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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्थसंहिता ॥ ३१

प्राड्विवाको मध्यो भवेत्, संवत्सरं प्रतीक्षेत प्रतिभायां धेन्व- नडुत्स्त्रीप्रजनसंयुक्तेषु शीघ्रमात्ययिके च सर्वधर्म्मेभ्यो ग- रीयः प्राड्विवाके सत्यवचनं सत्यवचनम् ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ शावमाशौचं दशरात्रमनृत्विग्दीक्षितब्रह्मचारिणां सपिण्डा- नामेकादशरात्रं क्षत्रियस्य द्वादशरात्रं वैश्यस्यार्द्धमासमे- कमासं शूद्रस्य तच्चेदन्तः पुनरापतेत्तच्छेषेण शुद्धयेरन्, रा- त्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिर्गोब्राह्मणहतानामन्वक्षं राज- क्रोधाच्चयुद्धे प्रायोनाशकशस्त्राग्निविषोदकोद्वन्धनप्रपतनैश्चे-

और शास्त्रों का जानने वाला ब्राह्मण ये लोग किसी धनी से घूस लेकर मि- थ्या न्याय न करें । अदालत में वकील मध्यस्थ हो । किसी स्त्री का मुकद्दमा हो और उसका अपराधिनी होना सिद्ध न हो तो एक वर्ष तक उसकी निग- रानी करे । गौ, बैल, स्त्री के सन्तानोत्पत्ति (व्यभिचार से हो) और अत्याचार सम्बन्धी मुकद्दमों का शीघ्र फैसला करना अन्य सब धर्मों से श्रेष्ठ है । अदालत में सत्य बोलने का विशेष भार वकीलपर होना चाहिये अर्थात् सत्य वक्ताओं में प्रसिद्ध परीक्षित पुरुष वकालत करने के लिये राजनियम से नियत होने चाहिये ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

अथ मृतक अशुद्धि का विचार दिखाते हैं। ऋत्विज्, दीक्षित (जिन ने यज्ञ में दीक्षा ली हो) और ब्रह्मचारी इन को छोड़के अन्य सामान्य मनुष्य लोग दश दिन तक मृत सूतक मानैं। अन्य सपिण्ड के लोग ग्यारह दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पन्द्रह दिन और एक मास तक शूद्र लोग मरण सूतक मानैं। यदि एक के मरने की शुद्धि होने से पहिले उसी कुटुम्ब का अन्य कोई मरजावे तो पहिले के साथ ही अगले की भी शुद्धि कर लेवें । यदि पहिले की शुद्धि में एक रात्रि भर बाकी हो तो दो दिन में शुद्धि करें । यदि पहिले सूतक के अन्तिम दिन प्रातःकाल द्वितीय मृत्यु हो तो तीन दिन अशुद्धि मानैं । जो पुरुष गौ- तथा ब्राह्मण ने मार डाले हों, जो गाड़ी से दब के मरे हों, जो राजाओं के क्रोध से हुए युद्ध में कट के मरे, जो प्रायः नाशक—शस्त्रों से, अग्नि में जल कर, विष खाकर, जल में डूबकर, फांसी लगा कर, वा किसी ऊंचे मकाना-

४० | गौतमस्मृतिः ॥

चतुर्णां पिण्डनिवृत्तिः सप्तमे पञ्चमे वा, जननेप्येवं माता- पित्रोस्तन्मातुर्वा गर्भमाससमारात्रीः संसने गर्भस्य त्र्यहं वा श्रुत्वा चोर्ध्वं दशम्याः पक्षिण्यसपिण्डेयोनिसंबन्धे सहाध्या- यिनि च सब्रह्मचारिण्येकाहं श्रोत्रिये चोपसंपन्ने प्रेतोपस्प- र्शने दशरात्रमाशौचमभिसंधायचेदुक्तं वैश्यशूद्रयोरार्तवोर्वा पूर्वयोश्च त्र्यहं वाऽऽचार्यतत्पुत्रस्त्रीयाज्यशिष्येषु चैवमव- रश्चेत्पूर्वं वर्णमुपस्पृशेत् पूर्वो वाऽवरं तत्र शावोक्तमा- शौचं, पतितचाण्डालसूतिकोदक्याशवस्पृष्टितत्स्पृष्ट्युपस्प- र्शने सचैलोदकोपस्पर्शाच्छुध्येच्छवानुगमे च शुनश्च यदुपहन्यादित्येके,उदकदानं सपिण्डैः कृतचूडस्य तत्स्त्रीणां


द्धि से गिर कर अपनी इच्छा पूर्वक मरे हों उन को सातवें वा पांचवें वर्ष पिण्ड देना निवृत्त हो जाता है अर्थात् आगे उन के नाम से पिण्ड नहीं देना चाहिये । जन्म सूतक में भी इसी तरह मृतक के समान शुद्धि जानो । सन्तानोत्पत्ति में माता पिता दोनों को वा केवल माता को ही अशुद्धि लगती है । गर्भ पात होने पर जितने महीनों का गर्भ गिर जाय उतने दिन में शुद्धि करे । विदेश में दश दिन बाद सूतक जान पड़े तो तीन दिन में शुद्धि करे । यदि सपिण्ड से भिन्न कुटुम्बी वा नातेदारों का सूतक दश दिन बाद सुने तो दो दिन एक रात में शुद्धि करे । और साथ २ पढ़ने वाले वा साथ में जो ब्रह्मचारी रहा हो तथा श्रोत्रिय (वेदपाठी) के स्वर्गवास में एक दिन रात में शुद्धि करे । जान कर मुर्दा का स्पर्श करने वाला दश दिन सूतक माने । वैश्य शूद्रों का सूतक पूर्व में कहचुके हैं । रजस्वला स्त्रियां का तथा सूतकी ब्राह्मण क्षत्रियों का स्पर्श करके तीन दिन में शुद्धि करे । गुरु, गुरुपुत्र, गुरुपत्नी, यजमान और शिष्य के देहान्त में भी तीन दिन सूतक माने । सूतक में नीच वर्ण का पुरुष उत्तम वर्ण का वा उत्तम वर्ण नीच का स्पर्श करे तो मृत सूतक के समान अशुद्धि जानो । पतित (ब्रह्महत्यादि पातकी) चाण्डाल, सूतिका स्त्री, रजस्वला, मुर्दा का स्पर्श करने वाला और उस स्पर्श कर्त्ता का छूने वाला, इन पतितादि का स्पर्श करने पर सचैल स्नान करने पर शुद्ध होता है मुर्दा के संग जाने और हाथ से कुत्ते को मारने पर भी सचैल स्नान करे यह किन्ही आचार्यों का मत है । जिस का चूड़ाकर्म संस्कार हो गया हो उस के मरने

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९

चानतिभोगएके प्रदत्तानामधःशय्यासनिनो ब्रह्मचारिणः सर्वे न मार्जयेरन्न मांसं भक्षयेयुराप्रदानात्प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमनवमेषूदकक्रिया वाससां च त्यागः, अन्त्येत्वन्त्यानां दन्तजन्मादि मातापितृभ्यां तूष्णीं माता, बालदेशान्तरितप्रव्रजितासपिण्डानां सद्यः शौचं, राज्ञां च कार्याविरोधाद् ब्राह्मणस्य च स्वाध्यायानिवृत्यर्थं स्वाध्यायानिवृत्यर्थम् ॥१॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

अथ श्राद्धममावास्यायां पितृभ्यो दद्यात्, पञ्चमीप्रभृति वापरपक्षस्य यथाश्रद्धं सर्वस्मिन्वा द्रव्यदेशब्राह्मणसन्निधाने


