भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५८ गौतमस्मृतिः ॥

न्यनिर्दैश्यानीति मनुर्न स्त्रीषु गुरुतल्पगः पततीत्येके भ्रूणहनि ॥२॥ हीनवर्णसेवायां च स्त्रीपतति कौटसाक्ष्यं राजगामि पैशुनं गुरोरनृताभिशंसनं महापातकसमानि, अपाङ्क्त्यानां प्राग्दुर्बलाद्गोघ्नब्रह्मोज्झतन्मन्त्रकृदवकीर्णिपतितसावित्रीकेषूपपातर्क याजनाध्यापनादृत्विगाचार्यों पतनीयसेवायां च हेयावन्यत्र हानात्पतति तस्य च प्रतिग्रहीतेत्येके न कर्हिचिन्मातापितृरोर्वृत्तिर्दायं तु न भजेरन् ब्राह्मणाभिशंसने दोषस्तावन् द्विरनेनसि दुर्बलहिंसायामपि मोचने शक्तश्चेत् ॥ ३ ॥

त्रियों से व्यभिचार करने पर मनुष्य पतित नहीं होता (अर्थात् गुरु पत्नी गमन की अपेक्षा कम-थोड़ा पाप लगता है परन्तु गुरुपत्नी गामी महापातकी होने से अवश्य पतित हो जाता है) परन्तु व्यभिचार के पश्चात् भ्रूण हत्या करे तो अवश्य ही पतित होता है ॥२॥ भ्रूण (गर्भ) हत्या करने और अपने से नीच वर्ण के पुरुष की सेवा (उस के साथ रहने संयोग) करने से स्त्री भी पतित होजाती है। जान कर झूठी गवाही, राजा से किसी का ऐसा झूठा अपराध कहना जिस से राजा उसे मरवाडाले, जानकर गुरु के साथ मिथ्या भाषण करना ये कर्म महापातकों के समान हैं। दुर्बल को छोड़ के जाति-पांति से बाहर किये हुओं में-गोहत्यारा, वेद का त्यागी, इन का भेली सलाही, ब्रह्मचर्य नियम में रहते समय व्यभिचार कर्त्ता, और संस्कार हीन व्रात्य ये सब मुख्य उपपातकी हैं। अनधिकारियों को यज्ञ कराने, पढ़ाने, और पतित होने योग्य किसी श्रीमान् की सेवा में रहने से ऋत्विज् और प्राचार्य्य (गुरु) त्यागने योग्य होते हैं। जो इन दोनों को न त्यागे वह भी पतित हो जाता है। पतित का दान लेने वाला भी पतित होता है यह किन्हीं आचार्यों का मत है। पुत्र ऐसा कभी न करे कि पतित हुए माता पिता को भोजन वस्त्र न दे किन्तु भोजन वस्त्र से उन की रक्षा तबभी करे परन्तु पतित माता पिता का धनादि पुत्र न लेवे। ब्राह्मण की निन्दा करने में भी जाति से पतित होने का दोष लगता है, यदि ब्राह्मण निर्दोष होतो उस की निन्दा में द्विगुण दोष लगता है। यदि क्षमा करने में समर्थ हो वा क्षमाका मौका (अवसर) होतो निर्बल दीन असमर्थ की हिंसा करने में भी दूना पाप लगता है। ॥ ३ ॥