भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१४ गौतमस्मृतिः ॥

अग्निर्धन्वन्तरिविश्वेदेवाः प्रजापतिः स्विष्टकृदिति होमः ॥ ५ ॥ दिग्देवताभ्यश्च यथा स्वद्वारेषु मरुद्भ्यो गृहदेवताभ्यः प्रविश्य ब्रह्मणे मध्ये अद्भ्य उदकुम्भे आकाशायेत्यन्तरिक्षे नक्तञ्चरेभ्यश्च सायम् ॥ ६ ॥ स्वस्ति वाच्य भिक्षादानं प्रश्नपूर्वं तु ददातिषु चैवं धर्मेषु ॥७॥ समद्विगुणसाहस्रानन्त्यानि फलान्यब्राह्मणब्राह्मणश्रोत्रियवेदपारगेभ्यः ॥८॥ गुर्वर्थनिवेशौषधार्थवृत्तिक्षीणयक्ष्यमाणाध्ययनाध्वसंयोगवैश्वजितेषु द्रव्यसंविभागो, बहिर्वेदि भिक्षमाणेषु कृतान्नमितरेषु ॥९॥


करे । देवयज्ञ में अग्नि, धन्वन्तरि, विश्वेदेव, प्रजापति, और स्विष्टकृत इन नामों से अग्नि में हविष्यान्न की पांच आहुति देवे जैसे ( १-अग्नये स्वाहा । २-धन्वन्तरये स्वाहा । ३—विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ४—प्रजापतये स्वाहा । ५-अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ) ॥ ५ ॥ फिर भूतयज्ञ में पूर्वादि दिशाओं के इन्द्रादि देवताओं के लिये प्रदक्षिण क्रम से बलि देकर द्वार पर मरुत् देवता के लिये, फिर गृह देवताओं के लिये रंधे हुए कोष्ठ के बीच में ब्रह्मा के लिये, जल के कुम्भस्थान पर अप् देवता के लिये, आकाश के लिये, अन्तरिक्ष में दिखा के और सायंकाल के बलि कर्म में नक्तंचर देवताओं के लिये बलि धरे ॥ ६ ॥ ( इन का विशेष विधान पञ्चमहायज्ञ पद्धति में देखिये ) बुलाके ( स्वस्ति ) ऐसा कहना कर भिक्षा देवे । और इस प्रकार के सभी दान धर्म सुपात्र को अपने यहां सम्मान पूर्वक बुलाकर दिया करे ॥ ७ ॥ ब्राह्मण से भिन्न क्षत्रियादि को भोजनादि दान देने का दान की बराबर फल होता, गुण कर्म हीन मूर्ख ब्राह्मण को देने का द्विगुणा फल, वेद पाठी श्रोत्रिय को देने का हज़ार गुणा फल और वेद पारग ( जिस ने सब वेदों को आद्योपान्त पढ़ा जाना हो ऐसे वेदतत्वार्थ वेत्ता ) को दान देनेका अनन्त फल होता है ॥ ८ ॥ गुरू के लिये, किसी ब्राह्मण का घर बनाने के लिये, औषध करने के लिये, जो जीविका के बिना दुःखी हो उस को, यज्ञ करने वाले को, वेदादि शास्त्र पढ़ने वाले विद्यार्थी को, मुसाफिर को, और विश्वजित् यज्ञ के कर्त्ता को, इन सब को वा उन २ कामों के निमित्त धन का दान देना चाहिये । यज्ञ के समय ऋत्विजों को वेदि के भीतर दक्षिणा देकर