पर कुटुम्बी सपिण्ड के लोग जलदान करें । बिना बियाही कन्याओं को जलदान का अधिकार नहीं यह किन्हीं का मत है । कन्यादान हो जाने पर मरें तो जल दिया जाय । सूतक मानने वाले सब लोग दश दिन तक नीचे पृथिवी पर सोवें, बैठे, ब्रह्मचारी रहें, स्नान तथा मार्जनादि शुद्धि न करें, और मांस न खायें कि जब तक प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम दिनों में जल दान करें । और उसी दिन वस्त्रों का भी त्याग करें । शूद्रादि नीचों की शुद्धि के अन्तिम (महिने के पूरे होने पर) दिन वस्त्रों का त्याग और जलदान होना चाहिये । दांत उगने से लेकर चूड़ाकर्म तक बालक के मरने पर माता पिता दोनों या केवल माता अश्रुबिन्दु गिराने के समय मौन रहे । अन्य कुटुम्बी लोग तत्काल शुद्धि करलें । देशान्तर में सपिण्ड का बालक, संन्यासी और सात पीढ़ी से ऊपर कुटुम्बी इन सब के मरने पर तत्काल ही शीघ्र शुद्धि करलें । राजकार्यों की हानि न होने के अनुरोध से राजा को और नित्य नियम से वेदाध्यायन करने वाले ब्राह्मण को वेद अध्ययन का नियम न बिगड़ने के विचार से तत्काल शुद्धि कर लेनी चाहिये ॥ १ ॥

यह गौतमीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१४॥

अब श्राद्ध का विचार दिखाते हैं । प्रत्येक अमावश्या को पितरों के लिये पार्वण श्राद्ध विधि से पिण्ड देने चाहिये । वा कृष्णपक्ष की पञ्चमी से लेकर श्राद्ध करे । अथवा श्राद्ध का सामान, श्राद्ध के योग्य देश (स्थान) और विद्वान् सुपात्र ब्राह्मण जब मिल जांय तभी श्रद्धानुसार सभी तिथियों में श्राद्ध करे ।

४२ गौतमस्मृतिः ॥

वा कालनियमः शक्तितः प्रकर्षे गुणसंस्कारविधिरन्नस्य नवावरान् भोजयेदयुजो यथोत्साहं वा ब्राह्मणान् श्रोत्रियान् वाग्रूपवयःशीलसंपन्नान् युवभ्यो दानं प्रथममेके पितृवन्न च तेन मित्रकर्म कुर्यात्, पुत्राभावे सपिण्डा मातृसपिण्डाः शिष्याश्च दद्युस्तदभावे ऋत्विगाचार्यो॥ तिलमाषब्रीहियवोदकदानैर्मासं पितरः प्रीणन्ति, मत्स्यहरिणरुरुशशकूर्म्मवराहमेषमांसैः संवत्सरं, गव्यपयःपायसैर्द्वादश वर्षाणि, वाध्रीणसेन मांसेन कालशाकलोहखड्गमांसैर्मधुमिश्रैश्चानन्त्यम् ॥१॥ न भोजयेत् स्तेनकलीवपतितनास्तिकतद्वृत्तिवीरहाग्रेदि-


काल का नियम और अन्न को विशेष शुद्धि सावधानी से बनाने का विचार तो विशेष कर मानना चाहिये । श्राद्ध में नौ से कम १ । ३ । ५ । ७ ऐसे विषम संख्या वालों को वा वाणी, रूप, अवस्था, और स्वभाव जिनके अच्छे हों ऐसे वेदपाठी श्रोत्रियब्राह्मणों को अपनी शक्ति उत्साह के अनुसार भोजन करावे। कोई आचार्य कहते हैं कि जो युवावस्था में मरे हों उनके नाम के ब्राह्मणों को पहिले जिमावे। जिन ब्राह्मणों का श्राद्ध में पूजन करे उनके साथ मित्रवत् बराबरी का व्यवहार कभी न करे किन्तु उनका सदा पूज्यमाना करे। जिन के कोई पुत्र न हों उन के लिये अपने सपिण्डा या माता के सपिण्डा अथवा शिष्य लोग श्राद्ध करें। यदि इन में भी कोई न हो तो ऋत्विक् वा गुरु उनका श्राद्ध करें। तिल माष ( उड़द ) धान, जौ और जल से किये श्राद्ध से एक मास तक पितर तृप्त होते, मछली, हिरण, रोज, शश ( खरगोश, ) कछुआ, भैंसा, और मेढ़ा इनके मांस से एक वर्षतक, गौ के दूध, पायस ( खीर ) और बड़े २ कानों वाले बकरे के मांस से बारह वर्षतक, उन २ ऋतु के शाक, लाल बकरा, गैंडा, इनके शहद मिले मांस के पिण्डों से अनन्त कालतक पितरों की तृप्ति होती है ॥ १ ॥ ( जिस द्विज लोगों के लिये मांस खाने का निषेध है उनके लिये मांस के पिण्ड देने का भी निषेध ही जानो । क्योंकि ( यदन्नःपुरुषोभवतितदन्नास्तस्य देवताः ) जिस २ अन्न को जो २ खाता हो वही अपने २ देवों तथा पितरों को देवे यह परम सिद्धान्त है । इस के अनुसार ( निषेध होने पर भी ) जो मांसाहारी हैं उन्हीं को युगान्तरों में भी मांस पिण्ड देने का विधान जानो । और कलिमें तो सभी के लिये मांस के पिण्डों का निषेध ही है ) चोर, नपुंसक, नास्तिक, नास्तिकता के कामों से जीविका करनेवाला, पतित, वीर पुरुष की

भाषार्थसहिता ॥ ५३

धिषूदिधिषूपतिस्त्रीग्रामयाजकाजपालोत्सृष्टाग्निमद्यपकुचर- कूटसाक्षिप्रातिहारिकानूपपतिर्यस्य च कुण्डाशी सोमविक्रय्य- गारदाही गरदावकीर्णिगणप्रेष्योऽगम्यागोमिहिंस्रपरिवित्ति- परिवेत्तृपर्याहृतपर्याधातृत्यक्तात्मदुर्बलाः कुनखिश्यावदन्त- श्वित्रिपौनर्भवकितवाजपराजप्रेष्यप्रतिरूपकशूद्रपतिनिरा- कृतिकिलासिकुसीदिवणिक्शिल्पोपजीविज्यावादित्रतालवृ- त्यगीतशीलान् पित्राचाकामेन विभक्तान् शिष्यांश्र्चैके सगोत्रांश्च ॥२॥

हत्या करनेवाला, जिसके मौजूद होते ही स्त्री ने अन्य पुरुष करलिया हो, वा जिसने अन्य की विवाहिता स्त्री को रखलिया हो, स्त्री को और गांवभर के मनुष्यों को एक साथ यज्ञ करानेवाला, भेड़ बकरी पालनेवाला, जिसने स्थापन किये अग्नि को त्यागा हो, मद्य पीनेवाला, जिसका चाल चलन अच्छा न हो, झूठ गवाही देनेवाला, जिसकी स्त्री का दूसरा जार पति हो, कूंडे में भोजन करने-वाला, यज्ञ में सोम बेचने वाला, घर में आग लगाने वाला, विष देनेवाला, ब्रह्मचारी होकर जो व्यभिचार करे, सभा का नौकर, अगम्या स्त्री से गमन कर-नेवाला, हिंसक, ज्येष्ठ भाई से पहिले जो अपना विवाह करे वा अग्निहोत्र लेवे वह, और उसका जेठा भाई, जो सब ऊंच नीचों से सब प्रकार का दान लेवे, जो सब वेश्यादि नीच स्त्रियों से भी व्यभिचार करे, जिसने अपने शरणा-गतों वा दुर्बल अनाथ पुत्रादि को त्यागा हो, जिसके नख बिगड़े हों, दांत काले हों, श्वेतकुष्ठी, जो अन्य की स्त्री में पैदा हुआ हो, ज्वारी, बकरियों का पालने वाला, राजा का नौकर, बहुरूपिया, शूद्रा स्त्री का पति, जिसका अनादर खण्डन होता हो, किलासि (एक प्रकार का कुष्ठी,) सूद लेनेवाला, पंसारी आदि की दुकान करने वाला, कारीगर, धनुषबाण चलाने-वाजे ताल बजाने-नाचने और गाने के स्वभाववाला, पिता की आज्ञा वा इच्छा के बिना जिसने विभाग (बांट) किया हो ऐसे उक्तप्रकार के चोरी आदि काम करने वाले ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन न करावे। और कोई आचार्य कहते हैं कि अपने गोत्र के लोगों और अपने शिष्यों को भी श्राद्ध में भोजन न करावे ॥२॥

