अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 629, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ५७
प्रतिगृह्य जपेत् ओं-शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तं शिवमन्तरिक्षम्। यो रोचनस्तमिह गृण्हामीत्येतैर्यजुर्भिस्तरत्समन्दीभिः पावमानीभिः कूष्माण्डैश्चाज्यं जुहुयाद्धिरण्यं ब्राह्मणाय वा दद्याद् गामाचार्याय ॥५॥ यस्य च प्राणान्तिकं प्रायश्चित्तं स मृतः शुध्येत्तस्य सर्वाण्युदकादीनि प्रेतकर्माणि कुर्युरेतद्देव शान्त्युदकं सर्वेषूपपातकेषु सर्वेषूपपातकेषु ॥ ६ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकविंशोध्यायः ॥ २१ ॥
ब्रह्महसुरापगुरुतल्पगमातृपितृयोनिसंबन्धगस्तेननास्तिकनिन्दितकर्माभ्यासिपतितात्याग्यपतितत्यागिनः पतिताः पातकसंयोजकांश्च तैंश्चाब्दं समाचरन् ॥१॥ द्विजातिकर्मभ्यो हानिः पतनं परत्र चासिद्धिस्तामेके नरकं त्रीणि प्रथमा-
सुवर्णके पात्र को हाथ में लेकर (ओं शान्ताद्यौः०) इत्यादि मन्त्रका जप करे। तदनन्तर (तरन्तमन्दी०) सूक्त, पावमानी ऋचाओं, तथा कूष्माण्डसूक्तों से घृत का होम करे। अथवा सुपात्र ब्राह्मण को सुवर्ण का दान और गुरु को गौ दान देवे ॥ ५॥ जिस अपराधी का प्रायश्चित्त ऐसा हो कि जिस में उस का प्राणान्त हो जाय तो वह मर कर शुद्ध होता है। उस के तिलाञ्जलि आदि सब मृतक कर्म पुत्रादि कुटुम्बियों को शास्त्रानुकूल करने चाहिये यही सब उपपातकों में शान्ति का जल उस के लिये है ॥ ६ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में इक्कीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२१॥
ब्रह्महत्यारा, मद्यपीने वाला, गुरु पत्नी से व्यभिचार कर्त्ता, माता और पिता के कुल की स्त्रियों से गमन करने वाला, सुवर्ण का चोर, नास्तिक (वेदनिन्दक,) निन्दित (छलकपटादि ) कर्मों को जो बार २ करे, जो पतित को न त्यागे, जो पतित नहीं हुआ उसे त्याग देवे, जो निर्दोष को पातक लगावे, और जो एक वर्ष तक पतितों का संग करे ये सब पतित कहाते हैं ॥ १ ॥
• ब्राह्मणादि द्विज अपने २ कर्मों से हीन हो जायं अपने कर्मों के अधिकारी न रहें यही पतित होना कहाता है। इन की जन्मान्तर में सिद्धि नहीं होती। इसी असिद्धि को कोई आचार्य नरक होना कहते हैं । ब्रह्महत्या, सुरा (मद्य) पान, सुवर्ण की चोरी इन तीन महापातकों का प्रायश्चित्त नहीं है यह मनुजी की राय है। कोई आचार्य कहते हैं कि गुरुपत्नी को छोड़ के अन्य