भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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५०गौतमस्मृतिः ॥

ऋषिसंबन्धिभ्यो योनिमात्रान्द्वा, नादेवरादित्येके, नातिद्वितीयं, जनयितुरपत्यं समयादन्यत्र जीवतश्च क्षेत्रे परस्मात्तस्य द्वयोर्वा रक्षणाद्भर्तुरेव नष्टे भर्तरि षाड्‌वार्षिकं क्षपणं श्रूयमाणेऽभिगमनं प्रव्रजिते तु निवृत्तिः प्रसङ्गात्तत्स्य द्वादशवर्षाणि ब्राह्मणस्य विद्यासंबन्धभ्रातरि चैवं ज्यायसि यवीयान्कन्याग्न्युपयमनेषु षडित्येके त्रीन्कुमार्यृतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलङ्कारान् प्रदानं प्रागृतोरप्रयच्छन् दोषी प्राग्वाससः प्रतिपत्तेरित्येके द्रव्या-

आचार्य कहते हैं कि देवर से भिन्न पुरुष के साथ नियोग न करे। पति से अन्य दूसरे नियुक्त का उल्लंघन करके किसी तीसरे से स्त्री संग न करे। नियोग के नियत समय से भिन्न काल में नियुक्त के साथ स्त्री संग करे तो वह सन्तान उत्पादक नियुक्त पुरुष का होगा। और पति के जीवित रहते ही यदि अन्य किसी पुरुष से सन्तान उत्पन्न हो तो वह सन्तान उस उत्पादक का वा दोनों का माना जायगा (अर्थात् बीज के स्वत्व से उत्पादक का और क्षेत्र के स्वत्व से क्षेत्र वाले का होगा) यदि स्त्री का पति उस की रक्षा भी करे तो उसी का सन्तान होगा। किसी स्त्री का पति कहीं विदेश में चला जाय और पता न हो कि कहां गया तो छः वर्ष तक उस की बाट देखे कालक्षेप करे। यदि सुन पड़े कि अमुक ग्राम वा नगर में है तो पति के समीप स्त्री चली-जावे। यदि वह पति संन्यासी हो गया हो तो फिर उस के पास न जावे। योनि सम्बन्धी वा विद्या सम्बन्धी बड़े भाई ब्राह्मण के कहीं अज्ञात निकल जाने पर छोटा भाई कन्या के स्वीकार, अग्नि स्थापन और विवाह करने के लिये बारह वर्ष तक वा किन्हीं आचार्यों के मत से छः वर्ष तक बाट देखे। यदि ऋतुमती होने से पहिले पिता वा पितृस्थानी चाचा भ्रातादि कन्या का विवाह न करदें तो तीन बार ऋतुमती होने पश्चात् पिता के दिये आभूषणों का त्याग करके स्वयं किसी अनिन्दित सत्पात्र वर के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेवे । ऋतुमती होने से पहिले विवाह न करे तो पितादि को पाप दोष लगता है। और कोई आचार्य कहते हैं कि वस्त्र में दाग लगने से पहिले ही विवाह न करने पर पाप लगता है। कन्या का विवाह करने के