४४ गौतमस्मृतिः ॥

भोजयेदूर्ध्वं त्रिभ्यो गुणवन्तम् ॥३॥ सद्यः श्राद्धी शूद्रा तल्पगस्तत्पुत्रपुरीषे मासं नयति पितॄंस्तस्मात्तदहर्ब्रह्मचारी स्यात्,श्वचण्डालपतितावेक्षणे दुष्टं तस्मात् परिश्रिते दद्यात्, तिलैर्वा विकिरेत्, पङ्क्तिपावनो वा शमयेत्, पङ्क्तिपावनाः षडङ्गविज्ज्येष्ठसामगस्त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुस्त्रिसुपर्णः पञ्चाग्निः स्नातको(मन्त्रब्राह्मणविद्) धर्म्मज्ञो ब्रह्मदेयानुसंतानइति हविःषु चैवं दुर्बलादीन् श्राद्धएवैके श्राद्धएवैके ॥ ४ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥


तीनसे ऊपर पांच वा सात सुपात्रों को अथवा इतने न मिलें तो एक ही गुणवान् तपस्वी विद्वान् धर्मात्मा को भोजन करावे॥३॥ यदि श्राद्ध करने वाला उसी दिन वेश्यादि शूद्रा स्त्री से संयोग करे तो उस शूद्रा से होने वाले पुत्रों की विष्ठा में श्राद्ध कर्त्ता के पितर एक मास तक बसते हैं। इस से श्राद्धकर्ता पुरुष श्राद्ध के दिन ब्रह्मचारी रहे । कुत्ता, चाण्डाल, और पतित लोग श्राद्धान्न को देखें तो दूषित हो जाता है । इस से घेरी हुई एकान्त जगह में श्राद्ध के भोजन और पिण्डदान करे । वा श्राद्ध स्थान के सब ओर तिल विखेर देवे अथवा पङ्क्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध में हो तो अन्यकृत दोष को शान्त कर देगा । १-वेद के छहों अंगों को जानने पढ़ाने वाला । २-सामवेद के आरण्यक भाग को पढ़ा । ३-यजुर्वेद के अध्वर्यु कर्म का ज्ञाता याज्ञिक । ४-जो उपनिषदों में कही तीन प्रकार की मधु विद्या का विद्वान् हो । ५-ऋग्वेद सम्बन्धी होताओं के कर्म का जानने वाला याज्ञिक । ६-गार्हपत्यादि श्रौतस्मार्त्त पञ्चाग्नियों को विधिपूर्वक स्थापित करके अग्निहोत्र नित्य करने वाला । ७-ब्रह्मचर्याश्रम में पूर्ण वेदाध्ययन करके जिस ने समावर्त्तन किया हो । ८-मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग वेद को जानने वाला । ९-धर्म का मर्म जानने वाला धर्मनिष्ठ । १०-और विधिपूर्वक हुए ब्राह्म विवाह से उत्पन्न सन्तान । ये दशप्रकार के ब्राह्मण पङ्क्तिपावन कहाते हैं। देवताओं सम्बन्धी ब्रह्मभोज में भी इसी प्रकार उत्तम निकृष्ट ब्राह्मणों की परीक्षा जानी । किन्ही आचार्यों का मत है कि दुर्बलादि निषिद्ध ब्राह्मणों काश्राद्ध में ही त्याग करे किन्तु दैवकर्मों में परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है ॥ ४ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ९५

श्रवणादि वार्षिकं प्रौष्ठपदीं वोपाकृत्याधीयीत छन्दां स्यर्ध पञ्चमासान् पञ्च दक्षिणायनं वा ब्रह्मचार्य्युत्सृष्टलोमा न मांसं भुञ्जीत द्वैमास्यो वा नियमो, नाधीयीत वायौ दिवा पांसुहरे कर्णश्राविणि नक्तं वाणभेरीमृदङ्गजगर्त्तशब्देषु च श्वशृगालगर्दभसंहादे लोहितेन्द्रधनुर्नीहारेष्वभ्रदर्शने चा- पत्तौ मूत्रित उच्चरिते निशासन्ध्योदकेषु वर्षति चैके वली- कसंतानआचार्य्यपरिवेषणे ज्योतिषोश्च भीतो यानस्थः श- यानः प्रौढपादः श्मशानग्रामान्तमहापथाशौचेषु पूतिगन्धा- न्तःशवदिताकीर्त्तिशूद्रसन्निधाने सूतके चोद्गारे ऋग्यजुषं च सामशब्दे यावदाकालिका निर्घातभूमिकम्पराहुदर्शनोल्का-

श्रावणी पौर्णमासी को वा भाद्रपद की पौर्णमासी को उपाकर्म करके साढ़ेचार महिने वा दक्षिणायन के पांच महिनों में सब बालों का मुण्डन करा के ब्रह्मचारी रहता हुआ नियम से वेदों को पढ़े। मांस न खावे। अथवा दो महिनेतक ही वेदाध्ययन का नियम करे। और निम्न लिखित समयों में वेद न पढ़े किन्तु वेदाध्ययन का अनध्याय रक्खे—दिन में आंधी (तूफान आवे) चले, रात के समय कानों में वायु का शब्द सुन पड़े, वाण, नक्कारा, मृदङ्ग, हाथी, और रोगी का चिल्लाना इन बाण आदि का शब्द होने पर, कुत्ता, शृगाल (गीदड़,) गधा, इन का शब्द होने पर, दिशाओं में लाली, इन्द्र धनुष, और कुहिरा पड़ा जबदीखे, वर्षा से भिन्न समय बादल होने पर, जब पेशाब करे वा शौच (मलवत्याग) करे तब शुद्धि करने से पहिले, रात में, दो सन्ध्याओं के समय, जल के बीच, कोई कहते हैं कि वर्षते समय भी, छप्पर (छादन) छावने उठाने के समय, जब गुरु के पास सभालगी हो, वा जब सूर्य चन्द्रमा के सब ओर घेरा खिंचा दीखे, ऐसे आंधी आदि के समय वेद का अनध्याय रक्खे। जब भय लगे, सवारी में बैठा, लेटा हुआ, और पग फैला के भी वेद को न पढ़े। श्मशान (मरघट) में, गांव नगर के समीप, जहां बहुत मनुष्य चलते हों ऐसे बड़े मार्ग के समीप, अशुद्धि के समय, जहां दुर्गन्ध अधिक हो, जिस ग्राममें मुर्दा पड़ा हो उसकी हद्द (सीमा) में, चाण्डाल तथा शूद्र के समीप, सूतक के समय, वमन करके वेद न पढ़े। सामवेद

४६ | गौतमस्मृतिः ॥

स्तनयित्नुवर्षविद्युतः प्रादुष्कृताग्निष्वनृतौ विद्युति नक्तं चापररात्रात्त्रिभागादिप्रवृत्तौ सर्वमुल्काविद्युत्सममित्येकेषाम् ॥ १ ॥ स्तनयित्नुरपराह्णेऽपि प्रदोषे सर्वं नक्तमर्द्धरात्रादहश्चेत्सज्योतिर्विषयस्थे च राज्ञि प्रेते विप्रोष्य चान्योन्येन सह संकुलोपाहितवेदसमाप्तिच्छर्द्दि श्राद्धमनुष्ययज्ञभोजनेष्वहोरात्रममावास्यायां च द्व्यहं वा कार्त्तिकी फाल्गुन्याषाढी पौर्णमासी तिस्रोऽष्टकास्त्रिरात्रमन्यामेके अभितो वार्षिकं सर्व्वैर्वर्षविद्युत्स्तनयित्नुसन्निपाते प्रस्पन्दिन्यूर्ध्वं भोजनादुत्सवे प्राधीतस्य च निशायां चतुर्मुहूर्तं नित्यमेके

