अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ २५
धान्न भस्मकरीषकृष्टच्छायापथिकाम्येषूभे मूत्रपुरीषे दिवा कुर्यादुदङ्मुखः संध्ययोश्च रात्रौ दक्षिणमुखः पालाशमास- नं पादुके दन्तधावनमिति वर्ज्जयेत् ॥३॥ सोपानत्कश्चाश- नासनशयनाभिवादननमस्कारान् वर्ज्जयेत् ॥ ४॥ न पूर्वा- ह्णमध्यन्दिनापराह्णानफलान्कुर्याद् यथाशक्ति धर्मार्थ- कामेभ्यस्तेषु च धर्म्मोत्तरःस्यान्न नग्नां परयोषितमीक्षेत न पदासनमाकर्षेन्न शिश्नोदरपाणिपादवाक्चक्षुश्चापलानि कु- र्याच्छेदनभेदनविलेखनविमर्दनास्फोटनानि नाकस्मात्कुर्या- न्नोपरि वत्सतन्त्रीं गच्छेन्न जलकूले स्यान्न यज्ञमवृतो गच्छेद् दर्शनाय तु कामं, न भक्ष्यानुत्संगे भक्षयेन्न रात्रौ प्रेष्याहृतमु- द्धृतस्नेहविलेपनपिण्याकमथितप्रभृतीनि चात्तवीर्याणि ना-
की भूमि पर घर के उन पर मल मूत्रका त्याग करे। घर के समीप मल मूत्र का त्याग न करे, भस्म, फूटे कपड़े, जोता खेत, छाया, मार्ग, और रमणीक ज- गह में मल मूत्र का त्याग न करे। दिन में तथा सायं प्रातः सन्ध्या के समय उत्तर को मुख करके और रात्रि में दक्षिण को मुख करके मल मूत्र का त्याग करे। ढांक की लकड़ी वा पत्तों का बैठने को आसन, (पटा) खड़ासू (पा- दुका) और दातौन न बनावे ॥ ३॥ भोजन करना, आसन पर बैठना, शय्या पर लेटना, बड़े मान्यों को अभिवादन, और बराबर वालों को नमस्कार इन कामों को जूता पहने हुए न करे ॥४॥ पूर्वाह्न, मध्यान्ह और अपराह्न को निष्फ- न करे किन्तु उन २ समय के धर्म कृत्यों द्वारा सफल करे। यथाशक्ति धर्म अर्थ और कामना की सिद्धि के लिये समयों को लगावे और तीनों में धर्म को सर्वोपरि सेवन करने का यत्न करता रहे। पराई स्त्री को नंगी न देखे। पग से आसन को न खींचे। शिश्न, (गुप्तेन्द्रिय) उदर, हाथ, पग, वाणी, चक्षु, इन को चपल न रक्खे। विना प्रयोजन किसी वस्तु का छेदन (दो टुकड़े) भेदन, खोदना, मसलना, बजाना, अकस्मात् न करे। बंधे हुए बछड़े की रस्सी के ऊपर लांघकर न निकले। जलाशय के तट पर न बैठे। वरण हुए वा बु- लाये विना किसी के यज्ञ में न जावे । पर देखने को भले ही जावे। खाने योग्य वस्तुओं को गोदी में धर कर न खावे। रात्रि में भृत्य की लायी वस्तु, जिस की चिकनाई निकाल ली हो, विलेपन (उबटन) पिण्याक (पीना-खली)
२६ गौतमस्मृतिः ॥
श्रीयीत, सायं प्रातस्त्वन्नमभिपूजितमनिन्दन् भुञ्जीत न कदाचिदु रात्रौ नग्नः स्वपेत् स्नायाद्वा यच्चात्मवन्तो वृद्धाः सम्यग्विनीता दम्भलोभमोहवियुक्ता वेदविद आचक्षते तत्तमाचरेद् योगक्षेमार्थमीश्वरमधिगच्छेन्नान्यमन्यत्र देवगुरुधार्म्मिकेभ्यः प्रभूतेधोदकयवसकुशमाल्योपनिष्क्रमणमार्य्यजनभूयिष्ठमनलसमृद्धं धार्म्मिकाधिष्ठितं निकेतनमावसितुं यतेत प्रशस्तमाङ्गल्यदेवतायतनचतुष्पथादीन् प्रदक्षिणमावर्तेत ॥ ५ ॥ मनसा वा तत्समग्रमाचारमनुपालयेदापत्कल्पः ॥ ६ ॥ सत्यधर्म्मार्य्यवृत्तः शिष्टाध्यापकः शौचशिष्टः श्रुतिनिरतः स्यान्नित्यमहिंस्रो मृदुर्दृढकारी दमदा-
मट्ठा, इत्यादि (जिन का सार निकाल लिया गया हो) वस्तु न खावे व न लगावे। सायं प्रातः दोवार सन्ध्याग्नि होत्रादि के पश्चात् पकाये (ताजे) उत्तम अन्न को निन्दा न करता हुआ खाये। रात में नङ्गा कदापि न सोये और नंगा हो कर स्नान भी न करे। और जो सम्यग् विनय को प्राप्त हुए, दम्भ, लोभ, मोह, (अज्ञान से रहित) वेदवेत्ता आत्मज्ञानी वृद्ध लोगों के उपदेशानुसार आचरण करे। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति (योग) और प्राप्त की रक्षा (क्षेम) के लिये राजा के पास नित्य जाया करे। देवता गुरु और धार्मिक लोगों से भिन्न अन्य किसी से कुछ प्रार्थना वा निवेदन न करे। जहां ईंधन, जल, चारा, (घासादि) कुश, पुष्प और निकलने के मार्ग, ये आर्य्य (द्विज) लोगों से अधिकांश घिरे हों जिस में वायु का प्रवेश हो, जिस में अग्नि स्थापित हो चुका हो, जहां धार्मिक लोग इधर उधर बहुत हों ऐसे घर में निवास करने का यत्न करे। प्रशस्त स्थान, माङ्गलिक वस्तु (गौ) आदि, देवालय और चौराहे आदि जब २ मिलें तब २ इनकी प्रदक्षिणा करे ॥५॥ अथवा ये आचरण आपत्काल में ठीक २ न कर सके तो उस पूर्वोक्त सब आचार का मनसे ही पालन करे ॥६॥ सत्य धर्म पर सदा आरूढ़, श्रेष्ठ सदाचारी आर्यों कासा वर्त्ताव करे। शिक्षित उत्तम शील-स्वभाव वालों को वेदादि पढ़ावे। शौच धर्म की ठीक २ शिक्षा करे। वेद के पढ़ने पढ़ाने विचारने में तत्पर रहे। किसी को कभी भी दुःख देने की चेष्टा
भाषाभाष्यसहिता ॥ २९
नशीलएवमाचारो मातापितरौ पूर्वापरांश्च संबद्धान् दुरि-
तेभ्यो मोक्षयिष्यन् स्नातकः शश्वद्ब्रह्मलोकान्न च्यवते
न च्यवते ॥ ७ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥६॥
(इति प्रथमः प्रपाठकः)॥
द्विजातीनामध्ययनमिज्या दानं ब्राह्मणस्याधिकाः प्र-
वचनयाजनप्रतिग्रहाः पूर्वेषु नियमस्त्वाचार्यज्ञातिप्रियगु-
रुधनविद्याविनिमयेषु ब्राह्मणः संप्रदानमन्यत्र यथोक्तात्
कृषिवाणिज्ये चास्वयं कृते कुसीदंच ॥१॥ राज्ञोऽधिकं रक्षणं
सर्वभूतानां न्याय्यदण्डत्वं बिभृयाद् ब्राह्मणान् श्रोत्रियान्
निरुत्साहांश्चाब्राह्मणानकरांश्चोपकुर्वाणांश्च योगञ्च विजये भ-
