भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसंहिता ॥ २३

स्यान्न रक्तमलवदन्यधृतं वा वासो बिभृयान्न स्रगुपानहौ निर्णिंक्तमशक्तौ न रूढश्मश्रुरकस्मान्नाग्निमपश्च युगपद्धा- रयेन्नापो मेध्येन संसृजेन्नाञ्जलिना पिबेन्न तिष्ठन्नुद्धृतेनो- दकेनाचामेन्न शूद्राशुच्येकपाण्यावर्जितेन न वाय्वग्निवि- प्रादित्यापो देवता गाश्च प्रति पश्यन् वा मूत्रपुरीषामेध्या- न्युदस्येन्नैता देवताः प्रति पादौ प्रसारयेन्न पर्णलोष्टाश्मभि र्मूत्रपुरीषापकर्षणं कुर्यान्न भस्मकेशनखतुषकपालामेध्यान्व धितिष्ठेन्न म्लेच्छाशुच्यधार्मिकैः सह संभाषेत संभाष्य वा पु- ण्यकृतो मनसा ध्यायेद् ब्राह्मणेन वा सह संभाषेत ॥ १ ॥ अधेनुं धेनुंभव्येति ब्रूयादभद्रं भद्रमिति कपालं भगलमि-


न करे, मलिन लाली आदि रंग के तथा अन्य किसी के पहिने हुए वस्त्र भी न पहिने, अन्य के पहिने हुए माला और जूता भी धारण न करे, किसी कारण असमर्थ दशा में अन्य का पहिना वस्त्रादि धारण करने ही पड़े तो धोने आदि द्वारा शुद्ध करलेवे। दाढ़ी मूंछे न रखावे किन्तु मुंडाता रहे। अकस्मात् अग्नि और जल को एक साथ न ले चले, शुद्ध जल में मल मूत्रादि अपवित्र वस्तु न गिरावे, अंजुली से जल न पीवे, खड़ा हुआ भी जल न पीवे। जलाशय से अलग निकाले जल से आचमन करे। शूद्र वा अशुद्ध मनुष्य के लाये और एक हाथ से लाये जल से भी आचमन न करे। वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जलाशय, देवस्थान, इनकी ओर मुख करके वा इनको देखता हुआ मल, मूत्र, वा अन्य किसी अपवित्र वस्तु का त्याग न करे। और इन वायु आदि देवताओं की ओर को पग भी न पसारे। पत्ते, ढेला, और पत्थर से मल मूत्रों को इधर उधर न चलावे। भस्म, बाल, नख, भूसी, खप्पर, (मट्टी के बर्तनों के टुकड़े) और अपवित्र वस्तु इन पर न खड़ा हो और न बैठे। म्लेच्छ, अपवित्र (दूषित) और अधर्मियों के साथ संभाषण न करे। यदि किसी कारण इनके साथ बोलने ही पड़े तो मनसे पुण्यात्मा तपस्वियों का ध्यान करे। अथवा उनके साथ बात करने बाद ब्राह्मण के साथ वार्तालाप करे ॥ १ ॥ अधेनु (दूध न देनेवाली गौ) को "धेनु भव्या" कहे। अभद्र (अकल्याण) को "भद्र" कपाल को "भगा-

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