की ध्वनि में ऋग्वेद यजुर्वेद को न पढ़े। जब आकाश में अकस्मात् उत्पात का शब्द हो, भूकम्प हो, जब राहु का उपद्रव दीखे, जब बड़ा उल्कापात हो, सन्ध्याओं में वा वर्षा से भिन्न काल में बादल गर्जे-मेघ वर्षे-बिजुली चमके वा रात में विद्युत् गिरे तब एक दिन रात वेद का अनध्याय करे। आधी-रात से लेके रात के तीसरे प्रहर में वेद को न पढ़े। किन्हीं आचार्यों का मत है कि उल्कापात और विद्युत् का भयंकर शब्द होने पर सभी समय अर्थात् वर्षा में भी वेद का अनध्याय करे ॥ १ ॥ यदि अपराह्न (दोपहर बाद) में वा सन्ध्या के समय बादल गर्जे तो रात्रि भर वेद न पढ़े। यदि दो पहर से पहिले गर्जे तो सन्ध्या तक न पढ़े। जिस राजा के राज्य में रहता हो उन का स्वर्गवास होने पर, विदेश में जाकर परस्पर एक दूसरे के साथ असम्भव मेज के समय, वेद समाप्ति पर, वमन के समय, श्राद्ध के भ-जन, अतिथि बन के अन्य के घर भोजन करने पर इन अवसरों में एक दिन रात वेद न पढ़े। चतुर्दशी, अमावास्या, कार्त्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ महिनों की पौर्णमासी, (इन्हीं पौर्णमासियों में चातुर्मास्ययागों के तीन पर्व होते हैं) तीनों अष्टका श्राद्धों में तीन दिन तक, इन चतुर्दश्यादि में वेद को न पढ़े। कोई आचार्य कहते हैं कि वर्षा ऋतु के आदि अन्त में वर्षा, बिजुली की चमक और गर्जना एक साथ हों वा बूंदें पड़ती हों, भोजन के ऊपर, तथा उत्सव के समय भी वेद को न पढ़े। पढ़े हुए वेद का रात्रि के पहिले प्रहर में ही पाठ

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४७

नगरे मानसम्प्यशुचि श्राद्धिनामाकालिकमकृतान्नश्राद्धिकसं योगेऽपि प्रतिविद्यं च यावत्स्मरन्ति यावत्स्मरन्ति ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ प्रशस्तानां स्वकर्मसु द्विजातीनां ब्राह्मणो भुञ्जीत, प्रति- गृह्णीयाच्चैधोदकयवसमूलफलमध्वभयाभ्युद्यतशय्यासनावस- थयानपयोदधिधानासफरिप्रियङ्गुस्रङ्मार्गशाकान्यप्रणोद्या- नि सर्वेषां पितृदेवगुरुभृत्यभरणे चान्यवृत्तिश्चेन्नान्तरेण शूद्रान्,पशुपालक्षेत्रकर्षककुलसंगतकारपितृपरिचारका भोज्या न्ना वणिक् चाशिल्पी,नित्यमभोज्यं केशकीटावपन्नं रजस्व- लाकृष्णशकुनिपदोपहतं भ्रूणघ्नावेक्षितं गवोपघातं भावदुष्टं


करे । गांव वा नगर में, तथा मनमेंग्लानि होने पर नित्य ही अनध्याय करे । श्राद्ध करनेवाला एक दिन रात वेद न पढ़े । यदि श्राद्ध सम्बन्धी कच्चा अन्न सीधा लेवे तो भी वेद का अनध्याय करे। प्रत्येक वेद में जितना२ कहा हो उ- तना अनध्याय माने ॥ २ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ॥१६॥

ब्राह्मण पुरुष उन द्विजातियों के घरपर भोजन करे जो अपने२ शास्त्रोक्तकर्मों में प्रशंसा पाये हों। और ईंधन, जल, भूसा, मूल, फल' शहद, अभय, नये बने हुए तयार-खटिया, आसन, घर' सवारी, ( रथादि ) दूध, दही, भुनेजौ, मछली, ककुनी' माला, मार्ग, और हरे शाक इन पदार्थों को जो कोई प्रीति श्रद्धा से देवे तो पितर, देव और गुरुकी पूजार्थ तथा स्त्री पुत्रादि की रक्षार्थ सब के ले लेवे निषेध न करे। यदि अध्यापनादि द्वारा अन्य जीविका निर्वाह के लिये हो तो शूद्रों को छोड़कर अतिशूद्रादि से न लेवे। गोपाल, किसान, कुलका संगी, पिता का सेवक और जो कारीगरी को छोड़ के अन्य प्रकार की दुकान करता हो ऐसे शूद्रों का भी कच्चा अन्न ब्राह्मण को भक्ष्य है। जिस पकाये भोजन में बाल वा कीड़े गिर गये हों, रजस्वला स्त्री ने छू लिया हो, काले पक्षी के पग जिसमें लग गये हों, भ्रूण ( गर्भ ) हत्या करने वाले ने जिसे देखा हो, गौ वा बैलने सूंघा हो, जिसको किसी ने दूषित कहा हो वा जिस के दूषित होने में शंका हो गयी हो, जो दही को छोड़ के धरा रहने से ख-

४८ गौतमस्मृतिः ॥

शुक्तं केवलमदधि पुनःसिद्धं पर्युषितमशाकभक्ष्यस्नेहमांसम-
धन्युत्सृष्टपुंश्चल्यभिशस्तानपदेश्यदण्डिकतक्षकदर्यबन्धनिकार्चिकित्सकमृगयुवार्युच्छिष्टभोजिगणविद्विषाणामपाङ्क्ता-
नां प्राग्दुर्बलाद्वृथानाचमनोत्थानव्यपेतानि समासमा-
भ्यां विषमसमै पूजान्तरानर्चितं च गोश्च क्षीरमानर्दशा-
याः सतकेचाजामहिष्योश्च नित्यमाविकमपेयमौष्ट्रमेकशफं
च स्यन्दिनी यमसूसन्धिनीनां च याश्च व्यपेतवत्साः प-
ञ्चनखाश्चाशल्यकशशकश्वाविद्गोधाखड्गकच्छपाउभयतोद-
त्केशलोमैकशफकलविङ्कप्लवचक्रवाकहंसाः काककङ्कगृ-


टाय गया हो' फिर से पकाया, धरा हुआ ( बासी ), ये उक्त सब पक्वान्न अभक्ष्य हैं। परन्तु शाक, भक्षण के योग्य घी तेलादि स्नेह, मांस और मिष्टान्न ये घरे हुए भी अभक्ष्य नहीं हैं। जो अन्न किसी ने छोड़ वा फेंक दिया हो, निन्दितका, यह न ज्ञात हो कि यह किसके यहां का है, संन्यासीका, बढ़ई, कंजूस, कैदी, वैद्य, वधिक, वारी, जूठन खानेवाला, इन निन्दितादि का, चन्दे का, विद्वेषी ( शत्रुओं ) का और बिरादरी से छेके हुओं का अन्न अभक्ष्य है। अपने आश्रित या घरके रोगी आदि से पहिले भोजन न करे। जिस में से पंच महायज्ञ न हुए हों ऐसा वृथान्न, पांति में कोई भी अन्त का आचमन (ओ-ममृतापिधानमसि स्वाहा ) मन्त्र से कर ले तब वा कोई पांति में से उठ जावे तब वा जब पांति के लोग भोजन करना छोड़ देवें तब भी भोजन न करे। जहां बराबर वालों में पक्षपात से आदर की विषमता की जाय वा ऊंच नीचों का तुल्य आदर किया जाय वहां भी भोजन न करे। जहां पहिले की अपेक्षा आदर कम हो, वा आदर के साथ जहां भोजन न कराया जाय वहां भी न खावे। व्याने पर सूतक समय दश दिन के भीतर गौ भैंस तथा बकरी का दूध न खावे, भेड़ी, ऊंटनी, घोड़ी, ऋतुमती वा जिसका दूध थनों में से चूता हो, जो दो बच्चों से व्यावे, जो गर्भर्वार्तणी आदि हो और दूध देवे, जिस गौ आदि का बच्चा मरगया हो इन भेड़ी आदि का दूध न खाना चाहिये। सेही, शश (खरहा), गोधा ( गोह ), गैंठा, और कछुआ को छोड़कर बाकी पांच नखोंवाले, दोनों ओर दांतोंवाले, केशों के तुल्य बड़े २ लोमोंवाले, एक खुर वाले, कलविङ्क ( गवरापक्षी ) प्लव ( जल में तरनेवालेपक्षी ) चकवा, हंस, कौवा, कंक ( जिस के पंखों को बाण में लगाते हैं ) गीध, और श्येन पक्षी,

