भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५६ गौतमस्मृतिः ॥

यश्चान्त्यावसायिभिः सह संवसेदन्त्यावसायिन्या वा तस्य विद्यागुरून्द्योनिसंबन्धांश्च सन्निपात्य सर्वाण्युदकादीनि प्रेतकर्म्माणि कुर्युः पात्रं चास्य विपर्य्यस्येयुः ॥ १ ॥ दासः कर्मकरो वाऽवकरादमेध्यपात्रमानीय दासीघटात् पूरयित्वा दक्षिणाभिमुखः पदा विपर्य्यस्येदमुमनुदकं करोमीति नामग्राहं तं सर्वेऽन्वालभेरन् प्राचीनावीतिनो मुक्तशिखा विद्यागुरवो योनिसंबन्धाश्च वीक्षेरन्नप उपस्पृश्य ग्रामं प्रविशन्ति ॥२॥ अतऊर्ध्वं तेन संभाष्य तिष्ठेदेकरात्रं जपन्सावित्रीमज्ञानपूर्वं ज्ञानपूर्वं चेत्त्रिरात्रम्॥३॥यस्तु प्रायश्चित्तेन शुध्येत्तस्मिन् शुद्धे शातकुम्भमयं पात्रं पुण्यतमाद्ध्रदात् पूरयित्वा स्रवन्तीभ्यो वा ततएनमुपस्पर्शयेयुः ॥४॥ अथास्मै तत्पात्रं दद्युस्तत्सं-


पिता के विद्या गुरुओं और कुटुम्बियों को एकत्र करके जलदानादि प्रेतकर्म उस के लिये ( उस के जीवित रहते ही तिलाञ्जलि दे देवें ) करें तथा निम्नरीति से जलपात्र को फेंके ॥ १ ॥ कहार वा किसी शूद्र नौकर द्वारा घूरे पर से मट्टी का अशुद्ध पात्र मगाकर कहारिन के घड़े से उस में जल भर के अपसव्य हो दक्षिण को मुखकर (अमुम्-अनुदकं करोमि) इस मन्त्र के अमुं शब्द के स्थान में पिता का द्वितीयान्त नाम बोलता हुआ उस जल भरे घड़े को पग से मारके फेंक देवे, साथ ही विद्यागुरु और कुटुम्बी लोग चोटी की गांठ खोल कर अपसव्य हुए उस घड़े को फेंकते हुए पुत्र का पीछे देखते हुए हाथ से स्पर्श करें । पश्चात् जल का स्पर्श करके गांव को सब चले आवें ॥ २ ॥ इस कृत्य के पश्चात् बिना जाने जो कोई उस पतितके साथ संभाषण करे तो वह गायत्री का जप करता हुआ एक रातभर खड़ा रहे । यदि जान कर उस के साथ संभाषण करे तो तीन दिन गायत्री का जप करता हुआ प्रायश्चित्त करे ॥३॥ यदि राजा की हत्यादि करने वाला वह पतित प्रायश्चित्त करके शुद्ध हो जावे तो उस के शुद्ध हो जाने पर सुवर्ण के पात्र को किसी पवित्र कुण्ड वा बहती हुई नदियों से भर के विद्यागुरु और कुटुम्बी लोग उस प्रायश्चित्ती का अभिषेक करें ॥४॥ इस के बाद वह सुवर्ण का पात्र उस प्रायश्चित्ती को देदेवें । वह उस

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