न करे। कोमलता के साथ दृढ़ता से धर्म करे। मन को वश में रखता हुआ दानशील हो। इस प्रकार आचरण करता हुआ अपने माता पिता और इधर उधर आगे पीछे के कुटुम्बी तथा सम्बन्धियों को दुराचारों से बचाना चाहता हुआ स्नातक गृहस्थ पुरुष सनातन अविनाशी ब्रह्मलोक को प्राप्त होके फिर च्युत नहीं होता है ॥ ७ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में नवमाध्याय और प्रथम प्रपाठक पूरा हुआ ९ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों द्विजों के लिये वेद वेदाङ्गों का पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना ये तीनों कर्म एकसे हैं। वेदादि पढ़ाना, यज्ञ कराना, दान लेना ये कर्म ब्राह्मण के अधिक हैं। पहिले तीनों (वेदाध्ययनादि) में नियम यह है कि आचार्य, ज्ञाति, प्रिय, गुरु, धन, और विद्या इनके परिवर्तन में दान का पात्र ब्राह्मण ही माना जावे परन्तु शास्त्रोक्त कन्यादान लेने आदिको छोड़कर (क्षत्रियादिभी कन्यादि लेवें) यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय खेती और वणिज व्यापार करें तो स्वयं न करके अन्य भृत्यादि से करावें। और सूद भी न लेवें॥१॥ क्षत्रिय राजा के उक्त वेदाध्ययनादि तीन से अधिक (खास) काम ये हैं—सब प्राणियों की रक्षा करना, न्यायाानुकूल दण्ड देना, वेद वेत्ता वेदपाठी ब्राह्मणों का, निरुत्साही ब्राह्मणों से भिन्न क्षत्रियादि का, और राज कर न देने योग्य परोपकार में तत्पर पुरुषों का, क्षत्रिय राजा सदा ही भरण पोषण करे। विजय होने पर दान पुण्यादि कामों
२८ गौतमस्मृतिः ॥
ये विशेषेण चर्या च, रथधनुर्भ्यां संग्रामे संस्थानमन्निवृत्तिश्च न दोषो हिंसायामाहवेऽन्यत्र व्यश्वसारथ्यायुधकृताञ्जलिप्र- कीर्णकेशपराङ्मुखोपविष्टस्थलवृक्षाधिरूढदूतगोब्राह्मणवा- दिभ्यः क्षत्रियश्चेदन्यस्तमुपजीवेत्तद्वृत्तिः स्यात्, जेता लभेत सांग्रामिकं वित्तं वाहनं तु राज्ञउद्धारश्चापृथग्जयेऽन्यत्तु य- थाहं भाजयेद्राजा राज्ञे बलिदानं कर्षकैर्दशममष्टमं षष्ठं वा पशुहिरण्ययोरप्येके पञ्चाशद्भागं विंशतिभागः शुल्कः पण्ये मूलफलपुष्पौषधमधुमांसतृणेन्धनानां षष्ठं तद्रक्षणध- र्म्मित्वात्तेषु तु नित्ययुक्तः स्यादधिके न वृत्तिः शिल्पिनो
का योग करे । शत्रु के अकस्मात् चढ़ाई कर देने का भय होने पर विशेष चि- न्ता से बर्त्ताव करे । रथ और धनुषादि शस्त्रों के साथ संग्राम के लिये स्थित ( खड़ा ) होजाय । संग्राम से कदापि न हटे । युद्ध के समय होने वाली हिंसा में वीर पुरुषों को दोष नहीं लगता । परन्तु जिसके घोड़े, सारथि, हथियार, छूट गये वा नष्ट हो गये हों, जो हाथ जोड़ के कहे कि मुझे न मारो, शिर के बाल जिसने खोल दिये हों, जिन ने युद्ध से पीठ फेरी हो, लौटा जाता हो, जो बैठ गया हो, जो सवारी से उतर के भूमि पर खड़ा वा बैठा हो वा वृक्ष पर चढ़ गया हो, दूत, गौ-बैल, ब्राह्मण न होने पर अपने को ब्राह्मण कह देवे, यदि अन्य कोई क्षत्रिय भी हो पर ब्राह्मण के आश्रय से जीविका करे, वा ब्राह्मण के वेदाध्यापनादि कामों से जीविका करता हो ऐसे सवारी से अ- लग हुए आदि को युद्ध में मारडालने पर हिंसा दोष लगता है । युद्ध में जिस धन को जो राज कर्मचारी जीते वह उसी को मिले । पर घोड़ा, रथ, हाथी, आदि सवारी राजा के ही होंगे चाहे कोई जीते । बहुतों ने मिलकर जो सा- मान जीता हो उसमें से यथा योग्य सबको राजा हिस्सा बांट देवे और जीते हुए सामान में राजा का भी भाग होगा । खेती करने वाले किसान लोग पै- दा किये अन्न में से दशवां, आठवां अथवा छठा भाग राजा को कर दिया करें। पशु और सुवर्ण में मूल से अधिक जितना पैदा हो उनमें से पचासवां भाग राजा को कर मिलना चाहिये । दुकान पर धरके बेचने की साधारण चीजों पर जो लाभ हो उनमें से बीशवां भाग राजा कर लेवे । मूल, फल, पुष्प, औषध, शहद, मांस, फूस, ( पूरा ) ईंधन ( लकड़ी, ) इनके लाभ में से छठा भाग रा- जा कर लेवे । क्योंकि खेती करनेवाले आदि की रक्षा करना राजा का धर्म
माधवार्यसंहिता ॥ ३९
मासिमास्येकैकं कर्म्म कुर्युस्तेनात्मोपजीविनो व्याख्याताः, नौचक्रीवन्तश्च भक्तं तेभ्यो दद्यात् पण्यं वणिग्भिरर्घापचये न देयं प्रणष्टमस्वामिकमधिगम्य राज्ञे प्रब्रूयुर्विख्याप्य राज्ञा संवत्सरं रक्ष्यमूर्ध्वमधिगन्तुश्चतुर्थं राज्ञः शेषं स्वामी रि- क्थक्रयसंविभागपरिग्रहाधिगमेषु ब्राह्मणस्याधिकं लब्धं क्ष- त्रियस्य विजितं निर्विष्टं वैश्यशूद्रयोर्निर्व्यधिगमो राजधनं न ब्राह्मणस्याभिरूपस्याब्राह्मणो व्याख्यातः षष्ठं लभेतेत्येके चौरहृतमुपजित्य यथास्थानं गमयेत् कोशाद्वा दद्याद् रक्ष्यं
है। इससे प्रजा की रक्षा में राजा नित्य अधिकता से दत्तचित्त रहे। बढ़ई लु- हार आदि कारीगर लोगों से तथा मज़दूर लोगों से राजा कर न लेवे किन्तु प्रत्येक महिने में एक२ दिन उनसे बेगारि में अपना काम करालेवे। नौका और गाड़ी इक्का चलाने वालों से भी कर न लेकर महिने२ में एक दिन काम कराले- वे। परन्तु कारीगरादि को उस दिन अपनी पाकशाला से भोजन करावे। यदि वैश्य लोगों को मूल में घटी पड़े लाभ कुछ न हो तो राजा उन से कुछ भी कर न लेवे। यदि किसी का माल अमत्राव खो गया हो तो प्रजा के लोग या राज कर्मचारी ( पुलिमादि ) जिनको पड़ा दीखे वे राज दरबार में जाकर इत्तला करें। तब राजा उस सामान के लिये विज्ञापन दे देवे तथा डुण्डुखिया पिटा देवे औ एक वर्ष तक उसकी रक्षा करे। पश्चात् यदि किसी का वह माल निक- ले तो प्रमाण मिलने पर उसको मिले। अन्यथा एक वर्ष के बाद जिसको पड़ा मि- ला हो उसको चौथाई देकर शेष राजा का होना चाहिये। उस माल का मालि- क राजा है। चाहे किसी का हक़ समझे उसे देवे या बेंचे या किन्ही को बांट देवे वा दान करदे अथवा स्वयं रखलेवे। अथवा जो धन कहीं अकस्मात् अ- धिक मिले वह ब्राह्मण का हो। युद्ध में जीता हुआ क्षत्रिय को मिले। सेवा वा परिश्रम से प्राप्त हुआ धन वैश्य शूद्रों का भाग है। पृथिवी में कहीं कोश , ( खजाना ) निकल वा वह राजाका धन है। यदि गुणवान् धर्मनिष्ठ ब्राह्मण को कोश मिले तो राजा न लेवे। किन्तु ब्राह्मण से भिन्न को मिला कोश राजा का होगा। और कोई आचार्य यह कहते हैं कि उस ब्राह्मण के कोश से भी राजा छठा भाग ले लेवे। किसी का धन चोर ले गये हों तो चोरों से छीन कर जिसका हो उसी को राजा दिलावे। यदि चोरों का पता न लगे
३० गौतमस्मृतिः ॥
