अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 619, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ४७
नगरे मानसम्प्यशुचि श्राद्धिनामाकालिकमकृतान्नश्राद्धिकसं योगेऽपि प्रतिविद्यं च यावत्स्मरन्ति यावत्स्मरन्ति ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ प्रशस्तानां स्वकर्मसु द्विजातीनां ब्राह्मणो भुञ्जीत, प्रति- गृह्णीयाच्चैधोदकयवसमूलफलमध्वभयाभ्युद्यतशय्यासनावस- थयानपयोदधिधानासफरिप्रियङ्गुस्रङ्मार्गशाकान्यप्रणोद्या- नि सर्वेषां पितृदेवगुरुभृत्यभरणे चान्यवृत्तिश्चेन्नान्तरेण शूद्रान्,पशुपालक्षेत्रकर्षककुलसंगतकारपितृपरिचारका भोज्या न्ना वणिक् चाशिल्पी,नित्यमभोज्यं केशकीटावपन्नं रजस्व- लाकृष्णशकुनिपदोपहतं भ्रूणघ्नावेक्षितं गवोपघातं भावदुष्टं
करे । गांव वा नगर में, तथा मनमेंग्लानि होने पर नित्य ही अनध्याय करे । श्राद्ध करनेवाला एक दिन रात वेद न पढ़े । यदि श्राद्ध सम्बन्धी कच्चा अन्न सीधा लेवे तो भी वेद का अनध्याय करे। प्रत्येक वेद में जितना२ कहा हो उ- तना अनध्याय माने ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ॥१६॥
ब्राह्मण पुरुष उन द्विजातियों के घरपर भोजन करे जो अपने२ शास्त्रोक्तकर्मों में प्रशंसा पाये हों। और ईंधन, जल, भूसा, मूल, फल' शहद, अभय, नये बने हुए तयार-खटिया, आसन, घर' सवारी, ( रथादि ) दूध, दही, भुनेजौ, मछली, ककुनी' माला, मार्ग, और हरे शाक इन पदार्थों को जो कोई प्रीति श्रद्धा से देवे तो पितर, देव और गुरुकी पूजार्थ तथा स्त्री पुत्रादि की रक्षार्थ सब के ले लेवे निषेध न करे। यदि अध्यापनादि द्वारा अन्य जीविका निर्वाह के लिये हो तो शूद्रों को छोड़कर अतिशूद्रादि से न लेवे। गोपाल, किसान, कुलका संगी, पिता का सेवक और जो कारीगरी को छोड़ के अन्य प्रकार की दुकान करता हो ऐसे शूद्रों का भी कच्चा अन्न ब्राह्मण को भक्ष्य है। जिस पकाये भोजन में बाल वा कीड़े गिर गये हों, रजस्वला स्त्री ने छू लिया हो, काले पक्षी के पग जिसमें लग गये हों, भ्रूण ( गर्भ ) हत्या करने वाले ने जिसे देखा हो, गौ वा बैलने सूंघा हो, जिसको किसी ने दूषित कहा हो वा जिस के दूषित होने में शंका हो गयी हो, जो दही को छोड़ के धरा रहने से ख-
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