भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३० गौतमस्मृतिः ॥

बालधनमाव्यवहारप्रापणादासमावृत्तेर्वा ॥२॥ वैश्यस्याधिकं कृषिवणिक्पाशुपाल्यकुसीदम् ॥ ३ ॥ शूद्रश्चतुर्थो वर्णएकजातिस्तस्यापि सत्यमक्रोधः शौचमाचमनार्थे पाणिपादमक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म्म भृत्यभरणं स्वद्वारवृत्तिः परिचर्या चोत्तरेषां तेभ्यो वृत्तिं लिप्सेत जीर्णान्युपानच्छत्रवासःकूर्च्चान्युच्छिष्टाशनं शिल्पवृत्तिश्च यं चायमाश्रयते भर्त्तव्यस्तेन क्षीणीऽपि तेन चोत्तरस्तदर्थोऽस्य निचयः स्यादनुज्ञातोऽस्य नमस्कारो मन्त्रः पाकयज्ञैः स्वयं यजेतेत्येके ॥ ४ ॥


तो राजा अपने कोश ( खजाने ) से उतना धन उस को दिलावे कि जिसका जितना धन चोरी गया हो। नावालिग के वा ब्रह्मचारी के धन वा रियासत की राजा तब तक रक्षा करे कि जब तक वह बड़ा सम्हालने योग्य न हो अथवा समावर्त्तन न करे ॥ २ ॥ पहिले कहे वेदाध्ययनादि तीन कर्मों से अधिक वैश्य के निम्न लिखित काम हैं। खेती, व्यापार, पशुपालन, (गोरक्षा ) और सूद ( ब्याज ) लेना ॥ ३ ॥ शूद्र चौथा वर्ण एकजाति है अर्थात् उपनयनादि संस्कार न होने से द्विजाति नहीं होता। उस के लिये भी सत्य बोलना क्रोध का त्याग आचमन के लिये हाथ पांव धोना, इतना ही कर्म शूद्र का है यह कोई आचार्य कहते हैं। वेदमन्त्रों को छोड़ के स्मार्त्त वा पौराणिक मन्त्रादि से श्राद्ध करना, स्त्रीपुत्रादि का पालन पोषण करना, अपने द्वार पर रहना, ब्राह्मणादि तीनों वर्णों की सेवा करना, उन्हीं से अपने निर्वाहार्थजीविका लिया करे। द्विजों के पुराने जूता, छाता, वस्त्र, और झाडू आदि वस्तु ले लेवे। द्विजों के चौके में बचा भोजन लेलिया करे। तथा मकान घर बनाना अथवा चित्रकारी आदि कारीगरी के कामों से जीविका करे। जिस द्विजकी सहायता शूद्र चाहे उसीको इस का भरण पोषण अपना काम लेके कर्त्तव्य है। उसी अपने धनहीन भी मालिक की सेवा से ही शूद्र बड़ा प्रतिष्ठित बन सकता है। उसी मालिक के लिये शूद्र अपने सर्वस्व को माने। शूद्र के लिये देवता के नाम के साथ ( नमः ) पद लगा लेना ही परमोत्तम मन्त्र शास्त्रानुकूल है। जैसे ( शिवाय नमः । विष्णवे नमः । देव्यै नमः । गणपतये नमः । अग्नये नमः । सोमाय नमः) इत्यादि मन्त्रों द्वारा पकाये भात आदि हविष्यान्न से स्वयं होम यज्ञ शूद्र किया करे यह कोई आचार्य कहते हैं ॥ ४ ॥