भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषाभाष्यसहिता ॥ २९

नशीलएवमाचारो मातापितरौ पूर्वापरांश्च संबद्धान् दुरि-
तेभ्यो मोक्षयिष्यन् स्नातकः शश्वद्ब्रह्मलोकान्न च्यवते
न च्यवते ॥ ७ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥६॥
(इति प्रथमः प्रपाठकः)॥
द्विजातीनामध्ययनमिज्या दानं ब्राह्मणस्याधिकाः प्र-
वचनयाजनप्रतिग्रहाः पूर्वेषु नियमस्त्वाचार्यज्ञातिप्रियगु-
रुधनविद्याविनिमयेषु ब्राह्मणः संप्रदानमन्यत्र यथोक्तात्
कृषिवाणिज्ये चास्वयं कृते कुसीदंच ॥१॥ राज्ञोऽधिकं रक्षणं
सर्वभूतानां न्याय्यदण्डत्वं बिभृयाद् ब्राह्मणान् श्रोत्रियान्
निरुत्साहांश्चाब्राह्मणानकरांश्चोपकुर्वाणांश्च योगञ्च विजये भ-


न करे। कोमलता के साथ दृढ़ता से धर्म करे। मन को वश में रखता हुआ दानशील हो। इस प्रकार आचरण करता हुआ अपने माता पिता और इधर उधर आगे पीछे के कुटुम्बी तथा सम्बन्धियों को दुराचारों से बचाना चाहता हुआ स्नातक गृहस्थ पुरुष सनातन अविनाशी ब्रह्मलोक को प्राप्त होके फिर च्युत नहीं होता है ॥ ७ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवमाध्याय और प्रथम प्रपाठक पूरा हुआ ९ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों द्विजों के लिये वेद वेदाङ्गों का पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना ये तीनों कर्म एकसे हैं। वेदादि पढ़ाना, यज्ञ कराना, दान लेना ये कर्म ब्राह्मण के अधिक हैं। पहिले तीनों (वेदाध्ययनादि) में नियम यह है कि आचार्य, ज्ञाति, प्रिय, गुरु, धन, और विद्या इनके परिवर्तन में दान का पात्र ब्राह्मण ही माना जावे परन्तु शास्त्रोक्त कन्यादान लेने आदिको छोड़कर (क्षत्रियादिभी कन्यादि लेवें) यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय खेती और वणिज व्यापार करें तो स्वयं न करके अन्य भृत्यादि से करावें। और सूद भी न लेवें॥१॥ क्षत्रिय राजा के उक्त वेदाध्ययनादि तीन से अधिक (खास) काम ये हैं—सब प्राणियों की रक्षा करना, न्यायाानुकूल दण्ड देना, वेद वेत्ता वेदपाठी ब्राह्मणों का, निरुत्साही ब्राह्मणों से भिन्न क्षत्रियादि का, और राज कर न देने योग्य परोपकार में तत्पर पुरुषों का, क्षत्रिय राजा सदा ही भरण पोषण करे। विजय होने पर दान पुण्यादि कामों

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