बालधनमाव्यवहारप्रापणादासमावृत्तेर्वा ॥२॥ वैश्यस्याधिकं कृषिवणिक्पाशुपाल्यकुसीदम् ॥ ३ ॥ शूद्रश्चतुर्थो वर्णएकजातिस्तस्यापि सत्यमक्रोधः शौचमाचमनार्थे पाणिपादमक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म्म भृत्यभरणं स्वद्वारवृत्तिः परिचर्या चोत्तरेषां तेभ्यो वृत्तिं लिप्सेत जीर्णान्युपानच्छत्रवासःकूर्च्चान्युच्छिष्टाशनं शिल्पवृत्तिश्च यं चायमाश्रयते भर्त्तव्यस्तेन क्षीणीऽपि तेन चोत्तरस्तदर्थोऽस्य निचयः स्यादनुज्ञातोऽस्य नमस्कारो मन्त्रः पाकयज्ञैः स्वयं यजेतेत्येके ॥ ४ ॥
तो राजा अपने कोश ( खजाने ) से उतना धन उस को दिलावे कि जिसका जितना धन चोरी गया हो। नावालिग के वा ब्रह्मचारी के धन वा रियासत की राजा तब तक रक्षा करे कि जब तक वह बड़ा सम्हालने योग्य न हो अथवा समावर्त्तन न करे ॥ २ ॥ पहिले कहे वेदाध्ययनादि तीन कर्मों से अधिक वैश्य के निम्न लिखित काम हैं। खेती, व्यापार, पशुपालन, (गोरक्षा ) और सूद ( ब्याज ) लेना ॥ ३ ॥ शूद्र चौथा वर्ण एकजाति है अर्थात् उपनयनादि संस्कार न होने से द्विजाति नहीं होता। उस के लिये भी सत्य बोलना क्रोध का त्याग आचमन के लिये हाथ पांव धोना, इतना ही कर्म शूद्र का है यह कोई आचार्य कहते हैं। वेदमन्त्रों को छोड़ के स्मार्त्त वा पौराणिक मन्त्रादि से श्राद्ध करना, स्त्रीपुत्रादि का पालन पोषण करना, अपने द्वार पर रहना, ब्राह्मणादि तीनों वर्णों की सेवा करना, उन्हीं से अपने निर्वाहार्थजीविका लिया करे। द्विजों के पुराने जूता, छाता, वस्त्र, और झाडू आदि वस्तु ले लेवे। द्विजों के चौके में बचा भोजन लेलिया करे। तथा मकान घर बनाना अथवा चित्रकारी आदि कारीगरी के कामों से जीविका करे। जिस द्विजकी सहायता शूद्र चाहे उसीको इस का भरण पोषण अपना काम लेके कर्त्तव्य है। उसी अपने धनहीन भी मालिक की सेवा से ही शूद्र बड़ा प्रतिष्ठित बन सकता है। उसी मालिक के लिये शूद्र अपने सर्वस्व को माने। शूद्र के लिये देवता के नाम के साथ ( नमः ) पद लगा लेना ही परमोत्तम मन्त्र शास्त्रानुकूल है। जैसे ( शिवाय नमः । विष्णवे नमः । देव्यै नमः । गणपतये नमः । अग्नये नमः । सोमाय नमः) इत्यादि मन्त्रों द्वारा पकाये भात आदि हविष्यान्न से स्वयं होम यज्ञ शूद्र किया करे यह कोई आचार्य कहते हैं ॥ ४ ॥
भाषार्थसहित ॥ ३१
सर्वे चोत्तरोत्तरं परिचरेयुरार्यार्नार्ययोर्व्यतिक्षेपे कर्मणः साम्यं साम्यम् ॥ ५ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ राजा सर्वस्येष्टे ब्राह्मणवर्जं साधुकारी स्यात् साधुवादी त्रय्यामान्वीक्षिक्यां चाभिविनीतः शुचिर्जितेन्द्रियो गुणवत्सहायोऽपायसंपन्नः समः प्रजासु स्याद्धितं चासां कुर्वीत, तमुपर्य़ासीनमधस्तादुपासीरन्नन्ये ब्राह्मणेभ्यस्तेऽप्येनं मन्येरन्, वर्णानाश्रमांश्च न्यायतोऽभिरक्षेच्चलतश्चैनान्स्वधर्मे एव स्थापयेद्धर्म्मस्योऽशभाग्भवतीति विज्ञायते। ब्राह्मणं च पुरोदधीत विद्याभिजनवाग्रूपवयःशीलसंपन्नं न्यायवृत्तं तपस्विनं
सब वर्ण अपने २ से ऊपर २ वर्ण की सेवा करें जैसे साधारण मूर्ख ब्राह्मण विद्वानों की, क्षत्रिय ब्राह्मणों की, वैश्य क्षत्रियों की, और शूद्र वैश्यों की सेवा करें। क्योंकि ब्राह्मणादि और शूद्रादि का अधिक संसर्ग होने से लौट पोट हो कर दोनों के कर्म एक से ही बिगड़ेंगे हानि होगी ॥ ५ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
ब्राह्मण को छोड़कर राजा सबका ईश्वर है। राजा अच्छे निर्दोष काम करे। सत्य और कोमल भाषण करे। तीनों वेदों की त्रयीविद्या और न्याय शास्त्र का अच्छा जानने वाला राजा हो, विनीत स्वभाव रक्खे, पवित्र रहे, जितेन्द्रिय हो, गुणवान् पुरुषों को अपना सहायक बनावे, उन्ही से सलाह सम्मति करे, दानशील हो, प्रजाओं पर समदृष्टि रक्खे, प्रजाओंका हित किया करे, ऊपर गद्दी पर बैठे ( विराजमान ) उस राजा से नीचे सब प्रजा के लोग (ब्राह्मणों को छोड़कर) बैठाकरें। ब्राह्मणलोग भी राजाका मान्य कियाकरें। वर्णों और आश्रमों की राजा न्यायधर्म से सदा रक्षा करे। यदि ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रम अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हों तो उनको अपने२ धर्म पर ही स्थापित करे। यदि वर्ण तथा आश्रम अधर्मस्थ हो जांय तो उस अधर्म का भाग राजा को भी लगता है यह वेद में लिखा है। अच्छी वाणी, अच्छेरूप, अच्छी अवस्था और अच्छे स्वभाव वाले, जिसका बर्त्ताव आचार विचार न्यायाानुकूल धर्म युक्त हो ऐसे कुलीन तपस्वी विद्वान् ब्राह्मण
५
३२ गौतमस्मृतिः ॥
तत्प्रसूतः कर्माणि कुर्वीत, ब्रह्मप्रसूतं हि क्षत्रमृध्यते न व्यथत इति च विज्ञायते । यानि च दैवोत्पातचिन्तकाः प्रब्रूयुस्तान्याद्रियेत तदधीनमपि ह्येके, योगक्षेमं प्रतिजानते शान्तिपुण्याहस्वस्त्ययनायुष्यमङ्गलसंयुक्तान्याभ्युदयिकानि विद्वेषिणां संवलनमभिचारद्विषद्व्याधिसंयुक्तानि च शालाग्नौ कुर्याद् यथोक्तमृत्विजोऽन्यानि, तस्य व्यवहारो वेदो धर्म्मशास्त्राण्यङ्गान्यपवेदाः पुराणं देशजातिकुलधर्म्माश्चाम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणं कर्षकवणिक्पशुपालकुसीदकारवः स्वे स्वे वर्गे तेभ्यो यथाधिकारमर्थान् प्रत्यवहृत्य धर्म्मव्यवस्था न्या-