भाषार्थसहिता ॥ ४९

प्रश्येना जलजा रक्तपादतुण्डा ग्राम्यकुक्कुटसूकरौ धेन्वन- डुहौ चापन्नदावसन्नवृथामांसानि किसलयक्याकुलसूननिर्याास- लोहिताव्रश्चनाःश्वनिहतदारुवकबलाकाद्रुद्रुटिट्टिभमान्धातृ नक्तंचरा अभक्ष्याः ॥१॥ नभक्ष्याः प्रतुदा विकिरा जालपादा मत्स्याश्चाविकृतावध्याश्च धर्मार्थेऽव्यालहता दृष्टदोषवाक्- प्रशस्तान्यभ्युक्ष्यौपयुञ्जीतोपयुञ्जीत ॥ २ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥

अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री नातिचरेद्भर्त्तारं वाक्चक्षुःकर्म्मसंय- ताऽपमिरपत्यलिप्सुर्देवराद्गुरुप्रसूतान्नर्त्तुमृतीयात्पिण्डगोत्र-

जल में पैदा हुए मछली आदि, जिनके पंजे वा चोंच लाल हों, गांव का मुरगा, गांव का सूअर, गौ, बैल, स्वयं मरे, वनके अग्नि से जलके मरे। इन सब पशुनक्षादि का मांस नहीं खाना चाहिये। यज्ञादि को छोड़ केवल खाने के लोभ से प्राप्त किया मांस भी अभक्ष्य है। पत्तों का रसादि, स्वयं सादें का मांस, वृक्षों का लाल गोंद, गोदमे से निकला गोंद, कुत्ते ने मारी शिकार, कठफोरवा (दारुवक), बगला, रोगीजीव, टिटुहिया, मान्धाता-पक्षी, और रात्रि में विचरने वाले चमगीदड़ आदि ये सब अभक्ष्य हैं ॥ १॥ जो चोंच से मार २ के जीवों को खाते, नखों से बिखेर २ के जो खाते, जिन के पग जाल के तुल्य हैं और सब मछलियां भी अभक्ष्य हैं। जिसके शरीर में विकार हो और जो अवध्य हैं उन का भी मांस न खावे। यज्ञादि धर्म के लिये जो पशुपक्षी विधिपूर्वक मारे गये हों, जिन को सांप ने न काटा हो, जिन में शास्त्र से वा प्रत्यक्ष से कोई दोष न देखा गया हो और वाणी से जो प्रशस्त हों ऐसे जीवों के मांस को देवता तथा पितरों का पूजन समर्पण करके उपयोग में लावे ॥ २ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

धर्मविषय में स्त्री स्वतन्त्र नहीं है, वाणी, चक्षु, और हाथ पांव की चेष्टा को वशीभूत नियम बद्ध रखती हुई पति की आज्ञाका उल्लंघन न करे। पति के अभाव में सन्तान को चाहती हो तो देवर, गुरुपुत्र वा पिण्ड गोत्र ऋषि जिन के एक ही हों ऐसे पति के कुल के कोई पुरुष अथवा पति के कुल के किसी पुरुष से ऋतुकाल में वीर्यदान लेकर सन्तान उत्पन्न कर लेवे। कोई

५०गौतमस्मृतिः ॥

ऋषिसंबन्धिभ्यो योनिमात्रान्द्वा, नादेवरादित्येके, नातिद्वितीयं, जनयितुरपत्यं समयादन्यत्र जीवतश्च क्षेत्रे परस्मात्तस्य द्वयोर्वा रक्षणाद्भर्तुरेव नष्टे भर्तरि षाड्‌वार्षिकं क्षपणं श्रूयमाणेऽभिगमनं प्रव्रजिते तु निवृत्तिः प्रसङ्गात्तत्स्य द्वादशवर्षाणि ब्राह्मणस्य विद्यासंबन्धभ्रातरि चैवं ज्यायसि यवीयान्कन्याग्न्युपयमनेषु षडित्येके त्रीन्कुमार्यृतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलङ्कारान् प्रदानं प्रागृतोरप्रयच्छन् दोषी प्राग्वाससः प्रतिपत्तेरित्येके द्रव्या-

आचार्य कहते हैं कि देवर से भिन्न पुरुष के साथ नियोग न करे। पति से अन्य दूसरे नियुक्त का उल्लंघन करके किसी तीसरे से स्त्री संग न करे। नियोग के नियत समय से भिन्न काल में नियुक्त के साथ स्त्री संग करे तो वह सन्तान उत्पादक नियुक्त पुरुष का होगा। और पति के जीवित रहते ही यदि अन्य किसी पुरुष से सन्तान उत्पन्न हो तो वह सन्तान उस उत्पादक का वा दोनों का माना जायगा (अर्थात् बीज के स्वत्व से उत्पादक का और क्षेत्र के स्वत्व से क्षेत्र वाले का होगा) यदि स्त्री का पति उस की रक्षा भी करे तो उसी का सन्तान होगा। किसी स्त्री का पति कहीं विदेश में चला जाय और पता न हो कि कहां गया तो छः वर्ष तक उस की बाट देखे कालक्षेप करे। यदि सुन पड़े कि अमुक ग्राम वा नगर में है तो पति के समीप स्त्री चली-जावे। यदि वह पति संन्यासी हो गया हो तो फिर उस के पास न जावे। योनि सम्बन्धी वा विद्या सम्बन्धी बड़े भाई ब्राह्मण के कहीं अज्ञात निकल जाने पर छोटा भाई कन्या के स्वीकार, अग्नि स्थापन और विवाह करने के लिये बारह वर्ष तक वा किन्हीं आचार्यों के मत से छः वर्ष तक बाट देखे। यदि ऋतुमती होने से पहिले पिता वा पितृस्थानी चाचा भ्रातादि कन्या का विवाह न करदें तो तीन बार ऋतुमती होने पश्चात् पिता के दिये आभूषणों का त्याग करके स्वयं किसी अनिन्दित सत्पात्र वर के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेवे । ऋतुमती होने से पहिले विवाह न करे तो पितादि को पाप दोष लगता है। और कोई आचार्य कहते हैं कि वस्त्र में दाग लगने से पहिले ही विवाह न करने पर पाप लगता है। कन्या का विवाह करने के

भाषार्थसहिता ॥ ५१

दानं विवाहसिद्ध्यर्थं धर्म्मतन्त्रप्रसंगे च शूद्रादन्यत्रापि शू- द्राद् बहुपशोर्हीनकर्म्मणः शतगोरनाहिताग्नेः सहस्रगोर्वा सो- मपात् सप्तमीं चाभुक्त्वाऽनिचयायाप्यहीनकर्मभ्य आचक्षी- त राज्ञा पृष्टस्तेन हि भर्त्तव्यः श्रुतशीलसंपन्नश्चेद्धर्म्मतन्त्रपी- डायां तस्याकरणेऽदोषोऽदोषः ॥१॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ द्वितीयः प्रपाठकश्च पूर्णः ॥ उक्तो वर्णधर्म्मश्चाश्रमधर्म्मश्चाथ खल्वयं पुरुषो येनक- र्म्मणा लिप्यते यथैतदयाज्ययाजनमभक्ष्यभक्षणमवद्यवदनं

