अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 627, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ ५५
देशिकः पिशितः षण्डो महापंथिको गण्डकश्चाण्डालीपुक्कसीगोष्ववकीर्णी मध्वामेही धर्म्मपत्नीषु स्यानन्मैथुनप्रवर्त्तकः खल्वाटसगोत्रसमयस्र्यभिगामी श्लीपदी पितृमातृभगिनीस्र्यभिगाम्यावीजितस्तेषां कुब्जकुण्ठमण्डलव्याधितव्यङ्गदरिद्राल्पायुषोऽल्पबुद्धयश्चण्डषण्डशैलूषतस्करपरपुरुषप्रेष्यपरकर्म्मकराः खल्वाटवक्राङ्गसंकीर्णाः क्रूरकर्म्माणःक्रमशश्चान्तयाञ्श्चोपपद्यन्ते तस्मात्कर्त्तव्यमेवेह प्रायश्चित्तं विशुद्धैर्लक्षणैर्जायन्ते धर्म्मस्य धारणादिति धर्म्मस्यधारणादिति॥१॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥
त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं वेदविप्लावकं भ्रूणहनं
रंगों द्वारा जीविका करने वाला, अभक्ष्य भक्षण कर्त्ता-गण्डमाला का रोगी, ब्रह्मद्रोही तथा चोरों का उपदेशक-संकुचित तथा नपुंसक, निन्दित मार्ग में चलने वाला-गण्डरोगी । चाण्डाली, पुक्कसी और गौ के साथ मैथुन करनेवाला मधु प्रमेह युक्त होता, धर्मपत्नी स्त्रियों में मैथुन की प्रवृत्ति करने वाला-खल्वाट ( गंजा ), अपने गोत्र की स्त्री से संग करने वाला-श्लीपर्दी ( हाथी पांव का ) रोगी, पिता की बहिन ( फूफी ) माता की बहिन ( मौसी ) से संग करने वाला अत्यल्पवीर्य युक्त होता है । प्रयोजन यह कि उक्त दुष्कर्मों के वैसे २ अनिष्ट फल जन्मान्तरों में प्राणियों को होते हैं । और ऐसे पापी लोग विशेष कर जन्मान्तरों में कुब्ज (कुबड़े) आलसी, मण्डल-कोढ़ी, नित्यरोगी, शत्रु के नौकर, वा दास खल्वाट ( गंजे, ) वक्राङ्ग ( टेढ़े अंगों वाले, ) सकुंचे क्रूर-कठोर निर्दयी-हिंसाकर्मोंवाले क्रम से होते हैं । और चमार चाण्डालादि नीचों में जन्म लेते हैं । इसलिये प्रायश्चित्त अवश्य ही करने चाहिये जिस से जन्मान्तरों में धर्म के धारण करने से शुद्ध चिन्हों से युक्त उत्तम पुण्यात्माओं में जन्म होता है ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में वीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
पुत्र को चाहिये कि राजा का वध करने, शूद्र को यज्ञ कराने, वेद को डुबाने, व्यभिचार करके गर्भ पात करने, भील आदि नीचों के साथ सहवास करने और नीचों की स्त्रियों से संभोग करने वाले पिता को त्याग देवे । उस
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