अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४७
नगरे मानसम्प्यशुचि श्राद्धिनामाकालिकमकृतान्नश्राद्धिकसं योगेऽपि प्रतिविद्यं च यावत्स्मरन्ति यावत्स्मरन्ति ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ प्रशस्तानां स्वकर्मसु द्विजातीनां ब्राह्मणो भुञ्जीत, प्रति- गृह्णीयाच्चैधोदकयवसमूलफलमध्वभयाभ्युद्यतशय्यासनावस- थयानपयोदधिधानासफरिप्रियङ्गुस्रङ्मार्गशाकान्यप्रणोद्या- नि सर्वेषां पितृदेवगुरुभृत्यभरणे चान्यवृत्तिश्चेन्नान्तरेण शूद्रान्,पशुपालक्षेत्रकर्षककुलसंगतकारपितृपरिचारका भोज्या न्ना वणिक् चाशिल्पी,नित्यमभोज्यं केशकीटावपन्नं रजस्व- लाकृष्णशकुनिपदोपहतं भ्रूणघ्नावेक्षितं गवोपघातं भावदुष्टं
करे । गांव वा नगर में, तथा मनमेंग्लानि होने पर नित्य ही अनध्याय करे । श्राद्ध करनेवाला एक दिन रात वेद न पढ़े । यदि श्राद्ध सम्बन्धी कच्चा अन्न सीधा लेवे तो भी वेद का अनध्याय करे। प्रत्येक वेद में जितना२ कहा हो उ- तना अनध्याय माने ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ॥१६॥
ब्राह्मण पुरुष उन द्विजातियों के घरपर भोजन करे जो अपने२ शास्त्रोक्तकर्मों में प्रशंसा पाये हों। और ईंधन, जल, भूसा, मूल, फल' शहद, अभय, नये बने हुए तयार-खटिया, आसन, घर' सवारी, ( रथादि ) दूध, दही, भुनेजौ, मछली, ककुनी' माला, मार्ग, और हरे शाक इन पदार्थों को जो कोई प्रीति श्रद्धा से देवे तो पितर, देव और गुरुकी पूजार्थ तथा स्त्री पुत्रादि की रक्षार्थ सब के ले लेवे निषेध न करे। यदि अध्यापनादि द्वारा अन्य जीविका निर्वाह के लिये हो तो शूद्रों को छोड़कर अतिशूद्रादि से न लेवे। गोपाल, किसान, कुलका संगी, पिता का सेवक और जो कारीगरी को छोड़ के अन्य प्रकार की दुकान करता हो ऐसे शूद्रों का भी कच्चा अन्न ब्राह्मण को भक्ष्य है। जिस पकाये भोजन में बाल वा कीड़े गिर गये हों, रजस्वला स्त्री ने छू लिया हो, काले पक्षी के पग जिसमें लग गये हों, भ्रूण ( गर्भ ) हत्या करने वाले ने जिसे देखा हो, गौ वा बैलने सूंघा हो, जिसको किसी ने दूषित कहा हो वा जिस के दूषित होने में शंका हो गयी हो, जो दही को छोड़ के धरा रहने से ख-
७
४८ गौतमस्मृतिः ॥
शुक्तं केवलमदधि पुनःसिद्धं पर्युषितमशाकभक्ष्यस्नेहमांसम-
धन्युत्सृष्टपुंश्चल्यभिशस्तानपदेश्यदण्डिकतक्षकदर्यबन्धनिकार्चिकित्सकमृगयुवार्युच्छिष्टभोजिगणविद्विषाणामपाङ्क्ता-
नां प्राग्दुर्बलाद्वृथानाचमनोत्थानव्यपेतानि समासमा-
भ्यां विषमसमै पूजान्तरानर्चितं च गोश्च क्षीरमानर्दशा-
याः सतकेचाजामहिष्योश्च नित्यमाविकमपेयमौष्ट्रमेकशफं
च स्यन्दिनी यमसूसन्धिनीनां च याश्च व्यपेतवत्साः प-
ञ्चनखाश्चाशल्यकशशकश्वाविद्गोधाखड्गकच्छपाउभयतोद-
त्केशलोमैकशफकलविङ्कप्लवचक्रवाकहंसाः काककङ्कगृ-
