भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 596, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 596
२४गौतमस्मृतिः ॥

ति मणिधनुरितीन्द्रधनुः ॥ २॥ गां धयन्तीं परस्मै नाचक्षीत न चैनां वारयेन्न मिथुनीभूत्वा शौचं प्रति विलम्बेत नच तस्मिन् शयने स्वाध्यायमधयीत न चापररात्रमधीत्य पुनः प्रतिसंविशेन्नाकल्पां नारीमभिरमयेन्न रजस्वलां नचैनां श्लिष्येन्न कन्यामग्निमुखोपधमनविगृह्यवादबहिर्गन्धमाल्यधारणपापीयसावलेकनभार्यासहभोजनाञ्जन्त्यवेक्षणकुद्वारप्रवेशनपादधावनसंदिग्धभोजननदीबाहुतरणवृक्षवृषमारोहणार्थरोहणप्राणव्यवस्थानि च वर्जयेन्न संदिग्धां नावमधिरोहेत् सर्वतएवात्मानं गोपायेन्न प्रावृत्य शिरोऽहनि पर्यटेत्, प्रावृत्य तु रात्रौ मूत्रोच्चारे च न भूमावनन्तर्द्धाय नाराद्द्वावस-


ल" इन्द्र धनुष को "मणिधनुः" ऐसा कहे ॥ २ ॥ गौ को बछड़ा चौंखता हो तो अन्य से न कहे। और बछड़े से गौ को स्वयंभी न हटावे। मैथुन कर के तत्काल शुद्धि करे बिलम्ब न करे। मैथुन करने की सेज पर वेदपाठ न करे। रात के चौथे प्रहर में वा आधी रात के पश्चात् वेदपाठ करे तो पीछे फिर न सोवे। असमर्थ बाल्यावस्था की (जिसकी छाती पर कुच न उठे हों) स्त्री से संयोग न करे। रजस्वला स्त्री से भी संयोग न करे। रजस्वला स्त्री को शरीर से भी न लिपटावे तथा स्पर्श भी न करे। कुमारी कन्या से भी (विवाह विधि हुए बिना) संयोग न करे। अग्नि को मुख से न धोंके वा न फूंके (परन्तु ऋत्विको प्रज्वलन के समय बांस की धोंकनी से वा दोनों हाथों के बीच से फूके पंखादि से नहीं।) वैर विरोध पूर्वक किसी से वाद विवाद न करे। कण्ठ से बाहर शिर के जुड़े आदि फूलों आदि की माला धारण न करे। अत्यन्त पापी पुरुष के साथ लिखा पढ़ी आदि व्यवहार कदापि न करे। अपनी पत्नी के साथ भोजन, अंजन सुरमा लगाती हुई को देखना, द्वार से भिन्न खिड़की आदि मार्ग से घर में घुसना, कांसे के पात्र में पग धोना, संदिग्ध भोजन करना, भुजाओं से नदी को तरना, वृक्ष पर वा बैलपर चढ़ना, उतरना, इसको और प्राणों की दुरदशा करने वाले अन्य कामों को भी त्याग देवे। सन्दिग्ध नौका पर न चढ़े। सब ओर से अपनी रक्षा करे। दिन में शिर को बांध कर न डोले, परन्तु रात में शिर को बांधकर निकले नंगे शिर रात में कहीं न जावे। मल मूत्र त्याग के समय शिर में वस्त्र लपेट कर और सूखे तृण वा ढेलादि