अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 611, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ ३१
प्राड्विवाको मध्यो भवेत्, संवत्सरं प्रतीक्षेत प्रतिभायां धेन्व- नडुत्स्त्रीप्रजनसंयुक्तेषु शीघ्रमात्ययिके च सर्वधर्म्मेभ्यो ग- रीयः प्राड्विवाके सत्यवचनं सत्यवचनम् ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ शावमाशौचं दशरात्रमनृत्विग्दीक्षितब्रह्मचारिणां सपिण्डा- नामेकादशरात्रं क्षत्रियस्य द्वादशरात्रं वैश्यस्यार्द्धमासमे- कमासं शूद्रस्य तच्चेदन्तः पुनरापतेत्तच्छेषेण शुद्धयेरन्, रा- त्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिर्गोब्राह्मणहतानामन्वक्षं राज- क्रोधाच्चयुद्धे प्रायोनाशकशस्त्राग्निविषोदकोद्वन्धनप्रपतनैश्चे-
और शास्त्रों का जानने वाला ब्राह्मण ये लोग किसी धनी से घूस लेकर मि-
थ्या न्याय न करें । अदालत में वकील मध्यस्थ हो । किसी स्त्री का मुकद्दमा
हो और उसका अपराधिनी होना सिद्ध न हो तो एक वर्ष तक उसकी निग-
रानी करे । गौ, बैल, स्त्री के सन्तानोत्पत्ति (व्यभिचार से हो) और अत्याचार
सम्बन्धी मुकद्दमों का शीघ्र फैसला करना अन्य सब धर्मों से श्रेष्ठ है । अदालत में
सत्य बोलने का विशेष भार वकीलपर होना चाहिये अर्थात् सत्य वक्ताओं
में प्रसिद्ध परीक्षित पुरुष वकालत करने के लिये राजनियम से नियत
होने चाहिये ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
अथ मृतक अशुद्धि का विचार दिखाते हैं। ऋत्विज्, दीक्षित (जिन ने यज्ञ में दीक्षा ली हो) और ब्रह्मचारी इन को छोड़के अन्य सामान्य मनुष्य लोग दश दिन तक मृत सूतक मानैं। अन्य सपिण्ड के लोग ग्यारह दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पन्द्रह दिन और एक मास तक शूद्र लोग मरण सूतक मानैं। यदि एक के मरने की शुद्धि होने से पहिले उसी कुटुम्ब का अन्य कोई मरजावे तो पहिले के साथ ही अगले की भी शुद्धि कर लेवें । यदि पहिले की शुद्धि में एक रात्रि भर बाकी हो तो दो दिन में शुद्धि करें । यदि पहिले सूतक के अन्तिम दिन प्रातःकाल द्वितीय मृत्यु हो तो तीन दिन अशुद्धि मानैं । जो पुरुष गौ- तथा ब्राह्मण ने मार डाले हों, जो गाड़ी से दब के मरे हों, जो राजाओं के क्रोध से हुए युद्ध में कट के मरे, जो प्रायः नाशक—शस्त्रों से, अग्नि में जल कर, विष खाकर, जल में डूबकर, फांसी लगा कर, वा किसी ऊंचे मकाना-
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