टाय गया हो' फिर से पकाया, धरा हुआ ( बासी ), ये उक्त सब पक्वान्न अभक्ष्य हैं। परन्तु शाक, भक्षण के योग्य घी तेलादि स्नेह, मांस और मिष्टान्न ये घरे हुए भी अभक्ष्य नहीं हैं। जो अन्न किसी ने छोड़ वा फेंक दिया हो, निन्दितका, यह न ज्ञात हो कि यह किसके यहां का है, संन्यासीका, बढ़ई, कंजूस, कैदी, वैद्य, वधिक, वारी, जूठन खानेवाला, इन निन्दितादि का, चन्दे का, विद्वेषी ( शत्रुओं ) का और बिरादरी से छेके हुओं का अन्न अभक्ष्य है। अपने आश्रित या घरके रोगी आदि से पहिले भोजन न करे। जिस में से पंच महायज्ञ न हुए हों ऐसा वृथान्न, पांति में कोई भी अन्त का आचमन (ओ-ममृतापिधानमसि स्वाहा ) मन्त्र से कर ले तब वा कोई पांति में से उठ जावे तब वा जब पांति के लोग भोजन करना छोड़ देवें तब भी भोजन न करे। जहां बराबर वालों में पक्षपात से आदर की विषमता की जाय वा ऊंच नीचों का तुल्य आदर किया जाय वहां भी भोजन न करे। जहां पहिले की अपेक्षा आदर कम हो, वा आदर के साथ जहां भोजन न कराया जाय वहां भी न खावे। व्याने पर सूतक समय दश दिन के भीतर गौ भैंस तथा बकरी का दूध न खावे, भेड़ी, ऊंटनी, घोड़ी, ऋतुमती वा जिसका दूध थनों में से चूता हो, जो दो बच्चों से व्यावे, जो गर्भर्वार्तणी आदि हो और दूध देवे, जिस गौ आदि का बच्चा मरगया हो इन भेड़ी आदि का दूध न खाना चाहिये। सेही, शश (खरहा), गोधा ( गोह ), गैंठा, और कछुआ को छोड़कर बाकी पांच नखोंवाले, दोनों ओर दांतोंवाले, केशों के तुल्य बड़े २ लोमोंवाले, एक खुर वाले, कलविङ्क ( गवरापक्षी ) प्लव ( जल में तरनेवालेपक्षी ) चकवा, हंस, कौवा, कंक ( जिस के पंखों को बाण में लगाते हैं ) गीध, और श्येन पक्षी,
भाषार्थसहिता ॥ ४९
प्रश्येना जलजा रक्तपादतुण्डा ग्राम्यकुक्कुटसूकरौ धेन्वन- डुहौ चापन्नदावसन्नवृथामांसानि किसलयक्याकुलसूननिर्याास- लोहिताव्रश्चनाःश्वनिहतदारुवकबलाकाद्रुद्रुटिट्टिभमान्धातृ नक्तंचरा अभक्ष्याः ॥१॥ नभक्ष्याः प्रतुदा विकिरा जालपादा मत्स्याश्चाविकृतावध्याश्च धर्मार्थेऽव्यालहता दृष्टदोषवाक्- प्रशस्तान्यभ्युक्ष्यौपयुञ्जीतोपयुञ्जीत ॥ २ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥
अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री नातिचरेद्भर्त्तारं वाक्चक्षुःकर्म्मसंय- ताऽपमिरपत्यलिप्सुर्देवराद्गुरुप्रसूतान्नर्त्तुमृतीयात्पिण्डगोत्र-
जल में पैदा हुए मछली आदि, जिनके पंजे वा चोंच लाल हों, गांव का मुरगा, गांव का सूअर, गौ, बैल, स्वयं मरे, वनके अग्नि से जलके मरे। इन सब पशुनक्षादि का मांस नहीं खाना चाहिये। यज्ञादि को छोड़ केवल खाने के लोभ से प्राप्त किया मांस भी अभक्ष्य है। पत्तों का रसादि, स्वयं सादें का मांस, वृक्षों का लाल गोंद, गोदमे से निकला गोंद, कुत्ते ने मारी शिकार, कठफोरवा (दारुवक), बगला, रोगीजीव, टिटुहिया, मान्धाता-पक्षी, और रात्रि में विचरने वाले चमगीदड़ आदि ये सब अभक्ष्य हैं ॥ १॥ जो चोंच से मार २ के जीवों को खाते, नखों से बिखेर २ के जो खाते, जिन के पग जाल के तुल्य हैं और सब मछलियां भी अभक्ष्य हैं। जिसके शरीर में विकार हो और जो अवध्य हैं उन का भी मांस न खावे। यज्ञादि धर्म के लिये जो पशुपक्षी विधिपूर्वक मारे गये हों, जिन को सांप ने न काटा हो, जिन में शास्त्र से वा प्रत्यक्ष से कोई दोष न देखा गया हो और वाणी से जो प्रशस्त हों ऐसे जीवों के मांस को देवता तथा पितरों का पूजन समर्पण करके उपयोग में लावे ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