लिये वा दान पुण्यादि धर्मकार्यों के निमित्त शूद्र से भी धन ले लेवे । तथा अन्य कामों में भी बहुत पशुओंवाले शूद्र से वा सैकड़ों गौओं वाले धर्म कर्म हीन अनाहिताग्नि ( जिसने विधिपूर्वक अग्नि स्थापन करके अग्निहोत्र नहीं लिया ऐसे ) द्विज से वा सात पीढी से जिसके घर में अग्निष्टोमादि सोमयाग होते आये हों ऐसे द्विज से धन लेलेवे । और स्वयं न खावे न जोड़कर पास रक्खे, किन्तु तत्काल किसी धर्म के काम में लगा देवे तो ऐसे काम के लिये धर्म कर्महीन नीच पुरुषों से भी धनादि लेलेवे । यदि विद्वान् गृहस्थ से राजा पूछे तो धर्मादि जिस काम के लिये जितना धनादि अपेक्षित हो सो ठीक २ कह देवे । राजा को उचित है कि गृहस्थ ब्राह्मण वेदवेत्ता तथा सीधा सच्चा स्वभाववाला हो तो उसका भरण पोषण अवश्य करे । यदि धर्मसम्बन्धी कि- सी काम के करने में शरीर को अत्यन्त कष्ट पहुंचना सम्भव हो तो उसके न करने में दोष नहीं लगेगा ॥१॥ इस१८ वें अध्याय में जो नियोग का विषय है सो यह नियोग राजा वेन का चलाया है । उसके बाद में ऋषियों तथा आचा- यों ने जो२ धर्मशास्त्र प्रकाशित वा प्रवृत्त किये उनसब में राजा के अनुरोध से नियोग लिखा गया है । इन सब बीशो२० धर्मशास्त्रों में मानव धर्मशास्त्र मुख्य वा श्रेष्ठ है । जब उसमें इस वेन राजप्रचारित नियोग का खण्डन किया गया तो सभी धर्मशास्त्रों में वही खण्डन काफी है ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठाह्रवां अध्याय पूरा हुआ ॥१८॥ वर्णों और आश्रमों का धर्म कहा गया । अब यह विचार किया जाता है कि यह ब्राह्मणादि मनुष्य जिस २ कर्म से लिप्त नाम पापी अपराधी होता है जैसे कि जिसको यज्ञादि का अधिकार नहीं उस शूद्रादि को यज्ञ कराना, अभक्ष्य का भक्षण, न कहने योग्य मिथ्या भाषणादि करना,

५२ गौतमस्मृतिः ॥

शिष्टस्याक्रिया प्रतिषिद्धसेवनमिति, तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति, मीमांसन्ते न कुर्यादित्याहुर्नहि कर्म क्षीयत इति । कुर्यादित्यपरे पुनस्तोमेनेष्ट्वापुनःसवनमायान्तीति विज्ञायते व्रात्यस्तोमेनेष्ट्वा तरति सर्वं पाप्मानं, तरति ब्रह्महत्यां योऽश्व- मेधेन यजतेऽग्निष्टुताभिशस्यमानं, याजयेदिति च ॥१॥ तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानमुपनिषदो वे- दान्ताःसर्व्वच्छन्दःसु संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजनरौहिणे सामनी बृहद्रथन्तरे पुरुषगतिर्महा- नाम्न्यो महावैराजं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमद्


शास्त्र में कहे सन्ध्यादि कर्म न करना, और निषिद्ध हिंसादि को करना इत्या- दि के लिये प्रायश्चित्त करे वा न करे ऐसी मीमांसा नाम सन्देह करते हैं । इसमें पूर्वपक्षी कहते हैं कि प्रायश्चित्त न करे क्योंकि किया हुआ कर्म अपना फ- ल दिये बिना क्षीण ( नष्ट ) नहीं होता । इसीपर यह जनश्रुति चली है कि- ( अवश्यमेवभोक्तव्यं कृतंकर्मशुभाशुभम् । ) परन्तु उत्तर पक्ष के ऋषि तथा आचार्य कहते हैं कि प्रायश्चित्त अवश्य करे। क्योंकि श्रुति में लिखा है कि स्तोम यज्ञ करके फिर सोमपागादि का अधिकारी हो जाता है । व्रात्यस्तोम यज्ञ करके सब पापों से पार हो जाता है और जो अश्वमेध यज्ञ करता है वह ब्रह्महत्या के महापातक से भी मुक्त हो जाता है । और चोरी व्यभिचार आ- दि से दूषित निन्दित द्विज को अग्निष्टुत् यज्ञ करावे ॥ १ ॥ उन यज्ञों के करने की सामर्थ्य सर्वसाधारण लोगों को नहीं हो सकती इसलिये यज्ञादि के प्र- त्याम्नाय नाम प्रतिनिधि प्रायश्चित्तरूप शुभ कर्त्तव्य ये हैं कि-जप, तप, होम, उप- वास, दानकरना, इनका आगे क्रम से विशेष व्याख्यान करते हैं। उपनिषदरूप वे- दान्त ग्रन्थों का पाठ करना, गायत्र्यादि सब छन्दों में वेद संहिताओं का श्रद्धाभक्ति से अभ्यास,मधुमती (मधुवाता०) इत्यादि तीन ऋचा,अघमर्षणसूक्त, अथर्वशीर्ष,रुद्राध्याय,पुरुष सूक्त,राजन और रौहिण दोनों साम,बृहद्रथन्तरसाम, पुरुषगति, महानाम्नीऋचा, महावैराज, महादिवाकीर्त्य, ज्येष्ठ सामों में से कोई एक साम, बहिष्पवमान सूक्त, कूष्माण्डसूक्त,पवमानसूक्त, इनमें से किसी

भावार्थसंहिता ॥ ५३

बहिष्पवमानं कूष्माण्डानि पावमान्यः सावित्रीचेति पावनानि ॥ २ ॥ पयोव्रतता शाकभक्षता फलभक्षता प्रसृतयावको हिरण्यप्राशनं घृतप्राशनं सोमपानमिति च मेध्यानि ॥३॥ सर्वे शिलोच्चयाः सर्वाः स्रवन्त्यः पुण्या ह्रदास्तीर्थानि ऋषिनिवासा गोष्ठपरिस्कन्दा इति देशाः ॥ ४ ॥ ब्रह्मचर्यं सत्यवचनं सवनेषूदकोपस्पर्शनमार्द्रवस्त्रताऽधःशायिकाऽनाशक इति तपांसि ॥५॥ हिरण्यं गौर्वासोऽश्वो भूमिस्तिला घृतमन्नमिति देयानि ॥ ६ ॥ संवत्सरः षण्मासाश्चत्वारस्त्रयो द्वावैकश्चतुर्विंशत्यहो द्वादशाहः षडहस्त्र्यहोऽहोरात्रइति काला एतान्येवानादेशे विकल्पेन क्रियेरन् ॥७॥ एनस्सु गुरुषु गुरूणि


का वा कई का बहुत कालतक नियम से निरन्तर श्रद्धा के साथ अभ्यास करे तो पापों से मुक्त होजाता है ( यह सब जप का व्याख्यान है ) ॥ २ ॥ केवल दूध, वा शाक, फल, एक उलटे हाथ में जितना एकवार में भराजाय उतना कुलत्थ ( खुत्थी, ) अन्न एक दिन में खाना, इन दूध आदि के व्रतों से, तथा सुवर्ण, गोघृत वा सोमपान रसायन कल्प के विधान से खाना ये सब मेधानाम् बुद्धि को शुद्ध करनेवाले और जप तप के सहायक हैं ॥३॥ सब पहाड़, सब सोता झरना वा नदियां, पवित्र कुण्ड वा तीर्थ ( तालाव ) ऋषियों के रहने की तपोभूमि, किसी से सुरक्षित गोशाला ये सब स्थान जप तप के समय निवास के योग्य उपयोगी हैं ॥ ४ ॥ जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी रहना, सत्य बोलना, सायं प्रातःकाल और मध्यान्ह में तीनोंवार स्नान करना, गीले वस्त्र पहनना, भूमिपर लेटना सोना, कुछभी भोजन न करना ये सब तप कहाते हैं ॥ ५ ॥ सुवर्ण, गौ, वस्त्र, घोड़ा, भूमि, तिल' घी'अन्न, इन पदार्थों का सुपात्र धर्म निष्ठ विद्वान् ब्राह्मण को देना मुख्यदान है । इससे भी पाप कटते हैं ॥६॥ जहां प्रायश्चित्त का कोई समय नियत न किया हो वहां एक वर्ष छः मास, चारमास, तीनमास, दोमास, एकमास, चौबीशदिन, बारहदिन, छःदिन, तीनदिन, एकदिनरात, इन में से किसी एक नियत समय तक उक्त जप पाठादि प्रायश्चित्त करे ॥७॥ पापों के अधिक बड़े २ होनेपर अधिक दिनों तक और छोटे२ वा कम पापों में