को राजा गुरु नियत करे । उसकी प्रेरणा आज्ञा वा सलाह सम्मति से राज्य के प्रबन्ध सम्बन्धी सब काम किया करे । क्योंकि वेद से यह जाना गया है कि ब्राह्मण की आज्ञा प्रेरणा से चलने वाला ही क्षत्रिय राजा बढ़ता है और दुःखी वा पीड़ित नहीं होता । और जिन बातों को दैवी उत्पातों ( शकुनों ) के चिन्तक ( जानने वाले ज्योतिषी आदि ) लोग कहें उन विचारों का भी आदर करे माने । कोई आचार्य कहते हैं कि देवोत्पात चिन्तकों के आधीन राजा रहे क्योंकि ये दैवज्ञ लोग योगक्षेम की उत्तमता होने की प्रतिज्ञा कर सक्ते हैं। उत्पात दीखने पर शान्तिकरण पुण्याहवाचन स्वस्ति वाचन, आयुष्यकारी और माङ्गल्य संयुक्त वेद शास्त्रोक्त आभ्युदयिक कामों को तथा शत्रुओं को दबाने के लिये मारणप्रयोग अथवा उनकी व्याधिरूप बना देने के काम स्थापित किये यज्ञशाला के अग्नि से करे करावे । और राजा के ऋत्विज् लोग शास्त्रोक्त अन्य काम भी शत्रुओं दबाने तथा अपने राजा की रक्षा के लिये करें । वेद, धर्मशास्त्र, वेद के छः अङ्ग, चार उपवेद, और इतिहास पुराण इन ग्रन्थों के अनुकूल राजा का व्यवहार होना चाहिये । देश धर्म, जाति धर्म, और कुल धर्म ये वेदादि शास्त्रों से विरुद्ध न होने पर प्रमाण कोटि में गिने जायेंगे । किसान, वैश्य, पशुपालक ( गोपाल जाति ) सूद लेनेवाले और सुनार लुहार आदि कारीगर इन सब को अपने२ वर्ग में स्थापित रक्खे । अर्थात् अपने कर्तव्य कर्म को छोड़कर कोई अन्य वर्ग में सम्मिलित होने की चेष्टा न करे । उन२ की योग्यता शक्ति के अनुसार धनादि पदार्थ लेकर राजा धर्म
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३३
याधिगमे तर्कोऽभ्युपायस्तेनाभ्यूह्य यथास्थानं गमयेद् विप्रतिपत्तौ त्रयीविद्यावृद्धेभ्यः प्रत्यवहृत्य निष्ठां गमयेद्यथाहास्य निःश्रेयसं भवति, ब्रह्म क्षत्रेण संपृक्तं देवपितृमनुष्यान् धारयतीति विज्ञायते, दण्डोदमनादित्याहुस्तेनादान्तान् दमयेद्वर्णाश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुःश्रुतवित्तवृत्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते, विष्वञ्चो विपरीता नश्यन्ति तानाचार्योपदेशो दण्डश्च पालयते तस्माद्राजाचार्यावनिन्द्यावनिन्द्यौ॥१॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
की व्यवस्था करे। न्याय की बात खोजने के लिये तर्क ही मुख्य उपाय है। उस तर्क से ऊहा करके राजा यथोचित व्यवस्था करे। यदि तर्क से भी किसी विषय का निश्चय न हो किन्तु विरोध ही सब पक्षों में दीख पड़े तो तीनों वेद सम्बन्धी अर्था विद्या में बड़े बड़े विद्वान् ब्राह्मणों के निकट जाकर व्यवस्था मांगे अर्थात् उनकी राय से फैसला कर देवे। ऐसा करने से राजा का परम कल्याण होता है। क्षत्रत्व से मिला हुआ ब्रह्मत्व-देव, पितर, और मनुष्यों को धारण करता है यह वेद से जाना गया है। दमन ( वशी ) करने अर्थ से दण्ड शब्द बना है ऐसा आचार्य लोग कहते हैं। उस दण्ड के द्वारा राजा अदान्तों (अपने आपसे बाहर होने वाले दुराचारियों) को वशीभूत करे। ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रम अपने २ धर्म कर्म में तत्पर रहते हुए मरणानन्तर अपने कर्मों से स्वर्ग भोग फल का दीर्घ कालतक अनुभव करके शेष बचे पुण्य के बल से उत्तम देश, जाति कुलों में सुरूपवान्, दीर्घायुवाले, विद्यावान्, श्रीमान्, सदाचारी, बुद्धिमान् और सुख के सामान से युक्त हुए जन्म लेते हैं। सब वर्णाश्रमों से विपरीत दुराचारादि में चलने वाले नष्ट होते दुःख भोगते हैं। उनको गुरु लोगों वा आचार्यों का (धर्मशास्त्रोक्त) उपदेश और राजा का दण्ड रक्षा करता है। इससे राजा और वेद के विद्वान् साचार्यों की निन्दा कदापि न करे ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥११॥
| ३४ | गौतमस्मृतिः ॥ |
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शूद्रो द्विजातीनभिसंधायाभिहत्य च वाग्दण्डपारुण्या- भ्यामङ्गेन मोच्यो येनोपहन्यादार्यस्त्र्यभिगमने लिङ्गोद्धारः स्वप्रहरणं च गोप्ता चेद्वधोऽधिकोऽथाहास्य वेदमुपशृण्व- तस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेद आसनशयनवावपथिषु समप्रेप्सुर्दण्ड्यः शतम् ॥१॥ क्षत्रियो ब्राह्मणाक्रोशे दण्डपारुष्ये द्विगुणमध्यक्षं वैश्यो ब्रा- ह्मणस्तु क्षत्रिये पञ्चाशत्तदधं वैश्ये न शूद्रे किंचित,ब्राह्मण राजन्यवत् क्षत्रियवैश्यावष्टापाद्यं स्तेयकिल्विषं शूद्रस्य द्वि- गुणोत्तराणीतरेषां प्रतिवर्णं विदुषोऽतिक्रमे दण्डभूयस्त्वं
शूद्र पुरुष यदि ब्राह्मणादि द्विजों के निकट आके वा संकेत करके गा- ली देवै धमकावै वा लकड़ी आदि से मारे पीटे तो जिस अङ्ग से वह अपरा- ध करे राजा उसी अंग को कटवा देवे । यदि द्विजों की स्त्रियों के साथ शूद्र व्यभिचार करे तो लिङ्गेन्द्रिय को कटवा देवे और उस शूद्र का धनादि प- दार्थ छीन लेवे (जुर्माना करदे) यदि वह अपनी रक्षा करता हो तो राजा वध करा देवे । यदि समझ पूर्वक वेद को सुनता हो तो शीशा और जस्ता- पिघला कर कानों में डलवा देवे । यदि वेद का स्वयं उच्चारण करे तो शूद्र की जिह्वा कटवादेवे यदि शूद्र ने वेदों को कण्ठस्थ किया हो तो शिर कटवा के मरवा डाले । यदि आसन, शय्या (सेज, ) वाणी बोलने और मार्ग में चलने की बराबरी ब्राह्मणादि के साथ शूद्र करे तो राजा उस पर सौ रुपये दण्ड (जुर्माना) करे ॥१॥ यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को गाली दे वा धमकावे, निन्दा करे तो दो सौ रुपये दण्ड (जुर्माना ) करे । यदि वैश्य, ब्राह्मण की निन्दादि करे तो १५०) डेढ़ सौ रू० दण्ड (जुर्माना ) करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय की निन्दादि करे तो ५०) रू० दण्ड, वैश्य की निन्दादि करे तो २५) रु० दण्ड देवे और शूद्र की निन्दादि करे तो कुछ भी दंड राजा न देवे । क्षत्रिय तथा वैश्य यदि शूद्र की निन्दादि करें धमकावें तो ब्राह्मण और राजा के तुल्य उन को भी कुछ दण्ड न देवे । चोरी के अपराध में जि- तना (अष्टगुणा) शूद्र को दोष लगता है तब १६ गुणा वैश्य को ३२ गुणा क्षत्रिय को और ६४ गुणा दोष ब्राह्मण को लगता है । विद्वान् का निरादर करने पर शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण इन को क्रमशः अधिक २ दंड हो-
॥ भाषार्थसहिता ॥ ३५
