अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६ | गौतमस्मृतिः ॥
स्तनयित्नुवर्षविद्युतः प्रादुष्कृताग्निष्वनृतौ विद्युति नक्तं चापररात्रात्त्रिभागादिप्रवृत्तौ सर्वमुल्काविद्युत्सममित्येकेषाम् ॥ १ ॥ स्तनयित्नुरपराह्णेऽपि प्रदोषे सर्वं नक्तमर्द्धरात्रादहश्चेत्सज्योतिर्विषयस्थे च राज्ञि प्रेते विप्रोष्य चान्योन्येन सह संकुलोपाहितवेदसमाप्तिच्छर्द्दि श्राद्धमनुष्ययज्ञभोजनेष्वहोरात्रममावास्यायां च द्व्यहं वा कार्त्तिकी फाल्गुन्याषाढी पौर्णमासी तिस्रोऽष्टकास्त्रिरात्रमन्यामेके अभितो वार्षिकं सर्व्वैर्वर्षविद्युत्स्तनयित्नुसन्निपाते प्रस्पन्दिन्यूर्ध्वं भोजनादुत्सवे प्राधीतस्य च निशायां चतुर्मुहूर्तं नित्यमेके
की ध्वनि में ऋग्वेद यजुर्वेद को न पढ़े। जब आकाश में अकस्मात् उत्पात का शब्द हो, भूकम्प हो, जब राहु का उपद्रव दीखे, जब बड़ा उल्कापात हो, सन्ध्याओं में वा वर्षा से भिन्न काल में बादल गर्जे-मेघ वर्षे-बिजुली चमके वा रात में विद्युत् गिरे तब एक दिन रात वेद का अनध्याय करे। आधी-रात से लेके रात के तीसरे प्रहर में वेद को न पढ़े। किन्हीं आचार्यों का मत है कि उल्कापात और विद्युत् का भयंकर शब्द होने पर सभी समय अर्थात् वर्षा में भी वेद का अनध्याय करे ॥ १ ॥ यदि अपराह्न (दोपहर बाद) में वा सन्ध्या के समय बादल गर्जे तो रात्रि भर वेद न पढ़े। यदि दो पहर से पहिले गर्जे तो सन्ध्या तक न पढ़े। जिस राजा के राज्य में रहता हो उन का स्वर्गवास होने पर, विदेश में जाकर परस्पर एक दूसरे के साथ असम्भव मेज के समय, वेद समाप्ति पर, वमन के समय, श्राद्ध के भ-जन, अतिथि बन के अन्य के घर भोजन करने पर इन अवसरों में एक दिन रात वेद न पढ़े। चतुर्दशी, अमावास्या, कार्त्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ महिनों की पौर्णमासी, (इन्हीं पौर्णमासियों में चातुर्मास्ययागों के तीन पर्व होते हैं) तीनों अष्टका श्राद्धों में तीन दिन तक, इन चतुर्दश्यादि में वेद को न पढ़े। कोई आचार्य कहते हैं कि वर्षा ऋतु के आदि अन्त में वर्षा, बिजुली की चमक और गर्जना एक साथ हों वा बूंदें पड़ती हों, भोजन के ऊपर, तथा उत्सव के समय भी वेद को न पढ़े। पढ़े हुए वेद का रात्रि के पहिले प्रहर में ही पाठ