भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 805 में से

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६६ गौतमस्मृतिः ॥

गाश्च कुसीदं पशूपजलोमक्षेत्रशतवाह्येषु नातिपञ्चगुणमज-
डापौगण्डधनं दशवर्षभुक्तं परैः सन्निधौ भोक्तुःश्रोत्रियप्रव्र-
जितराजन्यधर्मपुरुषैः पशुभूमिस्त्रीणामनतिभोगे रिक्थभा-
जि ऋणं प्रतिकुर्य्युः । प्रातिभाव्यवणिक्शुल्कमद्यद्यूतदण्डान्
पुत्रा नाध्याभवेयुः । निध्यं वाधियाचितावक्रीताधयो नष्टाः
सर्व्वा न निन्दिता न पुरुषापराधेन, स्तेनः प्रकीर्णकेशो मु-
सली राजानमियात् कर्म्म चक्षाणः पूतो वधमोक्षाभ्यामघ्नन्ने-

रहे तो सूद पर सूद लेने का सिलसिला चलकर चक्र वृद्धि कहाती है । ऋणी ने जो स्वयं नियत की हो कि मैंने इतना लिया उस पर इतना अधिक दूंगा यह कारिता वृद्धि है । जितने अधिक काल ऋण रहे उतने काल बराबर सूद बढ़ता ही जाय, मूल से दूना तक लने का नियम न रहे यह कालवृद्धि (कालिका) कहाती है । जिस सूद के बदले शरीर से नियत दिनों तक कोई काम कर देना ठहरे वह कायिका वृद्धि है । और जो किसी वस्तु के नियत काल तक वर्तलेने से दी जाय वह अधिकभोगा वृद्धि कहाती है । ये सब वृद्धि (सूद लेने के तरीके) निकृष्ट (बुरी) हैं । पशु (भेडा आदि के) गोम-ऊन और सैकड़ों बार ऋणी का खेत जोत लेने से पांच गुण से अधिक वृद्धि (सूद) नहीं होता । जो पुरुष बौरा (पागल) वा अज्ञान (नाबालिग) न हो किन्तु अपने होश में ठीक हो उस का खेत आदि दश वर्ष तक जिस के अधिकार में रहे आगे उसी का होजाता है । परन्तु वेदपाठी, संन्यासी, राजपुरुष और धर्मनिष्ठ पुरुष जिसके पदार्थ को दश वर्ष भी भोगे तो भी उन का नहीं होता । पशु भूमि और स्त्री का अतिभाग अर्थात् हानि न होने के निमित्त कुटुम्बी वा अन्य मेजी लोग ऋणदाता के ऋण को चुका देवें । जामिनी, वाणिज्य का कर, मद्य और द्यूत (जुआ) सम्बन्धी दण्ड पिता के अभाव में पुत्रों पर नहीं होना चाहिये । कोश का धन, मांगा हुआ, और खरीदा हुआ वस्तु ये सब जिस को सौंपे जायं उस पुरुष का अपराध न होने पर नष्ट हो जायं अर्थात् खोजावें तो जिसे मिलें वह अपराधी नहीं माना जायगा । जिस ब्राह्मण ने सुवर्ण चुराया हो वह अपने शिर के बाल खोल कर मूसल हाथ में लेके राजा के पास अपना अपराध कहता हुआ जावे । राजाके मारने वा छोड़देने से अपराध

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