अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ गौतमस्मृतिः ॥
श्रीयीत, सायं प्रातस्त्वन्नमभिपूजितमनिन्दन् भुञ्जीत न कदाचिदु रात्रौ नग्नः स्वपेत् स्नायाद्वा यच्चात्मवन्तो वृद्धाः सम्यग्विनीता दम्भलोभमोहवियुक्ता वेदविद आचक्षते तत्तमाचरेद् योगक्षेमार्थमीश्वरमधिगच्छेन्नान्यमन्यत्र देवगुरुधार्म्मिकेभ्यः प्रभूतेधोदकयवसकुशमाल्योपनिष्क्रमणमार्य्यजनभूयिष्ठमनलसमृद्धं धार्म्मिकाधिष्ठितं निकेतनमावसितुं यतेत प्रशस्तमाङ्गल्यदेवतायतनचतुष्पथादीन् प्रदक्षिणमावर्तेत ॥ ५ ॥ मनसा वा तत्समग्रमाचारमनुपालयेदापत्कल्पः ॥ ६ ॥ सत्यधर्म्मार्य्यवृत्तः शिष्टाध्यापकः शौचशिष्टः श्रुतिनिरतः स्यान्नित्यमहिंस्रो मृदुर्दृढकारी दमदा-
मट्ठा, इत्यादि (जिन का सार निकाल लिया गया हो) वस्तु न खावे व न लगावे। सायं प्रातः दोवार सन्ध्याग्नि होत्रादि के पश्चात् पकाये (ताजे) उत्तम अन्न को निन्दा न करता हुआ खाये। रात में नङ्गा कदापि न सोये और नंगा हो कर स्नान भी न करे। और जो सम्यग् विनय को प्राप्त हुए, दम्भ, लोभ, मोह, (अज्ञान से रहित) वेदवेत्ता आत्मज्ञानी वृद्ध लोगों के उपदेशानुसार आचरण करे। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति (योग) और प्राप्त की रक्षा (क्षेम) के लिये राजा के पास नित्य जाया करे। देवता गुरु और धार्मिक लोगों से भिन्न अन्य किसी से कुछ प्रार्थना वा निवेदन न करे। जहां ईंधन, जल, चारा, (घासादि) कुश, पुष्प और निकलने के मार्ग, ये आर्य्य (द्विज) लोगों से अधिकांश घिरे हों जिस में वायु का प्रवेश हो, जिस में अग्नि स्थापित हो चुका हो, जहां धार्मिक लोग इधर उधर बहुत हों ऐसे घर में निवास करने का यत्न करे। प्रशस्त स्थान, माङ्गलिक वस्तु (गौ) आदि, देवालय और चौराहे आदि जब २ मिलें तब २ इनकी प्रदक्षिणा करे ॥५॥ अथवा ये आचरण आपत्काल में ठीक २ न कर सके तो उस पूर्वोक्त सब आचार का मनसे ही पालन करे ॥६॥ सत्य धर्म पर सदा आरूढ़, श्रेष्ठ सदाचारी आर्यों कासा वर्त्ताव करे। शिक्षित उत्तम शील-स्वभाव वालों को वेदादि पढ़ावे। शौच धर्म की ठीक २ शिक्षा करे। वेद के पढ़ने पढ़ाने विचारने में तत्पर रहे। किसी को कभी भी दुःख देने की चेष्टा