भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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१२ गौतमस्मृतिः ॥

अनुलोमानन्तरेकान्तरद्व्यन्तरासु जाताः सवर्णाम्बष्ठो- ग्रनिषाददौष्मन्तपारशवाः ॥ ५ ॥ प्रतिलोमासु सूतमाग- धायोगवक्षत्रवैदेहकचाण्डालाः ॥ ६ ॥ ब्राह्मण्यजीजनत्पु- त्रान् वर्णेभ्य आनुपूर्व्यात् , ब्राह्मणसूतमागधचाण्डालान् , तेभ्यएव क्षत्रिया मूर्द्धावसिक्तक्षत्रियधीवरपुल्कसान् ,तेभ्यएव वैश्या भृज्जकण्टकमाहिष्यवैश्यवैदेहान् ,तेभ्यएव पारशवयव नकरणशूद्रान् शूद्रेत्येके ॥७॥ वर्णान्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाभ्यां सप्तमेन पञ्चमेन चाचार्याः ॥८॥ सृष्ट्यन्तरजातानां च प्रति-


जिस सन्तान की उत्पत्ति में उत्तम वर्ण का पिता तथा नीचे वर्ण की माता हो वह अनुलोम उत्पत्ति होगी । ब्राह्मण पुरुष से ब्राह्मणी कन्या में अनुलोम अनन्तर हुआ सन्तान ब्राह्मण ही होगा । ब्राह्मण से एक के अन्तर पर वैश्य कन्या में हुआ सन्तान अम्बष्ठ, क्षत्रिय से एक के अन्तर पर शूद्र की कन्या में हुआ उग्र, ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में हुआ निषाद ब्राह्मण से उग्र कन्या में दौष्मन्त और ब्राह्मण से शूद्र की कन्या में पारशव होता है। ये वर्णसंकर अनुलोम से होते हैं ॥ ५ ॥

अब प्रतिलोम नाम नीच वर्ण से उत्तम वर्ण की कन्या में होने वालों को दिखाते हैं — क्षत्रिय से ब्राह्मणा की कन्या में हुआ सूत, वैश्य से क्षत्रिय की कन्या में हुआ मागध, शूद्र से वैश्य की कन्या में हुआ आयोगव, शूद्र पुरुष से क्षत्रिय की कन्या में क्षत्ता, वैश्य से ब्राह्मण की कन्या में वैदेहक, और शूद्र से ब्राह्मण की कन्या में हुआ चाण्डाल वर्णसंकर होता है ॥ ६ ॥

ब्राह्मण की कन्या ब्राह्मणी ब्राह्मण पति से ब्राह्मण को, क्षत्रिय से सूत को, वैश्य से मागध को और शूद्र से चाण्डाल को उत्पन्न करती है । क्षत्रिय की कन्या क्षत्राणी, ब्राह्मण से मूर्द्धाभिषिक्त, क्षत्रिय से क्षत्रिय, वैश्य से धीवर, और शूद्र से पुक्कस वा पुल्कस को उत्पन्न करती है । वैश्य की कन्या ब्राह्मण से भृज्जकण्टक, क्षत्रिय से माहिष्य, वैश्य से वैश्य और शूद्र से वैदेह को उत्पन्न करती है । शूद्रकन्या, ब्राह्मण से पारशव, क्षत्रिय से यवन, वैश्य से करण और शूद्र से शूद्र को उत्पन्न करती है यह किन्ही आचार्यों का मत है ॥ ७ ॥

अनेक आचार्यों का मत यह है कि सातवीं वा पांचवीं पीढ़ी के साथ वर्णसंकर पुरुष अपने पिता की जाति में ऊंच वा नीच हो जाता है ॥८॥

और सृष्ट्यन्तर नाम वर्णसंकरों से जो वर्णसंकर जाति पैदा होतीं वे भी सातवीं वा पांचवीं पीढ़ी