अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ २५
धान्न भस्मकरीषकृष्टच्छायापथिकाम्येषूभे मूत्रपुरीषे दिवा कुर्यादुदङ्मुखः संध्ययोश्च रात्रौ दक्षिणमुखः पालाशमास- नं पादुके दन्तधावनमिति वर्ज्जयेत् ॥३॥ सोपानत्कश्चाश- नासनशयनाभिवादननमस्कारान् वर्ज्जयेत् ॥ ४॥ न पूर्वा- ह्णमध्यन्दिनापराह्णानफलान्कुर्याद् यथाशक्ति धर्मार्थ- कामेभ्यस्तेषु च धर्म्मोत्तरःस्यान्न नग्नां परयोषितमीक्षेत न पदासनमाकर्षेन्न शिश्नोदरपाणिपादवाक्चक्षुश्चापलानि कु- र्याच्छेदनभेदनविलेखनविमर्दनास्फोटनानि नाकस्मात्कुर्या- न्नोपरि वत्सतन्त्रीं गच्छेन्न जलकूले स्यान्न यज्ञमवृतो गच्छेद् दर्शनाय तु कामं, न भक्ष्यानुत्संगे भक्षयेन्न रात्रौ प्रेष्याहृतमु- द्धृतस्नेहविलेपनपिण्याकमथितप्रभृतीनि चात्तवीर्याणि ना-
की भूमि पर घर के उन पर मल मूत्रका त्याग करे। घर के समीप मल मूत्र का त्याग न करे, भस्म, फूटे कपड़े, जोता खेत, छाया, मार्ग, और रमणीक ज- गह में मल मूत्र का त्याग न करे। दिन में तथा सायं प्रातः सन्ध्या के समय उत्तर को मुख करके और रात्रि में दक्षिण को मुख करके मल मूत्र का त्याग करे। ढांक की लकड़ी वा पत्तों का बैठने को आसन, (पटा) खड़ासू (पा- दुका) और दातौन न बनावे ॥ ३॥ भोजन करना, आसन पर बैठना, शय्या पर लेटना, बड़े मान्यों को अभिवादन, और बराबर वालों को नमस्कार इन कामों को जूता पहने हुए न करे ॥४॥ पूर्वाह्न, मध्यान्ह और अपराह्न को निष्फ- न करे किन्तु उन २ समय के धर्म कृत्यों द्वारा सफल करे। यथाशक्ति धर्म अर्थ और कामना की सिद्धि के लिये समयों को लगावे और तीनों में धर्म को सर्वोपरि सेवन करने का यत्न करता रहे। पराई स्त्री को नंगी न देखे। पग से आसन को न खींचे। शिश्न, (गुप्तेन्द्रिय) उदर, हाथ, पग, वाणी, चक्षु, इन को चपल न रक्खे। विना प्रयोजन किसी वस्तु का छेदन (दो टुकड़े) भेदन, खोदना, मसलना, बजाना, अकस्मात् न करे। बंधे हुए बछड़े की रस्सी के ऊपर लांघकर न निकले। जलाशय के तट पर न बैठे। वरण हुए वा बु- लाये विना किसी के यज्ञ में न जावे । पर देखने को भले ही जावे। खाने योग्य वस्तुओं को गोदी में धर कर न खावे। रात्रि में भृत्य की लायी वस्तु, जिस की चिकनाई निकाल ली हो, विलेपन (उबटन) पिण्याक (पीना-खली)