अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ३३
याधिगमे तर्कोऽभ्युपायस्तेनाभ्यूह्य यथास्थानं गमयेद् विप्रतिपत्तौ त्रयीविद्यावृद्धेभ्यः प्रत्यवहृत्य निष्ठां गमयेद्यथाहास्य निःश्रेयसं भवति, ब्रह्म क्षत्रेण संपृक्तं देवपितृमनुष्यान् धारयतीति विज्ञायते, दण्डोदमनादित्याहुस्तेनादान्तान् दमयेद्वर्णाश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुःश्रुतवित्तवृत्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते, विष्वञ्चो विपरीता नश्यन्ति तानाचार्योपदेशो दण्डश्च पालयते तस्माद्राजाचार्यावनिन्द्यावनिन्द्यौ॥१॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
की व्यवस्था करे। न्याय की बात खोजने के लिये तर्क ही मुख्य उपाय है। उस तर्क से ऊहा करके राजा यथोचित व्यवस्था करे। यदि तर्क से भी किसी विषय का निश्चय न हो किन्तु विरोध ही सब पक्षों में दीख पड़े तो तीनों वेद सम्बन्धी अर्था विद्या में बड़े बड़े विद्वान् ब्राह्मणों के निकट जाकर व्यवस्था मांगे अर्थात् उनकी राय से फैसला कर देवे। ऐसा करने से राजा का परम कल्याण होता है। क्षत्रत्व से मिला हुआ ब्रह्मत्व-देव, पितर, और मनुष्यों को धारण करता है यह वेद से जाना गया है। दमन ( वशी ) करने अर्थ से दण्ड शब्द बना है ऐसा आचार्य लोग कहते हैं। उस दण्ड के द्वारा राजा अदान्तों (अपने आपसे बाहर होने वाले दुराचारियों) को वशीभूत करे। ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रम अपने २ धर्म कर्म में तत्पर रहते हुए मरणानन्तर अपने कर्मों से स्वर्ग भोग फल का दीर्घ कालतक अनुभव करके शेष बचे पुण्य के बल से उत्तम देश, जाति कुलों में सुरूपवान्, दीर्घायुवाले, विद्यावान्, श्रीमान्, सदाचारी, बुद्धिमान् और सुख के सामान से युक्त हुए जन्म लेते हैं। सब वर्णाश्रमों से विपरीत दुराचारादि में चलने वाले नष्ट होते दुःख भोगते हैं। उनको गुरु लोगों वा आचार्यों का (धर्मशास्त्रोक्त) उपदेश और राजा का दण्ड रक्षा करता है। इससे राजा और वेद के विद्वान् साचार्यों की निन्दा कदापि न करे ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥११॥