धर्मविषय में स्त्री स्वतन्त्र नहीं है, वाणी, चक्षु, और हाथ पांव की चेष्टा को वशीभूत नियम बद्ध रखती हुई पति की आज्ञाका उल्लंघन न करे। पति के अभाव में सन्तान को चाहती हो तो देवर, गुरुपुत्र वा पिण्ड गोत्र ऋषि जिन के एक ही हों ऐसे पति के कुल के कोई पुरुष अथवा पति के कुल के किसी पुरुष से ऋतुकाल में वीर्यदान लेकर सन्तान उत्पन्न कर लेवे। कोई
| ५० | गौतमस्मृतिः ॥ |
|---|
ऋषिसंबन्धिभ्यो योनिमात्रान्द्वा, नादेवरादित्येके, नातिद्वितीयं, जनयितुरपत्यं समयादन्यत्र जीवतश्च क्षेत्रे परस्मात्तस्य द्वयोर्वा रक्षणाद्भर्तुरेव नष्टे भर्तरि षाड्वार्षिकं क्षपणं श्रूयमाणेऽभिगमनं प्रव्रजिते तु निवृत्तिः प्रसङ्गात्तत्स्य द्वादशवर्षाणि ब्राह्मणस्य विद्यासंबन्धभ्रातरि चैवं ज्यायसि यवीयान्कन्याग्न्युपयमनेषु षडित्येके त्रीन्कुमार्यृतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलङ्कारान् प्रदानं प्रागृतोरप्रयच्छन् दोषी प्राग्वाससः प्रतिपत्तेरित्येके द्रव्या-
आचार्य कहते हैं कि देवर से भिन्न पुरुष के साथ नियोग न करे। पति से अन्य दूसरे नियुक्त का उल्लंघन करके किसी तीसरे से स्त्री संग न करे। नियोग के नियत समय से भिन्न काल में नियुक्त के साथ स्त्री संग करे तो वह सन्तान उत्पादक नियुक्त पुरुष का होगा। और पति के जीवित रहते ही यदि अन्य किसी पुरुष से सन्तान उत्पन्न हो तो वह सन्तान उस उत्पादक का वा दोनों का माना जायगा (अर्थात् बीज के स्वत्व से उत्पादक का और क्षेत्र के स्वत्व से क्षेत्र वाले का होगा) यदि स्त्री का पति उस की रक्षा भी करे तो उसी का सन्तान होगा। किसी स्त्री का पति कहीं विदेश में चला जाय और पता न हो कि कहां गया तो छः वर्ष तक उस की बाट देखे कालक्षेप करे। यदि सुन पड़े कि अमुक ग्राम वा नगर में है तो पति के समीप स्त्री चली-जावे। यदि वह पति संन्यासी हो गया हो तो फिर उस के पास न जावे। योनि सम्बन्धी वा विद्या सम्बन्धी बड़े भाई ब्राह्मण के कहीं अज्ञात निकल जाने पर छोटा भाई कन्या के स्वीकार, अग्नि स्थापन और विवाह करने के लिये बारह वर्ष तक वा किन्हीं आचार्यों के मत से छः वर्ष तक बाट देखे। यदि ऋतुमती होने से पहिले पिता वा पितृस्थानी चाचा भ्रातादि कन्या का विवाह न करदें तो तीन बार ऋतुमती होने पश्चात् पिता के दिये आभूषणों का त्याग करके स्वयं किसी अनिन्दित सत्पात्र वर के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेवे । ऋतुमती होने से पहिले विवाह न करे तो पितादि को पाप दोष लगता है। और कोई आचार्य कहते हैं कि वस्त्र में दाग लगने से पहिले ही विवाह न करने पर पाप लगता है। कन्या का विवाह करने के
भाषार्थसहिता ॥ ५१