फलहरितधान्यशाकादाने पञ्चकृष्णलमल्पे पशुपीड़िते स्वा- मिदोषः पालसंयुक्ते तु तस्मिन् पथि क्षेत्रेऽनावृते पालक्षेत्रि कयोः पञ्च माषा गवि षडुष्ट्रे खरेऽश्वमहिष्योर्दशाजाविषु द्वौ द्वौ सर्वविनाशे शतं, शिष्टाकरणे प्रतिषिद्धसेवायां च नि- त्यं चेलपिण्डादूर्ध्वं स्वहरणङ्गवाऽन्यर्थे तृणमेधान्वीरुद्वन- स्पतीनां च पुष्पाणि स्ववदाददीत, फलानि चापरिवृता- नां कुसीदवृद्धिर्धर्म्या विंशतिः पञ्च माषकी मासं नातिसांव- त्सरीमेके चिरस्थाने द्वैगुण्यं प्रयोगस्य मुक्ताभिर्न वर्द्धते दि- त्सतोऽवरुद्धस्य च चक्रकालवृद्धिः कारिताकायिकाऽधिभो-
ना चाहिये । अर्थात शूद्र से अधिक वैश्य को और सब से अधिक दंड ब्राह्म- ण को हो । फल, हरा धान्य और शाकों के चुराने पर चार रत्ती सुवर्ण का दंड (जुर्माना) करे । पशुओं के द्वारा खेत की थोड़ी हानि हो तो पशु के मालिक का दोष होगा । यदि चरवाहा (ग्वालिया) साथ में हो तो ग्वा- लिया का दोष होगा । यदि मार्ग के पास २ खेत हो और खेत का बाड़ा न खिंचा हो तो खेत के मालिक और ग्वालिया दोनों का अपराध माना जा- यगा । यदि गौ वा बैल ने खेत को उजाड़ा हो तो पांच मासे, ऊंट से उज- ड़ा हो तो छः मासे, गधा, घोड़ा, और भैंसी ने खेत उजाड़ा हो तो दश २ मासे और भेड़ बकरियों ने खेत चर लिया हो तो दो दो मासे सुवर्ण का दंड (जुर्माना) पशु के मालिक पर होना चाहिये । यदि सब खेत बिलकुल खा लिया हो तो सौ १०० मासे सुवर्ण का राजा दंड देवे । यदि ब्राह्मणादि अपना २ शास्त्रोक्त कर्म न करें और निषिद्ध हिंसा चोरी आदि कर्म करें तो निर्वाहमात्र भोजन वस्त्र छोड़के उनका शेष धनादि हरलेना चाहिये । गौ और अग्नि की रक्षा के लिये घास, ईंधन, लता, और वनस्पतियों की फल पत्ती अपने पदार्थ के तुल्य ले आवे उस में अपराध वा चोरी नहीं है । जिस बाग बगीचे का बाड़ा न खिंचा हो उन वृक्षों के फल तोड़ लाने में भी दोष नहीं है । मूलका बीशवां हिस्सा सूद लेना धर्मानुकूल है (इस में प्रति मासं १) सैकड़ा सूद पड़ेगा) महिने २ सूद लेतो पांच मासे सुवर्ण सैकड़ा पर लेवे । अधिक नहीं । कोई आचार्य कहते हैं कि वार्षिक सूद नियत करके लिया करे। यदि ऋणी पर बहुत काल तक सूद सहित धन रहे तो जितना मूल धन दिया हो उस से द्विगुण तक सब लेवे अधिक नहीं । वृद्धियों के देते जाने पर धन का कर्जा नहीं बढ़ता है । यदि नियत सूद न चुकाता जाय किन्तु रोके
६६ गौतमस्मृतिः ॥
गाश्च कुसीदं पशूपजलोमक्षेत्रशतवाह्येषु नातिपञ्चगुणमज-
डापौगण्डधनं दशवर्षभुक्तं परैः सन्निधौ भोक्तुःश्रोत्रियप्रव्र-
जितराजन्यधर्मपुरुषैः पशुभूमिस्त्रीणामनतिभोगे रिक्थभा-
जि ऋणं प्रतिकुर्य्युः । प्रातिभाव्यवणिक्शुल्कमद्यद्यूतदण्डान्
पुत्रा नाध्याभवेयुः । निध्यं वाधियाचितावक्रीताधयो नष्टाः
सर्व्वा न निन्दिता न पुरुषापराधेन, स्तेनः प्रकीर्णकेशो मु-
सली राजानमियात् कर्म्म चक्षाणः पूतो वधमोक्षाभ्यामघ्नन्ने-
रहे तो सूद पर सूद लेने का सिलसिला चलकर चक्र वृद्धि कहाती है । ऋणी ने जो स्वयं नियत की हो कि मैंने इतना लिया उस पर इतना अधिक दूंगा यह कारिता वृद्धि है । जितने अधिक काल ऋण रहे उतने काल बराबर सूद बढ़ता ही जाय, मूल से दूना तक लने का नियम न रहे यह कालवृद्धि (कालिका) कहाती है । जिस सूद के बदले शरीर से नियत दिनों तक कोई काम कर देना ठहरे वह कायिका वृद्धि है । और जो किसी वस्तु के नियत काल तक वर्तलेने से दी जाय वह अधिकभोगा वृद्धि कहाती है । ये सब वृद्धि (सूद लेने के तरीके) निकृष्ट (बुरी) हैं । पशु (भेडा आदि के) गोम-ऊन और सैकड़ों बार ऋणी का खेत जोत लेने से पांच गुण से अधिक वृद्धि (सूद) नहीं होता । जो पुरुष बौरा (पागल) वा अज्ञान (नाबालिग) न हो किन्तु अपने होश में ठीक हो उस का खेत आदि दश वर्ष तक जिस के अधिकार में रहे आगे उसी का होजाता है । परन्तु वेदपाठी, संन्यासी, राजपुरुष और धर्मनिष्ठ पुरुष जिसके पदार्थ को दश वर्ष भी भोगे तो भी उन का नहीं होता । पशु भूमि और स्त्री का अतिभाग अर्थात् हानि न होने के निमित्त कुटुम्बी वा अन्य मेजी लोग ऋणदाता के ऋण को चुका देवें । जामिनी, वाणिज्य का कर, मद्य और द्यूत (जुआ) सम्बन्धी दण्ड पिता के अभाव में पुत्रों पर नहीं होना चाहिये । कोश का धन, मांगा हुआ, और खरीदा हुआ वस्तु ये सब जिस को सौंपे जायं उस पुरुष का अपराध न होने पर नष्ट हो जायं अर्थात् खोजावें तो जिसे मिलें वह अपराधी नहीं माना जायगा । जिस ब्राह्मण ने सुवर्ण चुराया हो वह अपने शिर के बाल खोल कर मूसल हाथ में लेके राजा के पास अपना अपराध कहता हुआ जावे । राजाके मारने वा छोड़देने से अपराध
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३१
नस्वी राजा न शारीरो ब्राह्मणदण्डः कर्म्मवियोगविख्यापन- विवासनाङ्ककरणान्यप्रवृत्तौ प्रायश्चित्ती स चौरसमः, स- चिवो मतिपूर्वं प्रतिगृहीतोप्यधर्म्मसंयुक्ते पुरुषशक्त्यपरा- धानुबन्धविज्ञानाद्दण्डनियोगोऽनुज्ञानं वा वेदवित्समवाय- वचनाद्वेदवित्समवायवचनात् ॥ २ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
विप्रतिपत्तौ साक्षिणि मिथ्यासत्यव्यवस्था बहवः स्यु- रनिन्दिताः स्वकर्म्मसु प्रात्ययिका राज्ञां च निष्प्रीत्यनभितापा- श्चान्यतरस्मिन्नपि शूद्रा ब्राह्मणस्त्वब्राह्मणवचनादनुरो- ध्योऽनिबन्धश्चेन्नासमवेतापृष्टाः प्रब्रूयुरवचनेऽन्यथावचने च
