भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२८ गौतमस्मृतिः ॥

ये विशेषेण चर्या च, रथधनुर्भ्यां संग्रामे संस्थानमन्निवृत्तिश्च न दोषो हिंसायामाहवेऽन्यत्र व्यश्वसारथ्यायुधकृताञ्जलिप्र- कीर्णकेशपराङ्मुखोपविष्टस्थलवृक्षाधिरूढदूतगोब्राह्मणवा- दिभ्यः क्षत्रियश्चेदन्यस्तमुपजीवेत्तद्वृत्तिः स्यात्, जेता लभेत सांग्रामिकं वित्तं वाहनं तु राज्ञउद्धारश्चापृथग्जयेऽन्यत्तु य- थाहं भाजयेद्राजा राज्ञे बलिदानं कर्षकैर्दशममष्टमं षष्ठं वा पशुहिरण्ययोरप्येके पञ्चाशद्भागं विंशतिभागः शुल्कः पण्ये मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणेन्धनानां षष्ठं तद्रक्षणध- र्म्मित्वात्तेषु तु नित्ययुक्तः स्यादधिके न वृत्तिः शिल्पिनो


का योग करे । शत्रु के अकस्मात् चढ़ाई कर देने का भय होने पर विशेष चि- न्ता से बर्त्ताव करे । रथ और धनुषादि शस्त्रों के साथ संग्राम के लिये स्थित ( खड़ा ) होजाय । संग्राम से कदापि न हटे । युद्ध के समय होने वाली हिंसा में वीर पुरुषों को दोष नहीं लगता । परन्तु जिसके घोड़े, सारथि, हथियार, छूट गये वा नष्ट हो गये हों, जो हाथ जोड़ के कहे कि मुझे न मारो, शिर के बाल जिसने खोल दिये हों, जिन ने युद्ध से पीठ फेरी हो, लौटा जाता हो, जो बैठ गया हो, जो सवारी से उतर के भूमि पर खड़ा वा बैठा हो वा वृक्ष पर चढ़ गया हो, दूत, गौ-बैल, ब्राह्मण न होने पर अपने को ब्राह्मण कह देवे, यदि अन्य कोई क्षत्रिय भी हो पर ब्राह्मण के आश्रय से जीविका करे, वा ब्राह्मण के वेदाध्यापनादि कामों से जीविका करता हो ऐसे सवारी से अ- लग हुए आदि को युद्ध में मारडालने पर हिंसा दोष लगता है । युद्ध में जिस धन को जो राज कर्मचारी जीते वह उसी को मिले । पर घोड़ा, रथ, हाथी, आदि सवारी राजा के ही होंगे चाहे कोई जीते । बहुतों ने मिलकर जो सा- मान जीता हो उसमें से यथा योग्य सबको राजा हिस्सा बांट देवे और जीते हुए सामान में राजा का भी भाग होगा । खेती करने वाले किसान लोग पै- दा किये अन्न में से दशवां, आठवां अथवा छठा भाग राजा को कर दिया करें। पशु और सुवर्ण में मूल से अधिक जितना पैदा हो उनमें से पचासवां भाग राजा को कर मिलना चाहिये । दुकान पर धरके बेचने की साधारण चीजों पर जो लाभ हो उनमें से बीशवां भाग राजा कर लेवे । मूल, फल, पुष्प, औषध, शहद, मांस, फूस, ( पूरा ) ईंधन ( लकड़ी, ) इनके लाभ में से छठा भाग रा- जा कर लेवे । क्योंकि खेती करनेवाले आदि की रक्षा करना राजा का धर्म