अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 613, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ४९
चानतिभोगएके प्रदत्तानामधःशय्यासनिनो ब्रह्मचारिणः सर्वे न मार्जयेरन्न मांसं भक्षयेयुराप्रदानात्प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमनवमेषूदकक्रिया वाससां च त्यागः, अन्त्येत्वन्त्यानां दन्तजन्मादि मातापितृभ्यां तूष्णीं माता, बालदेशान्तरितप्रव्रजितासपिण्डानां सद्यः शौचं, राज्ञां च कार्याविरोधाद् ब्राह्मणस्य च स्वाध्यायानिवृत्यर्थं स्वाध्यायानिवृत्यर्थम् ॥१॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ श्राद्धममावास्यायां पितृभ्यो दद्यात्, पञ्चमीप्रभृति वापरपक्षस्य यथाश्रद्धं सर्वस्मिन्वा द्रव्यदेशब्राह्मणसन्निधाने
पर कुटुम्बी सपिण्ड के लोग जलदान करें । बिना बियाही कन्याओं को जलदान का अधिकार नहीं यह किन्हीं का मत है । कन्यादान हो जाने पर मरें तो जल दिया जाय । सूतक मानने वाले सब लोग दश दिन तक नीचे पृथिवी पर सोवें, बैठे, ब्रह्मचारी रहें, स्नान तथा मार्जनादि शुद्धि न करें, और मांस न खायें कि जब तक प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम दिनों में जल दान करें । और उसी दिन वस्त्रों का भी त्याग करें । शूद्रादि नीचों की शुद्धि के अन्तिम (महिने के पूरे होने पर) दिन वस्त्रों का त्याग और जलदान होना चाहिये । दांत उगने से लेकर चूड़ाकर्म तक बालक के मरने पर माता पिता दोनों या केवल माता अश्रुबिन्दु गिराने के समय मौन रहे । अन्य कुटुम्बी लोग तत्काल शुद्धि करलें । देशान्तर में सपिण्ड का बालक, संन्यासी और सात पीढ़ी से ऊपर कुटुम्बी इन सब के मरने पर तत्काल ही शीघ्र शुद्धि करलें । राजकार्यों की हानि न होने के अनुरोध से राजा को और नित्य नियम से वेदाध्यायन करने वाले ब्राह्मण को वेद अध्ययन का नियम न बिगड़ने के विचार से तत्काल शुद्धि कर लेनी चाहिये ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१४॥
अब श्राद्ध का विचार दिखाते हैं । प्रत्येक अमावश्या को पितरों के लिये पार्वण श्राद्ध विधि से पिण्ड देने चाहिये । वा कृष्णपक्ष की पञ्चमी से लेकर श्राद्ध करे । अथवा श्राद्ध का सामान, श्राद्ध के योग्य देश (स्थान) और विद्वान् सुपात्र ब्राह्मण जब मिल जांय तभी श्रद्धानुसार सभी तिथियों में श्राद्ध करे ।