५४ गौतमस्मृतिः ॥

लघुषु लघूनि कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्वप्रायश्चित्तं सर्वप्रायश्चित्तम् ॥ ८ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥

अथ चतुःषष्टिषु यातनास्थानेषु दुःखान्यनुभूय तत्रेमानि लक्षणानि, भवन्ति ब्रह्महार्द्रकुष्ठो, सुरापः श्यावदन्तो, गुरुतल्पगः पङ्गुः, स्वर्णहारी कुनखी, श्वित्री वस्त्रापहारी, दर्दुरो तेजोपहारी, मण्डली स्नेहापहारी क्षयी तथा, अजीर्णवान्नापहारी, ज्ञानापहारी मूकः, प्रतिहन्ता गुरोरपस्मारी, गोघ्नो जात्यन्धः, पिशुनः पूतिनासः, पूतिवक्त्रस्तु सूचकः, शूद्रोध्यापकःश्वपाकस्त्रपुसीसचामरविक्रयी, मद्यप एकशफविक्रयी, मृगव्याधः कुण्डाशी, भृतकश्चैलिको वा नक्षत्री चार्बुदी नास्तिको रङ्गोपजीव्यभक्ष्यभक्षो गगदरी ब्रह्मपरुषतस्कराणां

थोड़े दिनों तक प्रायश्चित्त करे। कृच्छ्र अतिकृच्छ्र और चान्द्रायण ये सब पापों के प्रायश्चित्त हैं ॥ ८ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उन्नीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥

अब नरक दुःख भोग के चौंसठ स्थानों में प्राणी दुःखों का अनुभव करके फिर मनुष्य योनि में जन्म लेता है उसके ये निम्न चिन्ह होते हैं। ब्रह्महत्या करनेवाला-गलित कुष्ठी होता, मद्यपानी के श्याम (काले) दांत होते, गुरुपत्नी गामी पङ्गु (लंगड़ा) होता, सुवर्ण का चोर-बिगड़े नखोंवाला होता, वस्त्र चुरानेवाला-श्वेत कुष्ठी, दीपकादि प्रकाश का चुरानेवाला-दादकारोगी, घी तैलादि चिकनाई चुरानेवाला-मण्डल (चखन्देयुक्त) कुष्ठी तथा क्षयी (तपेदिक्क) रोगवाला होता है। अन्न चुराने वाला अजीर्णरोगी, ज्ञान (विद्या) का चोर-गूंगा, बदले में गुरु को पीटनेवाला मृगीरोगयुक्त, गोहत्यारा-जन्मान्ध, चुगल पीनसरोगी वा दुर्गन्ध युक्त नासिकावाला, निन्दक-मुखमें दुर्गन्धवाला, शूद्र को वेद पढ़ानेवाला-चाण्डाल, रांगा शीशा और चंवर बेंचनेवाला-मद्यपानी, एक (जुड़े) खुरवाले पशुओं को बेंचने वाला-बहेलिया, कूंड़े में खानेवाला-वैतनिक नौकर (दास) वा धोबी, शास्त्र को जाने विना नक्षत्रों की खगोल विद्या का अभिमानी-अर्बुद (मांसपिण्डका) रोगी, नास्तिक

भाषार्थसंहिता ॥ ५५

देशिकः पिशितः षण्डो महापंथिको गण्डकश्चाण्डालीपुक्कसीगोष्ववकीर्णी मध्वामेही धर्म्मपत्नीषु स्यानन्मैथुनप्रवर्त्तकः खल्वाटसगोत्रसमयस्र्यभिगामी श्लीपदी पितृमातृभगिनीस्र्यभिगाम्यावीजितस्तेषां कुब्जकुण्ठमण्डलव्याधितव्यङ्गदरिद्राल्पायुषोऽल्पबुद्धयश्चण्डषण्डशैलूषतस्करपरपुरुषप्रेष्यपरकर्म्मकराः खल्वाटवक्राङ्गसंकीर्णाः क्रूरकर्म्माणःक्रमशश्चान्तयाञ्श्चोपपद्यन्ते तस्मात्कर्त्तव्यमेवेह प्रायश्चित्तं विशुद्धैर्लक्षणैर्जायन्ते धर्म्मस्य धारणादिति धर्म्मस्यधारणादिति॥१॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥

त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं वेदविप्लावकं भ्रूणहनं


रंगों द्वारा जीविका करने वाला, अभक्ष्य भक्षण कर्त्ता-गण्डमाला का रोगी, ब्रह्मद्रोही तथा चोरों का उपदेशक-संकुचित तथा नपुंसक, निन्दित मार्ग में चलने वाला-गण्डरोगी । चाण्डाली, पुक्कसी और गौ के साथ मैथुन करनेवाला मधु प्रमेह युक्त होता, धर्मपत्नी स्त्रियों में मैथुन की प्रवृत्ति करने वाला-खल्वाट ( गंजा ), अपने गोत्र की स्त्री से संग करने वाला-श्लीपर्दी ( हाथी पांव का ) रोगी, पिता की बहिन ( फूफी ) माता की बहिन ( मौसी ) से संग करने वाला अत्यल्पवीर्य युक्त होता है । प्रयोजन यह कि उक्त दुष्कर्मों के वैसे २ अनिष्ट फल जन्मान्तरों में प्राणियों को होते हैं । और ऐसे पापी लोग विशेष कर जन्मान्तरों में कुब्ज (कुबड़े) आलसी, मण्डल-कोढ़ी, नित्यरोगी, शत्रु के नौकर, वा दास खल्वाट ( गंजे, ) वक्राङ्ग ( टेढ़े अंगों वाले, ) सकुंचे क्रूर-कठोर निर्दयी-हिंसाकर्मोंवाले क्रम से होते हैं । और चमार चाण्डालादि नीचों में जन्म लेते हैं । इसलिये प्रायश्चित्त अवश्य ही करने चाहिये जिस से जन्मान्तरों में धर्म के धारण करने से शुद्ध चिन्हों से युक्त उत्तम पुण्यात्माओं में जन्म होता है ॥ १ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में वीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

पुत्र को चाहिये कि राजा का वध करने, शूद्र को यज्ञ कराने, वेद को डुबाने, व्यभिचार करके गर्भ पात करने, भील आदि नीचों के साथ सहवास करने और नीचों की स्त्रियों से संभोग करने वाले पिता को त्याग देवे । उस

५६ गौतमस्मृतिः ॥

यश्चान्त्यावसायिभिः सह संवसेदन्त्यावसायिन्या वा तस्य विद्यागुरून्द्योनिसंबन्धांश्च सन्निपात्य सर्वाण्युदकादीनि प्रेतकर्म्माणि कुर्युः पात्रं चास्य विपर्य्यस्येयुः ॥ १ ॥ दासः कर्मकरो वाऽवकरादमेध्यपात्रमानीय दासीघटात् पूरयित्वा दक्षिणाभिमुखः पदा विपर्य्यस्येदमुमनुदकं करोमीति नामग्राहं तं सर्वेऽन्वालभेरन् प्राचीनावीतिनो मुक्तशिखा विद्यागुरवो योनिसंबन्धाश्च वीक्षेरन्नप उपस्पृश्य ग्रामं प्रविशन्ति ॥२॥ अतऊर्ध्वं तेन संभाष्य तिष्ठेदेकरात्रं जपन्सावित्रीमज्ञानपूर्वं ज्ञानपूर्वं चेत्त्रिरात्रम्॥३॥यस्तु प्रायश्चित्तेन शुध्येत्तस्मिन् शुद्धे शातकुम्भमयं पात्रं पुण्यतमाद्ध्रदात् पूरयित्वा स्रवन्तीभ्यो वा ततएनमुपस्पर्शयेयुः ॥४॥ अथास्मै तत्पात्रं दद्युस्तत्सं-


