अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ गौतमस्मृतिः ॥
शिष्टस्याक्रिया प्रतिषिद्धसेवनमिति, तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति, मीमांसन्ते न कुर्यादित्याहुर्नहि कर्म क्षीयत इति । कुर्यादित्यपरे पुनस्तोमेनेष्ट्वापुनःसवनमायान्तीति विज्ञायते व्रात्यस्तोमेनेष्ट्वा तरति सर्वं पाप्मानं, तरति ब्रह्महत्यां योऽश्व- मेधेन यजतेऽग्निष्टुताभिशस्यमानं, याजयेदिति च ॥१॥ तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानमुपनिषदो वे- दान्ताःसर्व्वच्छन्दःसु संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजनरौहिणे सामनी बृहद्रथन्तरे पुरुषगतिर्महा- नाम्न्यो महावैराजं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमद्
शास्त्र में कहे सन्ध्यादि कर्म न करना, और निषिद्ध हिंसादि को करना इत्या- दि के लिये प्रायश्चित्त करे वा न करे ऐसी मीमांसा नाम सन्देह करते हैं । इसमें पूर्वपक्षी कहते हैं कि प्रायश्चित्त न करे क्योंकि किया हुआ कर्म अपना फ- ल दिये बिना क्षीण ( नष्ट ) नहीं होता । इसीपर यह जनश्रुति चली है कि- ( अवश्यमेवभोक्तव्यं कृतंकर्मशुभाशुभम् । ) परन्तु उत्तर पक्ष के ऋषि तथा आचार्य कहते हैं कि प्रायश्चित्त अवश्य करे। क्योंकि श्रुति में लिखा है कि स्तोम यज्ञ करके फिर सोमपागादि का अधिकारी हो जाता है । व्रात्यस्तोम यज्ञ करके सब पापों से पार हो जाता है और जो अश्वमेध यज्ञ करता है वह ब्रह्महत्या के महापातक से भी मुक्त हो जाता है । और चोरी व्यभिचार आ- दि से दूषित निन्दित द्विज को अग्निष्टुत् यज्ञ करावे ॥ १ ॥ उन यज्ञों के करने की सामर्थ्य सर्वसाधारण लोगों को नहीं हो सकती इसलिये यज्ञादि के प्र- त्याम्नाय नाम प्रतिनिधि प्रायश्चित्तरूप शुभ कर्त्तव्य ये हैं कि-जप, तप, होम, उप- वास, दानकरना, इनका आगे क्रम से विशेष व्याख्यान करते हैं। उपनिषदरूप वे- दान्त ग्रन्थों का पाठ करना, गायत्र्यादि सब छन्दों में वेद संहिताओं का श्रद्धाभक्ति से अभ्यास,मधुमती (मधुवाता०) इत्यादि तीन ऋचा,अघमर्षणसूक्त, अथर्वशीर्ष,रुद्राध्याय,पुरुष सूक्त,राजन और रौहिण दोनों साम,बृहद्रथन्तरसाम, पुरुषगति, महानाम्नीऋचा, महावैराज, महादिवाकीर्त्य, ज्येष्ठ सामों में से कोई एक साम, बहिष्पवमान सूक्त, कूष्माण्डसूक्त,पवमानसूक्त, इनमें से किसी