को प्रतिज्ञा करने पर भी कुछ नहीं देना चाहिये ॥ १० ॥ क्रोधी, अतिहर्ष में मग्न, भयभीत, दुःख में निमग्न, लोभी, बालक, वृद्ध, अज्ञानी ( बेसमझ, ) नशाबाज, पागल, इन को मिथ्या बोलने पर पाप नहीं लगता है ॥ ११ ॥ गृहस्थ पुरुष पञ्चमहायज्ञों के पश्चात् पहिले अतिथि, बालक, रोगी, गर्भिणी स्त्री, विवाहिता पुत्री, और वृद्ध पुरुष बाया आदि तथा छोट भाई आदि इन सब को भोजन कराके तब पीछे स्वयं खावे ॥ १२ ॥ गुरु, पिता, और मित्र इन से निवेदन करे कि भोजन तय्यार है । तब जैसी आज्ञा आचार्य्य आदि करें वैसा करे अर्थात् इन की आज्ञा लेकर भोजन करे । ऋत्विज्, आचार्य, श्वशुर, चाचा, मामा, ये लोग अकस्मात् आवें तो मधुपर्क से पूजन करे । प्रत्येक वर्ष में कई बार मिलें तो यज्ञ और विवाह से भिन्न एक ही बार मधुपर्क विधि से पूजे । यज्ञ में ऋत्विजों का और विवाह में वर का मधुपर्क विधि से पूजन करे । राजा और श्रोत्रिय ( वेदपाठी ) का भी मधुपर्क विधि से पूजन करे ॥ १३ ॥ अन्य वेदाङ्गादि पढ़े विद्वान् का आसन और जलादि से सत्कार करे और श्रोत्रिय का तो पाद्य अर्घ्य और उत्तमोत्तम भोजनादि से भी सत्कार करे । अथवा उत्तम संस्कारों से सिद्ध किये अन्न के बीच में से लेके नित्य ही गृहस्थ पुरुष अन्न का दान किसी सुपात्र ब्राह्मण को वा वैद्य से भिन्न सदाचारी पुरुष को देवे । कोई साधारण मनुष्य आवे तो भी ठहरने की जगह, बैठने को आसन, और जल
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