छूट जाता है। राजा यदि न मारे तो अपराधी होता है। ब्राह्मण को मार- डालने का दण्ड नहीं होना चाहिये। इसलिये राजा को चाहिये कि उसे ब्राह्मण के वेदाध्ययनादि कामों से वियुक्त करे, महापातकी होने का विज्ञा- पन देवे, वा देश निकाले का दण्ड देवे अथवा दाग देकर सुवर्ण की चोरी का चिह्न करदेवे। यदि राजा इन में से कुछ भी न करे तो चोर के समान अ- पराधी होता है। मन्त्री को विचार पूर्वक परीक्षा करके नियत करने पर भी पीछे अधर्म संयुक्त प्रतीत हो तो पुरुष शक्ति के अपराध का परिणाम सोच कर मन्त्री को भी दण्ड देवे। अथवा वेदवेत्ताओं के सम्बन्धी वचन वा आज्ञा से उस को दण्ड न दे कर मन्त्री पद से च्युत करने की आज्ञा देवे ॥ २ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१२॥ किसी मामले में परस्पर विरुद्ध दोनों पक्ष प्रतीत होते हों तो झूठ सत्य का निर्णय साक्षी पर जाने। वे साक्षी लोग अपने २ धर्म कर्म में श्रद्धा विश्वास रखने वाले लोक में प्रतिष्ठित हों निन्दित न हों। राजा के साथ जिनका न प्रेम हो न डरते हों तथा वादी प्रतिवादी दोनों में किसी से जिनका विशेष मेल न हो न विरोध हो ऐसे बहुत मनुष्य साक्षी हों। किसी पक्ष में भले ही शूद्र भी साक्षी हों। ब्राह्मण से भिन्न साक्षी के वचन की अपेक्षा ब्राह्मण साक्षी के कथन का विशेष अनुरोध करे। यदि साक्षियों में परस्पर मेल हो तो पृथक् २ पूछे बिना साक्षी लोग कुछ न कहें। साक्षी लोग अदालत में कुछ भी न कहें वा मिथ्या
| ३८ | गौतमस्मृतिः ॥ |
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दोषिणः स्युः, स्वर्गः सत्यवचने विपर्यये नरकः ॥ १ ॥ अनिबन्धैरपि वक्तव्यं पीडाकृते निबन्धः प्रमत्तोक्ते च साक्षिसभ्यराजकर्तृषु दोषो धर्मतन्त्रपीडायां शपथैर्नैके सत्यकर्मणा तद्देवराजब्राह्मणसंसदि स्यादब्राह्मणानां पञ्च पश्वनृते साक्षी दश हन्ति गोऽश्वपुरुषममिषु दशगुणोत्तरान् सर्वं वा भूमौ हरणे नरको भूमिवदप्सु मैथुनसंयोगे च पशुवन्मधुसर्पिषो, गोवद्वस्त्रहिरण्यधान्यब्रह्मसु यानेष्वश्ववन्मिथ्यावचने याप्यो दण्ड्यश्च साक्षी नानृतवचने दोषो जीवनं चेत्तदधीनं नतु पापीयसो जीवनं राजा प्राड्विवाको ब्राह्मणो वा शास्त्रवित्।
कहें तो दोनों हालत में दोषी होते हैं। सत्य बोलने पर साक्षियों को स्वर्ग और मिथ्या बोलने से नरक प्राप्त होता है ॥१॥ कुछ प्राप्ति का निबन्ध न होने पर भी साक्षी ठीक देनी चाहिये। निबन्ध, पीड़ा (दुःख) करने वाला होता है। प्रमाद से मिथ्या कहने से राजसभा में अन्याय होतो साक्षी सभासद्, राजा और अधर्म करने वाला ये चारों अपराधी होते हैं। किन्ही आचार्यों का मत है कि धर्म को धक्का लगने का भय होतो शपथ (कसम) से निश्चय करे। सत्य धर्म कर्म की कसम ब्राह्मण से करावे सो देवस्थान राजसभा और ब्राह्मणों की सभा में शपथ करावे। ब्राह्मण से भिन्न साक्षियों से कहे कि-जो पुरुष पशुओं विषयक गवाही में झूठ बोलता है वह अपने कुल की पांच हत्या का दोषी होता, गौ के विषय में झूठ बोलने पर दश हत्या का दोषी, घोड़े के विषय में झूठ बोलने पर सौ हत्या का, मनुष्य के विषय में हजार हत्या का, और भूमि के विषय में झूठ बोलने पर दशहजार हत्या का दोषी होता है। अथवा भूमि विषयक झूठ में सब कुटुम्ब की हत्या का दोषी होता। भूमि के चुराने पर नरक होता और भूमि विषयक झूठ गवाही के तुल्य जल के विषय में और मैथुन संयोग के विषय में मिथ्या गवाही देने से दोष लगता है। शहद और घी के विषय में पशुओं के तुल्य, वस्त्र, सुवर्ण, अन्न, और वेद विषय में गौ के तुल्य, सवारियों (रथादि) के विषय में घोड़े के तुल्य दोष लगता है। यदि गवाह मनुष्य का मिथ्या कहना सिद्ध हो जावे तो उसे निकाल देवे और दण्ड करे। यदि उस मनुष्य की गवाही देने से ही जीविका होतो मिथ्या भाषण में भी राजदण्ड का अपराधी नहीं है। परन्तु ऐसे पापी गवाह की जीविका भी वास्तव में जीविका नहीं है। राजा (हाकिम) वकील,
भाषार्थसंहिता ॥ ३१
प्राड्विवाको मध्यो भवेत्, संवत्सरं प्रतीक्षेत प्रतिभायां धेन्व- नडुत्स्त्रीप्रजनसंयुक्तेषु शीघ्रमात्ययिके च सर्वधर्म्मेभ्यो ग- रीयः प्राड्विवाके सत्यवचनं सत्यवचनम् ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ शावमाशौचं दशरात्रमनृत्विग्दीक्षितब्रह्मचारिणां सपिण्डा- नामेकादशरात्रं क्षत्रियस्य द्वादशरात्रं वैश्यस्यार्द्धमासमे- कमासं शूद्रस्य तच्चेदन्तः पुनरापतेत्तच्छेषेण शुद्धयेरन्, रा- त्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिर्गोब्राह्मणहतानामन्वक्षं राज- क्रोधाच्चयुद्धे प्रायोनाशकशस्त्राग्निविषोदकोद्वन्धनप्रपतनैश्चे-
और शास्त्रों का जानने वाला ब्राह्मण ये लोग किसी धनी से घूस लेकर मि-
थ्या न्याय न करें । अदालत में वकील मध्यस्थ हो । किसी स्त्री का मुकद्दमा
हो और उसका अपराधिनी होना सिद्ध न हो तो एक वर्ष तक उसकी निग-
रानी करे । गौ, बैल, स्त्री के सन्तानोत्पत्ति (व्यभिचार से हो) और अत्याचार
सम्बन्धी मुकद्दमों का शीघ्र फैसला करना अन्य सब धर्मों से श्रेष्ठ है । अदालत में
सत्य बोलने का विशेष भार वकीलपर होना चाहिये अर्थात् सत्य वक्ताओं
में प्रसिद्ध परीक्षित पुरुष वकालत करने के लिये राजनियम से नियत
होने चाहिये ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
अथ मृतक अशुद्धि का विचार दिखाते हैं। ऋत्विज्, दीक्षित (जिन ने यज्ञ में दीक्षा ली हो) और ब्रह्मचारी इन को छोड़के अन्य सामान्य मनुष्य लोग दश दिन तक मृत सूतक मानैं। अन्य सपिण्ड के लोग ग्यारह दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पन्द्रह दिन और एक मास तक शूद्र लोग मरण सूतक मानैं। यदि एक के मरने की शुद्धि होने से पहिले उसी कुटुम्ब का अन्य कोई मरजावे तो पहिले के साथ ही अगले की भी शुद्धि कर लेवें । यदि पहिले की शुद्धि में एक रात्रि भर बाकी हो तो दो दिन में शुद्धि करें । यदि पहिले सूतक के अन्तिम दिन प्रातःकाल द्वितीय मृत्यु हो तो तीन दिन अशुद्धि मानैं । जो पुरुष गौ- तथा ब्राह्मण ने मार डाले हों, जो गाड़ी से दब के मरे हों, जो राजाओं के क्रोध से हुए युद्ध में कट के मरे, जो प्रायः नाशक—शस्त्रों से, अग्नि में जल कर, विष खाकर, जल में डूबकर, फांसी लगा कर, वा किसी ऊंचे मकाना-
६
४० | गौतमस्मृतिः ॥
