भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ५९

अभिक्रुद्धावगोरणं ब्राह्मणस्य वर्षशतमस्वर्ग्यं निघाते सहस्रं लोहितदर्शने यावतस्तत्प्रस्कन्द्य पांसून् संगृह्णीयात्सङ्गृह्णीयात्४ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वाविंशोध्यायः ॥ २२ ॥ प्रायश्चित्तमग्नौ सक्तिर्ब्रह्मघ्नस्त्रिरवच्छादि तस्य लक्ष्यं वा स्याज्जन्ये शस्त्रभृताम् ॥१॥ खट्वाङ्गकपालपाणिर्वा द्वादशसंवत्सरान् ब्रह्मचारी भैक्षाय ग्रामं प्रविशेत् स्वकर्माचक्षाणः पथोऽपक्रामेत्सन्दर्शनादार्यस्य स्थानासनाभ्यां विहरन् सवनेषूदकोपस्पर्शी शुध्येत्, प्राणलाभे वा तन्निमित्ते ब्राह्मणस्य द्रव्यापचये वा त्र्यवरं प्रतिरोधोऽश्वमेधावभृथे वान्ययज्ञे-


क्रोध करके ब्राह्मण पर गुरावे तो १०० वर्ष, ब्राह्मण को पीटे तो १००० वर्ष और यदि ऐसा मारे जिस में खून गिरने लगे तो मही के जितने परमाणु ब्राह्मण के रुधिर से भीगें उतने ही वर्षों तक उस पापी को नरक भोगना पड़ता है ॥ ४ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में बाईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥

अब ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त कहते हैं । १-अपनी इच्छा से आंखें बन्द कर नीचे को शिर कर २ के अत्यन्त प्रज्वलित अग्नि में तीनवार गिर २ कर जल जावे । २-विद्वान् ब्राह्मण के हाथ में धनुषबाण वा बन्दूक देकर सहर्ष उन के हाथ से अनेक मनुष्यों के सामने गोली खाकर मर जावे ॥१॥ अथवा ३-एक खटिया का पांव ( मचवा ) और मनुष्य की खोपड़ी हाथ में लेकर बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी रहता हुआ वन में वा एकान्त जंगल में कुटी बनाकर निवास करे । भिक्षा मांगने के लिये एक बार नित्य अपने पाप को कहता हुआ गांव में जाया करे । भिक्षा के लिये जाते आते समय रास्ता में कोई द्विज मिले तो मार्ग से हट जावे । अपने स्थान और आसन के इधर उधर भ्रमण करे कहीं अन्यत्र न जावे । सायं, प्रातः और मध्याह्न काल में तीनो बार स्नान करे इस प्रकार बारह वर्ष के प्रायश्चित्त से शुद्ध होता है । ४-अथवा ब्रह्महत्या करने वाला किसी ब्राह्मण को मृत्यु से बचावे । ५-यदि किसी ब्राह्मण के धन को चोर ले जाते हों तो सच्चे मन से तीनवार चोरों से धन छीन लेने की चेष्टा करे यदि न भी छीन पावे तो भी शुद्ध हो जाता है ६-राजा के अश्वमेध वा अन्य यज्ञ समाप्ति के अवभृथ स्नान के समय राजा तथा विद्वानों