अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ गौतमस्मृतिः ॥
लघुषु लघूनि कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्वप्रायश्चित्तं सर्वप्रायश्चित्तम् ॥ ८ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥
अथ चतुःषष्टिषु यातनास्थानेषु दुःखान्यनुभूय तत्रेमानि लक्षणानि, भवन्ति ब्रह्महार्द्रकुष्ठो, सुरापः श्यावदन्तो, गुरुतल्पगः पङ्गुः, स्वर्णहारी कुनखी, श्वित्री वस्त्रापहारी, दर्दुरो तेजोपहारी, मण्डली स्नेहापहारी क्षयी तथा, अजीर्णवान्नापहारी, ज्ञानापहारी मूकः, प्रतिहन्ता गुरोरपस्मारी, गोघ्नो जात्यन्धः, पिशुनः पूतिनासः, पूतिवक्त्रस्तु सूचकः, शूद्रोध्यापकःश्वपाकस्त्रपुसीसचामरविक्रयी, मद्यप एकशफविक्रयी, मृगव्याधः कुण्डाशी, भृतकश्चैलिको वा नक्षत्री चार्बुदी नास्तिको रङ्गोपजीव्यभक्ष्यभक्षो गगदरी ब्रह्मपरुषतस्कराणां
थोड़े दिनों तक प्रायश्चित्त करे। कृच्छ्र अतिकृच्छ्र और चान्द्रायण ये सब पापों के प्रायश्चित्त हैं ॥ ८ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उन्नीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
अब नरक दुःख भोग के चौंसठ स्थानों में प्राणी दुःखों का अनुभव करके फिर मनुष्य योनि में जन्म लेता है उसके ये निम्न चिन्ह होते हैं। ब्रह्महत्या करनेवाला-गलित कुष्ठी होता, मद्यपानी के श्याम (काले) दांत होते, गुरुपत्नी गामी पङ्गु (लंगड़ा) होता, सुवर्ण का चोर-बिगड़े नखोंवाला होता, वस्त्र चुरानेवाला-श्वेत कुष्ठी, दीपकादि प्रकाश का चुरानेवाला-दादकारोगी, घी तैलादि चिकनाई चुरानेवाला-मण्डल (चखन्देयुक्त) कुष्ठी तथा क्षयी (तपेदिक्क) रोगवाला होता है। अन्न चुराने वाला अजीर्णरोगी, ज्ञान (विद्या) का चोर-गूंगा, बदले में गुरु को पीटनेवाला मृगीरोगयुक्त, गोहत्यारा-जन्मान्ध, चुगल पीनसरोगी वा दुर्गन्ध युक्त नासिकावाला, निन्दक-मुखमें दुर्गन्धवाला, शूद्र को वेद पढ़ानेवाला-चाण्डाल, रांगा शीशा और चंवर बेंचनेवाला-मद्यपानी, एक (जुड़े) खुरवाले पशुओं को बेंचने वाला-बहेलिया, कूंड़े में खानेवाला-वैतनिक नौकर (दास) वा धोबी, शास्त्र को जाने विना नक्षत्रों की खगोल विद्या का अभिमानी-अर्बुद (मांसपिण्डका) रोगी, नास्तिक