चतुर्णां पिण्डनिवृत्तिः सप्तमे पञ्चमे वा, जननेप्येवं माता- पित्रोस्तन्मातुर्वा गर्भमाससमारात्रीः संसने गर्भस्य त्र्यहं वा श्रुत्वा चोर्ध्वं दशम्याः पक्षिण्यसपिण्डेयोनिसंबन्धे सहाध्या- यिनि च सब्रह्मचारिण्येकाहं श्रोत्रिये चोपसंपन्ने प्रेतोपस्प- र्शने दशरात्रमाशौचमभिसंधायचेदुक्तं वैश्यशूद्रयोरार्तवोर्वा पूर्वयोश्च त्र्यहं वाऽऽचार्यतत्पुत्रस्त्रीयाज्यशिष्येषु चैवमव- रश्चेत्पूर्वं वर्णमुपस्पृशेत् पूर्वो वाऽवरं तत्र शावोक्तमा- शौचं, पतितचाण्डालसूतिकोदक्याशवस्पृष्टितत्स्पृष्ट्युपस्प- र्शने सचैलोदकोपस्पर्शाच्छुध्येच्छवानुगमे च शुनश्च यदुपहन्यादित्येके,उदकदानं सपिण्डैः कृतचूडस्य तत्स्त्रीणां
द्धि से गिर कर अपनी इच्छा पूर्वक मरे हों उन को सातवें वा पांचवें वर्ष पिण्ड देना निवृत्त हो जाता है अर्थात् आगे उन के नाम से पिण्ड नहीं देना चाहिये । जन्म सूतक में भी इसी तरह मृतक के समान शुद्धि जानो । सन्तानोत्पत्ति में माता पिता दोनों को वा केवल माता को ही अशुद्धि लगती है । गर्भ पात होने पर जितने महीनों का गर्भ गिर जाय उतने दिन में शुद्धि करे । विदेश में दश दिन बाद सूतक जान पड़े तो तीन दिन में शुद्धि करे । यदि सपिण्ड से भिन्न कुटुम्बी वा नातेदारों का सूतक दश दिन बाद सुने तो दो दिन एक रात में शुद्धि करे । और साथ २ पढ़ने वाले वा साथ में जो ब्रह्मचारी रहा हो तथा श्रोत्रिय (वेदपाठी) के स्वर्गवास में एक दिन रात में शुद्धि करे । जान कर मुर्दा का स्पर्श करने वाला दश दिन सूतक माने । वैश्य शूद्रों का सूतक पूर्व में कहचुके हैं । रजस्वला स्त्रियां का तथा सूतकी ब्राह्मण क्षत्रियों का स्पर्श करके तीन दिन में शुद्धि करे । गुरु, गुरुपुत्र, गुरुपत्नी, यजमान और शिष्य के देहान्त में भी तीन दिन सूतक माने । सूतक में नीच वर्ण का पुरुष उत्तम वर्ण का वा उत्तम वर्ण नीच का स्पर्श करे तो मृत सूतक के समान अशुद्धि जानो । पतित (ब्रह्महत्यादि पातकी) चाण्डाल, सूतिका स्त्री, रजस्वला, मुर्दा का स्पर्श करने वाला और उस स्पर्श कर्त्ता का छूने वाला, इन पतितादि का स्पर्श करने पर सचैल स्नान करने पर शुद्ध होता है मुर्दा के संग जाने और हाथ से कुत्ते को मारने पर भी सचैल स्नान करे यह किन्ही आचार्यों का मत है । जिस का चूड़ाकर्म संस्कार हो गया हो उस के मरने
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९
चानतिभोगएके प्रदत्तानामधःशय्यासनिनो ब्रह्मचारिणः सर्वे न मार्जयेरन्न मांसं भक्षयेयुराप्रदानात्प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमनवमेषूदकक्रिया वाससां च त्यागः, अन्त्येत्वन्त्यानां दन्तजन्मादि मातापितृभ्यां तूष्णीं माता, बालदेशान्तरितप्रव्रजितासपिण्डानां सद्यः शौचं, राज्ञां च कार्याविरोधाद् ब्राह्मणस्य च स्वाध्यायानिवृत्यर्थं स्वाध्यायानिवृत्यर्थम् ॥१॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ श्राद्धममावास्यायां पितृभ्यो दद्यात्, पञ्चमीप्रभृति वापरपक्षस्य यथाश्रद्धं सर्वस्मिन्वा द्रव्यदेशब्राह्मणसन्निधाने
पर कुटुम्बी सपिण्ड के लोग जलदान करें । बिना बियाही कन्याओं को जलदान का अधिकार नहीं यह किन्हीं का मत है । कन्यादान हो जाने पर मरें तो जल दिया जाय । सूतक मानने वाले सब लोग दश दिन तक नीचे पृथिवी पर सोवें, बैठे, ब्रह्मचारी रहें, स्नान तथा मार्जनादि शुद्धि न करें, और मांस न खायें कि जब तक प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम दिनों में जल दान करें । और उसी दिन वस्त्रों का भी त्याग करें । शूद्रादि नीचों की शुद्धि के अन्तिम (महिने के पूरे होने पर) दिन वस्त्रों का त्याग और जलदान होना चाहिये । दांत उगने से लेकर चूड़ाकर्म तक बालक के मरने पर माता पिता दोनों या केवल माता अश्रुबिन्दु गिराने के समय मौन रहे । अन्य कुटुम्बी लोग तत्काल शुद्धि करलें । देशान्तर में सपिण्ड का बालक, संन्यासी और सात पीढ़ी से ऊपर कुटुम्बी इन सब के मरने पर तत्काल ही शीघ्र शुद्धि करलें । राजकार्यों की हानि न होने के अनुरोध से राजा को और नित्य नियम से वेदाध्यायन करने वाले ब्राह्मण को वेद अध्ययन का नियम न बिगड़ने के विचार से तत्काल शुद्धि कर लेनी चाहिये ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१४॥
अब श्राद्ध का विचार दिखाते हैं । प्रत्येक अमावश्या को पितरों के लिये पार्वण श्राद्ध विधि से पिण्ड देने चाहिये । वा कृष्णपक्ष की पञ्चमी से लेकर श्राद्ध करे । अथवा श्राद्ध का सामान, श्राद्ध के योग्य देश (स्थान) और विद्वान् सुपात्र ब्राह्मण जब मिल जांय तभी श्रद्धानुसार सभी तिथियों में श्राद्ध करे ।
४२ गौतमस्मृतिः ॥
वा कालनियमः शक्तितः प्रकर्षे गुणसंस्कारविधिरन्नस्य नवावरान् भोजयेदयुजो यथोत्साहं वा ब्राह्मणान् श्रोत्रियान् वाग्रूपवयःशीलसंपन्नान् युवभ्यो दानं प्रथममेके पितृवन्न च तेन मित्रकर्म कुर्यात्, पुत्राभावे सपिण्डा मातृसपिण्डाः शिष्याश्च दद्युस्तदभावे ऋत्विगाचार्यो॥ तिलमाषब्रीहियवोदकदानैर्मासं पितरः प्रीणन्ति, मत्स्यहरिणरुरुशशकूर्म्मवराहमेषमांसैः संवत्सरं, गव्यपयःपायसैर्द्वादश वर्षाणि, वाध्रीणसेन मांसेन कालशाकलोहखड्गमांसैर्मधुमिश्रैश्चानन्त्यम् ॥१॥ न भोजयेत् स्तेनकलीवपतितनास्तिकतद्वृत्तिवीरहाग्रेदि-
