भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 585

भाषाभाष्यसहिता ॥ १३

लोमास्तु धर्म्महीनाः शूद्रायां चासमानायां च शूद्रात्पति-
तवृत्तिरन्त्यः पापिष्ठः ॥ ९ ॥ पुनन्ति साधवः पुत्रास्त्रिपौरुषा-
नार्षाद्दश दैवाद्दशैव प्राजापत्याद्दशपूर्वान्दशापरानात्मानं
च ब्राह्मीपुत्रा ब्राह्मीपुत्राः ॥ १० ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

ऋतावुपेयात् सर्वत्र वा प्रतिषिद्धवर्जम् ॥१॥ देवपितृमनु-
ष्यभूतर्षिपूजको नित्यस्वाध्यायः ॥ २ ॥ पितृभ्यश्चोदकदानं
यथोत्साहमन्यद्भार्यादिरग्निदीयादिर्वा ॥३॥ तस्मिन् गृह्या-
णि देवपितृमनुष्ययज्ञाः स्वाध्यायश्च ॥ ४ ॥ बलिकर्म्मा-


में अपने २ पिता की जाति में हो जाती हैं। नीच पिता से उत्तम कुल की स्त्री में तथा उत्तम से भी शूद्र कन्या में पैदा हुए धर्महीन होते, उनको धर्म का अधिकार नहीं है । और शूद्र पिता से वैश्यादि की कन्या में होने वाले वर्णसंकर अन्त्यज अत्यन्त पापी और पतित होते हैं ॥ ९ ॥ विधिपूर्वक हुए आर्ष विवाह से सवर्णा स्त्री में उत्पन्न अच्छे सुपुत्र कुल के दीपक साधु पुरुष अपनी तीन पीढ़ी को तार देते हैं। दैव विवाह से तथा प्राजापत्य विवाह से हुआ पुत्र अपने कुल की दश पीढ़ियों को तारने वाला होता और ब्राह्म विवाह से हुए पुत्र दश पिछली और दश अगली पीढ़ियों को तथा अपने को तारने वाले होते हैं ॥ १० ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥

गृहस्थ पुरुष ऋतुकाल में वा ऋतु से भिन्न दिनों में भी निषिद्ध (ऋतु में पहिले चार ग्यारहवें और तेरहवें दिन को तथा अमावस्या, अष्टमी, पौर्णमासी और चतुर्दशी इन निषिद्ध तिथियों को सब दशा में छोड़ के) दिनों को छोड़ के विवाहित पत्नी से समागम करे ॥ १॥ पञ्च महायज्ञों द्वारा देव, पितर, मनुष्य (अतिथि) भूत, ऋषि, इनकी पूजा नित्य करे और नित्य वेदाध्ययन करे ॥ २ ॥ पितरों का जल देना रूप तर्पण नित्य करे । यथाशक्ति यथोत्साह भार्या, और अग्नि आदि की रक्षा करे । असमर्थ रोगी आदि होता अपने दायाद (वारिसों) द्वारा देवपूजनादि करावे ॥ ३ ॥ उस स्थापन किये गृह्याग्नि में अपने शाखा सूत्रानुसार गुह्य कर्म करे । नित्य २ देव, पितृ, और मनुष्य यज्ञ तथा—स्वाध्याय नाम ब्रह्मयज्ञ करे ॥ ४ ॥ अग्निकुण्ड के समीप में बलिकर्म—भूत यज्ञ