भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३२ गौतमस्मृतिः ॥

तत्प्रसूतः कर्माणि कुर्वीत, ब्रह्मप्रसूतं हि क्षत्रमृध्यते न व्यथत इति च विज्ञायते । यानि च दैवोत्पातचिन्तकाः प्रब्रूयुस्तान्याद्रियेत तदधीनमपि ह्येके, योगक्षेमं प्रतिजानते शान्तिपुण्याहस्वस्त्ययनायुष्यमङ्गलसंयुक्तान्याभ्युदयिकानि विद्वेषिणां संवलनमभिचारद्विषद्व्याधिसंयुक्तानि च शालाग्नौ कुर्याद् यथोक्तमृत्विजोऽन्यानि, तस्य व्यवहारो वेदो धर्म्मशास्त्राण्यङ्गान्यपवेदाः पुराणं देशजातिकुलधर्म्माश्चाम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणं कर्षकवणिक्पशुपालकुसीदकारवः स्वे स्वे वर्गे तेभ्यो यथाधिकारमर्थान् प्रत्यवहृत्य धर्म्मव्यवस्था न्या-


को राजा गुरु नियत करे । उसकी प्रेरणा आज्ञा वा सलाह सम्मति से राज्य के प्रबन्ध सम्बन्धी सब काम किया करे । क्योंकि वेद से यह जाना गया है कि ब्राह्मण की आज्ञा प्रेरणा से चलने वाला ही क्षत्रिय राजा बढ़ता है और दुःखी वा पीड़ित नहीं होता । और जिन बातों को दैवी उत्पातों ( शकुनों ) के चिन्तक ( जानने वाले ज्योतिषी आदि ) लोग कहें उन विचारों का भी आदर करे माने । कोई आचार्य कहते हैं कि देवोत्पात चिन्तकों के आधीन राजा रहे क्योंकि ये दैवज्ञ लोग योगक्षेम की उत्तमता होने की प्रतिज्ञा कर सक्ते हैं। उत्पात दीखने पर शान्तिकरण पुण्याहवाचन स्वस्ति वाचन, आयुष्यकारी और माङ्गल्य संयुक्त वेद शास्त्रोक्त आभ्युदयिक कामों को तथा शत्रुओं को दबाने के लिये मारणप्रयोग अथवा उनकी व्याधिरूप बना देने के काम स्थापित किये यज्ञशाला के अग्नि से करे करावे । और राजा के ऋत्विज् लोग शास्त्रोक्त अन्य काम भी शत्रुओं दबाने तथा अपने राजा की रक्षा के लिये करें । वेद, धर्मशास्त्र, वेद के छः अङ्ग, चार उपवेद, और इतिहास पुराण इन ग्रन्थों के अनुकूल राजा का व्यवहार होना चाहिये । देश धर्म, जाति धर्म, और कुल धर्म ये वेदादि शास्त्रों से विरुद्ध न होने पर प्रमाण कोटि में गिने जायेंगे । किसान, वैश्य, पशुपालक ( गोपाल जाति ) सूद लेनेवाले और सुनार लुहार आदि कारीगर इन सब को अपने२ वर्ग में स्थापित रक्खे । अर्थात् अपने कर्तव्य कर्म को छोड़कर कोई अन्य वर्ग में सम्मिलित होने की चेष्टा न करे । उन२ की योग्यता शक्ति के अनुसार धनादि पदार्थ लेकर राजा धर्म

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