काल का नियम और अन्न को विशेष शुद्धि सावधानी से बनाने का विचार तो विशेष कर मानना चाहिये । श्राद्ध में नौ से कम १ । ३ । ५ । ७ ऐसे विषम संख्या वालों को वा वाणी, रूप, अवस्था, और स्वभाव जिनके अच्छे हों ऐसे वेदपाठी श्रोत्रियब्राह्मणों को अपनी शक्ति उत्साह के अनुसार भोजन करावे। कोई आचार्य कहते हैं कि जो युवावस्था में मरे हों उनके नाम के ब्राह्मणों को पहिले जिमावे। जिन ब्राह्मणों का श्राद्ध में पूजन करे उनके साथ मित्रवत् बराबरी का व्यवहार कभी न करे किन्तु उनका सदा पूज्यमाना करे। जिन के कोई पुत्र न हों उन के लिये अपने सपिण्डा या माता के सपिण्डा अथवा शिष्य लोग श्राद्ध करें। यदि इन में भी कोई न हो तो ऋत्विक् वा गुरु उनका श्राद्ध करें। तिल माष ( उड़द ) धान, जौ और जल से किये श्राद्ध से एक मास तक पितर तृप्त होते, मछली, हिरण, रोज, शश ( खरगोश, ) कछुआ, भैंसा, और मेढ़ा इनके मांस से एक वर्षतक, गौ के दूध, पायस ( खीर ) और बड़े २ कानों वाले बकरे के मांस से बारह वर्षतक, उन २ ऋतु के शाक, लाल बकरा, गैंडा, इनके शहद मिले मांस के पिण्डों से अनन्त कालतक पितरों की तृप्ति होती है ॥ १ ॥ ( जिस द्विज लोगों के लिये मांस खाने का निषेध है उनके लिये मांस के पिण्ड देने का भी निषेध ही जानो । क्योंकि ( यदन्नःपुरुषोभवतितदन्नास्तस्य देवताः ) जिस २ अन्न को जो २ खाता हो वही अपने २ देवों तथा पितरों को देवे यह परम सिद्धान्त है । इस के अनुसार ( निषेध होने पर भी ) जो मांसाहारी हैं उन्हीं को युगान्तरों में भी मांस पिण्ड देने का विधान जानो । और कलिमें तो सभी के लिये मांस के पिण्डों का निषेध ही है ) चोर, नपुंसक, नास्तिक, नास्तिकता के कामों से जीविका करनेवाला, पतित, वीर पुरुष की
भाषार्थसहिता ॥ ५३
धिषूदिधिषूपतिस्त्रीग्रामयाजकाजपालोत्सृष्टाग्निमद्यपकुचर- कूटसाक्षिप्रातिहारिकानूपपतिर्यस्य च कुण्डाशी सोमविक्रय्य- गारदाही गरदावकीर्णिगणप्रेष्योऽगम्यागोमिहिंस्रपरिवित्ति- परिवेत्तृपर्याहृतपर्याधातृत्यक्तात्मदुर्बलाः कुनखिश्यावदन्त- श्वित्रिपौनर्भवकितवाजपराजप्रेष्यप्रतिरूपकशूद्रपतिनिरा- कृतिकिलासिकुसीदिवणिक्शिल्पोपजीविज्यावादित्रतालवृ- त्यगीतशीलान् पित्राचाकामेन विभक्तान् शिष्यांश्र्चैके सगोत्रांश्च ॥२॥
हत्या करनेवाला, जिसके मौजूद होते ही स्त्री ने अन्य पुरुष करलिया हो, वा जिसने अन्य की विवाहिता स्त्री को रखलिया हो, स्त्री को और गांवभर के मनुष्यों को एक साथ यज्ञ करानेवाला, भेड़ बकरी पालनेवाला, जिसने स्थापन किये अग्नि को त्यागा हो, मद्य पीनेवाला, जिसका चाल चलन अच्छा न हो, झूठ गवाही देनेवाला, जिसकी स्त्री का दूसरा जार पति हो, कूंडे में भोजन करने-वाला, यज्ञ में सोम बेचने वाला, घर में आग लगाने वाला, विष देनेवाला, ब्रह्मचारी होकर जो व्यभिचार करे, सभा का नौकर, अगम्या स्त्री से गमन कर-नेवाला, हिंसक, ज्येष्ठ भाई से पहिले जो अपना विवाह करे वा अग्निहोत्र लेवे वह, और उसका जेठा भाई, जो सब ऊंच नीचों से सब प्रकार का दान लेवे, जो सब वेश्यादि नीच स्त्रियों से भी व्यभिचार करे, जिसने अपने शरणा-गतों वा दुर्बल अनाथ पुत्रादि को त्यागा हो, जिसके नख बिगड़े हों, दांत काले हों, श्वेतकुष्ठी, जो अन्य की स्त्री में पैदा हुआ हो, ज्वारी, बकरियों का पालने वाला, राजा का नौकर, बहुरूपिया, शूद्रा स्त्री का पति, जिसका अनादर खण्डन होता हो, किलासि (एक प्रकार का कुष्ठी,) सूद लेनेवाला, पंसारी आदि की दुकान करने वाला, कारीगर, धनुषबाण चलाने-वाजे ताल बजाने-नाचने और गाने के स्वभाववाला, पिता की आज्ञा वा इच्छा के बिना जिसने विभाग (बांट) किया हो ऐसे उक्तप्रकार के चोरी आदि काम करने वाले ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन न करावे। और कोई आचार्य कहते हैं कि अपने गोत्र के लोगों और अपने शिष्यों को भी श्राद्ध में भोजन न करावे ॥२॥
४४ गौतमस्मृतिः ॥
भोजयेदूर्ध्वं त्रिभ्यो गुणवन्तम् ॥३॥ सद्यः श्राद्धी शूद्रा तल्पगस्तत्पुत्रपुरीषे मासं नयति पितॄंस्तस्मात्तदहर्ब्रह्मचारी स्यात्,श्वचण्डालपतितावेक्षणे दुष्टं तस्मात् परिश्रिते दद्यात्, तिलैर्वा विकिरेत्, पङ्क्तिपावनो वा शमयेत्, पङ्क्तिपावनाः षडङ्गविज्ज्येष्ठसामगस्त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुस्त्रिसुपर्णः पञ्चाग्निः स्नातको(मन्त्रब्राह्मणविद्) धर्म्मज्ञो ब्रह्मदेयानुसंतानइति हविःषु चैवं दुर्बलादीन् श्राद्धएवैके श्राद्धएवैके ॥ ४ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
तीनसे ऊपर पांच वा सात सुपात्रों को अथवा इतने न मिलें तो एक ही गुणवान् तपस्वी विद्वान् धर्मात्मा को भोजन करावे॥३॥ यदि श्राद्ध करने वाला उसी दिन वेश्यादि शूद्रा स्त्री से संयोग करे तो उस शूद्रा से होने वाले पुत्रों की विष्ठा में श्राद्ध कर्त्ता के पितर एक मास तक बसते हैं। इस से श्राद्धकर्ता पुरुष श्राद्ध के दिन ब्रह्मचारी रहे । कुत्ता, चाण्डाल, और पतित लोग श्राद्धान्न को देखें तो दूषित हो जाता है । इस से घेरी हुई एकान्त जगह में श्राद्ध के भोजन और पिण्डदान करे । वा श्राद्ध स्थान के सब ओर तिल विखेर देवे अथवा पङ्क्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध में हो तो अन्यकृत दोष को शान्त कर देगा । १-वेद के छहों अंगों को जानने पढ़ाने वाला । २-सामवेद के आरण्यक भाग को पढ़ा । ३-यजुर्वेद के अध्वर्यु कर्म का ज्ञाता याज्ञिक । ४-जो उपनिषदों में कही तीन प्रकार की मधु विद्या का विद्वान् हो । ५-ऋग्वेद सम्बन्धी होताओं के कर्म का जानने वाला याज्ञिक । ६-गार्हपत्यादि श्रौतस्मार्त्त पञ्चाग्नियों को विधिपूर्वक स्थापित करके अग्निहोत्र नित्य करने वाला । ७-ब्रह्मचर्याश्रम में पूर्ण वेदाध्ययन करके जिस ने समावर्त्तन किया हो । ८-मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग वेद को जानने वाला । ९-धर्म का मर्म जानने वाला धर्मनिष्ठ । १०-और विधिपूर्वक हुए ब्राह्म विवाह से उत्पन्न सन्तान । ये दशप्रकार के ब्राह्मण पङ्क्तिपावन कहाते हैं। देवताओं सम्बन्धी ब्रह्मभोज में भी इसी प्रकार उत्तम निकृष्ट ब्राह्मणों की परीक्षा जानी । किन्ही आचार्यों का मत है कि दुर्बलादि निषिद्ध ब्राह्मणों काश्राद्ध में ही त्याग करे किन्तु दैवकर्मों में परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है ॥ ४ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