अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 623, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ५१
दानं विवाहसिद्ध्यर्थं धर्म्मतन्त्रप्रसंगे च शूद्रादन्यत्रापि शू- द्राद् बहुपशोर्हीनकर्म्मणः शतगोरनाहिताग्नेः सहस्रगोर्वा सो- मपात् सप्तमीं चाभुक्त्वाऽनिचयायाप्यहीनकर्मभ्य आचक्षी- त राज्ञा पृष्टस्तेन हि भर्त्तव्यः श्रुतशीलसंपन्नश्चेद्धर्म्मतन्त्रपी- डायां तस्याकरणेऽदोषोऽदोषः ॥१॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ द्वितीयः प्रपाठकश्च पूर्णः ॥ उक्तो वर्णधर्म्मश्चाश्रमधर्म्मश्चाथ खल्वयं पुरुषो येनक- र्म्मणा लिप्यते यथैतदयाज्ययाजनमभक्ष्यभक्षणमवद्यवदनं
लिये वा दान पुण्यादि धर्मकार्यों के निमित्त शूद्र से भी धन ले लेवे । तथा अन्य कामों में भी बहुत पशुओंवाले शूद्र से वा सैकड़ों गौओं वाले धर्म कर्म हीन अनाहिताग्नि ( जिसने विधिपूर्वक अग्नि स्थापन करके अग्निहोत्र नहीं लिया ऐसे ) द्विज से वा सात पीढी से जिसके घर में अग्निष्टोमादि सोमयाग होते आये हों ऐसे द्विज से धन लेलेवे । और स्वयं न खावे न जोड़कर पास रक्खे, किन्तु तत्काल किसी धर्म के काम में लगा देवे तो ऐसे काम के लिये धर्म कर्महीन नीच पुरुषों से भी धनादि लेलेवे । यदि विद्वान् गृहस्थ से राजा पूछे तो धर्मादि जिस काम के लिये जितना धनादि अपेक्षित हो सो ठीक २ कह देवे । राजा को उचित है कि गृहस्थ ब्राह्मण वेदवेत्ता तथा सीधा सच्चा स्वभाववाला हो तो उसका भरण पोषण अवश्य करे । यदि धर्मसम्बन्धी कि- सी काम के करने में शरीर को अत्यन्त कष्ट पहुंचना सम्भव हो तो उसके न करने में दोष नहीं लगेगा ॥१॥ इस१८ वें अध्याय में जो नियोग का विषय है सो यह नियोग राजा वेन का चलाया है । उसके बाद में ऋषियों तथा आचा- यों ने जो२ धर्मशास्त्र प्रकाशित वा प्रवृत्त किये उनसब में राजा के अनुरोध से नियोग लिखा गया है । इन सब बीशो२० धर्मशास्त्रों में मानव धर्मशास्त्र मुख्य वा श्रेष्ठ है । जब उसमें इस वेन राजप्रचारित नियोग का खण्डन किया गया तो सभी धर्मशास्त्रों में वही खण्डन काफी है ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठाह्रवां अध्याय पूरा हुआ ॥१८॥ वर्णों और आश्रमों का धर्म कहा गया । अब यह विचार किया जाता है कि यह ब्राह्मणादि मनुष्य जिस २ कर्म से लिप्त नाम पापी अपराधी होता है जैसे कि जिसको यज्ञादि का अधिकार नहीं उस शूद्रादि को यज्ञ कराना, अभक्ष्य का भक्षण, न कहने योग्य मिथ्या भाषणादि करना,