अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 621, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ४९
प्रश्येना जलजा रक्तपादतुण्डा ग्राम्यकुक्कुटसूकरौ धेन्वन- डुहौ चापन्नदावसन्नवृथामांसानि किसलयक्याकुलसूननिर्याास- लोहिताव्रश्चनाःश्वनिहतदारुवकबलाकाद्रुद्रुटिट्टिभमान्धातृ नक्तंचरा अभक्ष्याः ॥१॥ नभक्ष्याः प्रतुदा विकिरा जालपादा मत्स्याश्चाविकृतावध्याश्च धर्मार्थेऽव्यालहता दृष्टदोषवाक्- प्रशस्तान्यभ्युक्ष्यौपयुञ्जीतोपयुञ्जीत ॥ २ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥
अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री नातिचरेद्भर्त्तारं वाक्चक्षुःकर्म्मसंय- ताऽपमिरपत्यलिप्सुर्देवराद्गुरुप्रसूतान्नर्त्तुमृतीयात्पिण्डगोत्र-
जल में पैदा हुए मछली आदि, जिनके पंजे वा चोंच लाल हों, गांव का मुरगा, गांव का सूअर, गौ, बैल, स्वयं मरे, वनके अग्नि से जलके मरे। इन सब पशुनक्षादि का मांस नहीं खाना चाहिये। यज्ञादि को छोड़ केवल खाने के लोभ से प्राप्त किया मांस भी अभक्ष्य है। पत्तों का रसादि, स्वयं सादें का मांस, वृक्षों का लाल गोंद, गोदमे से निकला गोंद, कुत्ते ने मारी शिकार, कठफोरवा (दारुवक), बगला, रोगीजीव, टिटुहिया, मान्धाता-पक्षी, और रात्रि में विचरने वाले चमगीदड़ आदि ये सब अभक्ष्य हैं ॥ १॥ जो चोंच से मार २ के जीवों को खाते, नखों से बिखेर २ के जो खाते, जिन के पग जाल के तुल्य हैं और सब मछलियां भी अभक्ष्य हैं। जिसके शरीर में विकार हो और जो अवध्य हैं उन का भी मांस न खावे। यज्ञादि धर्म के लिये जो पशुपक्षी विधिपूर्वक मारे गये हों, जिन को सांप ने न काटा हो, जिन में शास्त्र से वा प्रत्यक्ष से कोई दोष न देखा गया हो और वाणी से जो प्रशस्त हों ऐसे जीवों के मांस को देवता तथा पितरों का पूजन समर्पण करके उपयोग में लावे ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
धर्मविषय में स्त्री स्वतन्त्र नहीं है, वाणी, चक्षु, और हाथ पांव की चेष्टा को वशीभूत नियम बद्ध रखती हुई पति की आज्ञाका उल्लंघन न करे। पति के अभाव में सन्तान को चाहती हो तो देवर, गुरुपुत्र वा पिण्ड गोत्र ऋषि जिन के एक ही हों ऐसे पति के कुल के कोई पुरुष अथवा पति के कुल के किसी पुरुष से ऋतुकाल में वीर्यदान लेकर सन्तान उत्पन्न कर लेवे। कोई