पिता के विद्या गुरुओं और कुटुम्बियों को एकत्र करके जलदानादि प्रेतकर्म उस के लिये ( उस के जीवित रहते ही तिलाञ्जलि दे देवें ) करें तथा निम्नरीति से जलपात्र को फेंके ॥ १ ॥ कहार वा किसी शूद्र नौकर द्वारा घूरे पर से मट्टी का अशुद्ध पात्र मगाकर कहारिन के घड़े से उस में जल भर के अपसव्य हो दक्षिण को मुखकर (अमुम्-अनुदकं करोमि) इस मन्त्र के अमुं शब्द के स्थान में पिता का द्वितीयान्त नाम बोलता हुआ उस जल भरे घड़े को पग से मारके फेंक देवे, साथ ही विद्यागुरु और कुटुम्बी लोग चोटी की गांठ खोल कर अपसव्य हुए उस घड़े को फेंकते हुए पुत्र का पीछे देखते हुए हाथ से स्पर्श करें । पश्चात् जल का स्पर्श करके गांव को सब चले आवें ॥ २ ॥ इस कृत्य के पश्चात् बिना जाने जो कोई उस पतितके साथ संभाषण करे तो वह गायत्री का जप करता हुआ एक रातभर खड़ा रहे । यदि जान कर उस के साथ संभाषण करे तो तीन दिन गायत्री का जप करता हुआ प्रायश्चित्त करे ॥३॥ यदि राजा की हत्यादि करने वाला वह पतित प्रायश्चित्त करके शुद्ध हो जावे तो उस के शुद्ध हो जाने पर सुवर्ण के पात्र को किसी पवित्र कुण्ड वा बहती हुई नदियों से भर के विद्यागुरु और कुटुम्बी लोग उस प्रायश्चित्ती का अभिषेक करें ॥४॥ इस के बाद वह सुवर्ण का पात्र उस प्रायश्चित्ती को देदेवें । वह उस

भाषार्थसहिता ॥ ५७

प्रतिगृह्य जपेत् ओं-शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तं शिवमन्तरिक्षम्। यो रोचनस्तमिह गृण्हामीत्येतैर्यजुर्भिस्तरत्समन्दीभिः पावमानीभिः कूष्माण्डैश्चाज्यं जुहुयाद्धिरण्यं ब्राह्मणाय वा दद्याद् गामाचार्याय ॥५॥ यस्य च प्राणान्तिकं प्रायश्चित्तं स मृतः शुध्येत्तस्य सर्वाण्युदकादीनि प्रेतकर्माणि कुर्युरेतद्देव शान्त्युदकं सर्वेषूपपातकेषु सर्वेषूपपातकेषु ॥ ६ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकविंशोध्यायः ॥ २१ ॥

ब्रह्महसुरापगुरुतल्पगमातृपितृयोनिसंबन्धगस्तेननास्तिकनिन्दितकर्माभ्यासिपतितात्याग्यपतितत्यागिनः पतिताः पातकसंयोजकांश्च तैंश्चाब्दं समाचरन् ॥१॥ द्विजातिकर्मभ्यो हानिः पतनं परत्र चासिद्धिस्तामेके नरकं त्रीणि प्रथमा-


सुवर्णके पात्र को हाथ में लेकर (ओं शान्ताद्यौः०) इत्यादि मन्त्रका जप करे। तदनन्तर (तरन्तमन्दी०) सूक्त, पावमानी ऋचाओं, तथा कूष्माण्डसूक्तों से घृत का होम करे। अथवा सुपात्र ब्राह्मण को सुवर्ण का दान और गुरु को गौ दान देवे ॥ ५॥ जिस अपराधी का प्रायश्चित्त ऐसा हो कि जिस में उस का प्राणान्त हो जाय तो वह मर कर शुद्ध होता है। उस के तिलाञ्जलि आदि सब मृतक कर्म पुत्रादि कुटुम्बियों को शास्त्रानुकूल करने चाहिये यही सब उपपातकों में शान्ति का जल उस के लिये है ॥ ६ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में इक्कीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२१॥

ब्रह्महत्यारा, मद्यपीने वाला, गुरु पत्नी से व्यभिचार कर्त्ता, माता और पिता के कुल की स्त्रियों से गमन करने वाला, सुवर्ण का चोर, नास्तिक (वेदनिन्दक,) निन्दित (छलकपटादि ) कर्मों को जो बार २ करे, जो पतित को न त्यागे, जो पतित नहीं हुआ उसे त्याग देवे, जो निर्दोष को पातक लगावे, और जो एक वर्ष तक पतितों का संग करे ये सब पतित कहाते हैं ॥ १ ॥

• ब्राह्मणादि द्विज अपने २ कर्मों से हीन हो जायं अपने कर्मों के अधिकारी न रहें यही पतित होना कहाता है। इन की जन्मान्तर में सिद्धि नहीं होती। इसी असिद्धि को कोई आचार्य नरक होना कहते हैं । ब्रह्महत्या, सुरा (मद्य) पान, सुवर्ण की चोरी इन तीन महापातकों का प्रायश्चित्त नहीं है यह मनुजी की राय है। कोई आचार्य कहते हैं कि गुरुपत्नी को छोड़ के अन्य

५८ गौतमस्मृतिः ॥

न्यनिर्दैश्यानीति मनुर्न स्त्रीषु गुरुतल्पगः पततीत्येके भ्रूणहनि ॥२॥ हीनवर्णसेवायां च स्त्रीपतति कौटसाक्ष्यं राजगामि पैशुनं गुरोरनृताभिशंसनं महापातकसमानि, अपाङ्क्त्यानां प्राग्दुर्बलाद्गोघ्नब्रह्मोज्झतन्मन्त्रकृदवकीर्णिपतितसावित्रीकेषूपपातर्क याजनाध्यापनादृत्विगाचार्यों पतनीयसेवायां च हेयावन्यत्र हानात्पतति तस्य च प्रतिग्रहीतेत्येके न कर्हिचिन्मातापितृरोर्वृत्तिर्दायं तु न भजेरन् ब्राह्मणाभिशंसने दोषस्तावन् द्विरनेनसि दुर्बलहिंसायामपि मोचने शक्तश्चेत् ॥ ३ ॥

त्रियों से व्यभिचार करने पर मनुष्य पतित नहीं होता (अर्थात् गुरु पत्नी गमन की अपेक्षा कम-थोड़ा पाप लगता है परन्तु गुरुपत्नी गामी महापातकी होने से अवश्य पतित हो जाता है) परन्तु व्यभिचार के पश्चात् भ्रूण हत्या करे तो अवश्य ही पतित होता है ॥२॥ भ्रूण (गर्भ) हत्या करने और अपने से नीच वर्ण के पुरुष की सेवा (उस के साथ रहने संयोग) करने से स्त्री भी पतित होजाती है। जान कर झूठी गवाही, राजा से किसी का ऐसा झूठा अपराध कहना जिस से राजा उसे मरवाडाले, जानकर गुरु के साथ मिथ्या भाषण करना ये कर्म महापातकों के समान हैं। दुर्बल को छोड़ के जाति-पांति से बाहर किये हुओं में-गोहत्यारा, वेद का त्यागी, इन का भेली सलाही, ब्रह्मचर्य नियम में रहते समय व्यभिचार कर्त्ता, और संस्कार हीन व्रात्य ये सब मुख्य उपपातकी हैं। अनधिकारियों को यज्ञ कराने, पढ़ाने, और पतित होने योग्य किसी श्रीमान् की सेवा में रहने से ऋत्विज् और प्राचार्य्य (गुरु) त्यागने योग्य होते हैं। जो इन दोनों को न त्यागे वह भी पतित हो जाता है। पतित का दान लेने वाला भी पतित होता है यह किन्हीं आचार्यों का मत है। पुत्र ऐसा कभी न करे कि पतित हुए माता पिता को भोजन वस्त्र न दे किन्तु भोजन वस्त्र से उन की रक्षा तबभी करे परन्तु पतित माता पिता का धनादि पुत्र न लेवे। ब्राह्मण की निन्दा करने में भी जाति से पतित होने का दोष लगता है, यदि ब्राह्मण निर्दोष होतो उस की निन्दा में द्विगुण दोष लगता है। यदि क्षमा करने में समर्थ हो वा क्षमाका मौका (अवसर) होतो निर्बल दीन असमर्थ की हिंसा करने में भी दूना पाप लगता है। ॥ ३ ॥