अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 601, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाधवार्यसंहिता ॥ ३९
मासिमास्येकैकं कर्म्म कुर्युस्तेनात्मोपजीविनो व्याख्याताः, नौचक्रीवन्तश्च भक्तं तेभ्यो दद्यात् पण्यं वणिग्भिरर्घापचये न देयं प्रणष्टमस्वामिकमधिगम्य राज्ञे प्रब्रूयुर्विख्याप्य राज्ञा संवत्सरं रक्ष्यमूर्ध्वमधिगन्तुश्चतुर्थं राज्ञः शेषं स्वामी रि- क्थक्रयसंविभागपरिग्रहाधिगमेषु ब्राह्मणस्याधिकं लब्धं क्ष- त्रियस्य विजितं निर्विष्टं वैश्यशूद्रयोर्निर्व्यधिगमो राजधनं न ब्राह्मणस्याभिरूपस्याब्राह्मणो व्याख्यातः षष्ठं लभेतेत्येके चौरहृतमुपजित्य यथास्थानं गमयेत् कोशाद्वा दद्याद् रक्ष्यं
है। इससे प्रजा की रक्षा में राजा नित्य अधिकता से दत्तचित्त रहे। बढ़ई लु- हार आदि कारीगर लोगों से तथा मज़दूर लोगों से राजा कर न लेवे किन्तु प्रत्येक महिने में एक२ दिन उनसे बेगारि में अपना काम करालेवे। नौका और गाड़ी इक्का चलाने वालों से भी कर न लेकर महिने२ में एक दिन काम कराले- वे। परन्तु कारीगरादि को उस दिन अपनी पाकशाला से भोजन करावे। यदि वैश्य लोगों को मूल में घटी पड़े लाभ कुछ न हो तो राजा उन से कुछ भी कर न लेवे। यदि किसी का माल अमत्राव खो गया हो तो प्रजा के लोग या राज कर्मचारी ( पुलिमादि ) जिनको पड़ा दीखे वे राज दरबार में जाकर इत्तला करें। तब राजा उस सामान के लिये विज्ञापन दे देवे तथा डुण्डुखिया पिटा देवे औ एक वर्ष तक उसकी रक्षा करे। पश्चात् यदि किसी का वह माल निक- ले तो प्रमाण मिलने पर उसको मिले। अन्यथा एक वर्ष के बाद जिसको पड़ा मि- ला हो उसको चौथाई देकर शेष राजा का होना चाहिये। उस माल का मालि- क राजा है। चाहे किसी का हक़ समझे उसे देवे या बेंचे या किन्ही को बांट देवे वा दान करदे अथवा स्वयं रखलेवे। अथवा जो धन कहीं अकस्मात् अ- धिक मिले वह ब्राह्मण का हो। युद्ध में जीता हुआ क्षत्रिय को मिले। सेवा वा परिश्रम से प्राप्त हुआ धन वैश्य शूद्रों का भाग है। पृथिवी में कहीं कोश , ( खजाना ) निकल वा वह राजाका धन है। यदि गुणवान् धर्मनिष्ठ ब्राह्मण को कोश मिले तो राजा न लेवे। किन्तु ब्राह्मण से भिन्न को मिला कोश राजा का होगा। और कोई आचार्य यह कहते हैं कि उस ब्राह्मण के कोश से भी राजा छठा भाग ले लेवे। किसी का धन चोर ले गये हों तो चोरों से छीन कर जिसका हो उसी को राजा दिलावे। यदि चोरों का पता न लगे