दानं विवाहसिद्ध्यर्थं धर्म्मतन्त्रप्रसंगे च शूद्रादन्यत्रापि शू- द्राद् बहुपशोर्हीनकर्म्मणः शतगोरनाहिताग्नेः सहस्रगोर्वा सो- मपात् सप्तमीं चाभुक्त्वाऽनिचयायाप्यहीनकर्मभ्य आचक्षी- त राज्ञा पृष्टस्तेन हि भर्त्तव्यः श्रुतशीलसंपन्नश्चेद्धर्म्मतन्त्रपी- डायां तस्याकरणेऽदोषोऽदोषः ॥१॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ द्वितीयः प्रपाठकश्च पूर्णः ॥ उक्तो वर्णधर्म्मश्चाश्रमधर्म्मश्चाथ खल्वयं पुरुषो येनक- र्म्मणा लिप्यते यथैतदयाज्ययाजनमभक्ष्यभक्षणमवद्यवदनं
लिये वा दान पुण्यादि धर्मकार्यों के निमित्त शूद्र से भी धन ले लेवे । तथा अन्य कामों में भी बहुत पशुओंवाले शूद्र से वा सैकड़ों गौओं वाले धर्म कर्म हीन अनाहिताग्नि ( जिसने विधिपूर्वक अग्नि स्थापन करके अग्निहोत्र नहीं लिया ऐसे ) द्विज से वा सात पीढी से जिसके घर में अग्निष्टोमादि सोमयाग होते आये हों ऐसे द्विज से धन लेलेवे । और स्वयं न खावे न जोड़कर पास रक्खे, किन्तु तत्काल किसी धर्म के काम में लगा देवे तो ऐसे काम के लिये धर्म कर्महीन नीच पुरुषों से भी धनादि लेलेवे । यदि विद्वान् गृहस्थ से राजा पूछे तो धर्मादि जिस काम के लिये जितना धनादि अपेक्षित हो सो ठीक २ कह देवे । राजा को उचित है कि गृहस्थ ब्राह्मण वेदवेत्ता तथा सीधा सच्चा स्वभाववाला हो तो उसका भरण पोषण अवश्य करे । यदि धर्मसम्बन्धी कि- सी काम के करने में शरीर को अत्यन्त कष्ट पहुंचना सम्भव हो तो उसके न करने में दोष नहीं लगेगा ॥१॥ इस१८ वें अध्याय में जो नियोग का विषय है सो यह नियोग राजा वेन का चलाया है । उसके बाद में ऋषियों तथा आचा- यों ने जो२ धर्मशास्त्र प्रकाशित वा प्रवृत्त किये उनसब में राजा के अनुरोध से नियोग लिखा गया है । इन सब बीशो२० धर्मशास्त्रों में मानव धर्मशास्त्र मुख्य वा श्रेष्ठ है । जब उसमें इस वेन राजप्रचारित नियोग का खण्डन किया गया तो सभी धर्मशास्त्रों में वही खण्डन काफी है ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अठाह्रवां अध्याय पूरा हुआ ॥१८॥ वर्णों और आश्रमों का धर्म कहा गया । अब यह विचार किया जाता है कि यह ब्राह्मणादि मनुष्य जिस २ कर्म से लिप्त नाम पापी अपराधी होता है जैसे कि जिसको यज्ञादि का अधिकार नहीं उस शूद्रादि को यज्ञ कराना, अभक्ष्य का भक्षण, न कहने योग्य मिथ्या भाषणादि करना,
५२ गौतमस्मृतिः ॥
शिष्टस्याक्रिया प्रतिषिद्धसेवनमिति, तत्र प्रायश्चित्तं कुर्यान्न कुर्यादिति, मीमांसन्ते न कुर्यादित्याहुर्नहि कर्म क्षीयत इति । कुर्यादित्यपरे पुनस्तोमेनेष्ट्वापुनःसवनमायान्तीति विज्ञायते व्रात्यस्तोमेनेष्ट्वा तरति सर्वं पाप्मानं, तरति ब्रह्महत्यां योऽश्व- मेधेन यजतेऽग्निष्टुताभिशस्यमानं, याजयेदिति च ॥१॥ तस्य निष्क्रयणानि जपस्तपो होम उपवासो दानमुपनिषदो वे- दान्ताःसर्व्वच्छन्दःसु संहिता मधून्यघमर्षणमथर्वशिरो रुद्राः पुरुषसूक्तं राजनरौहिणे सामनी बृहद्रथन्तरे पुरुषगतिर्महा- नाम्न्यो महावैराजं महादिवाकीर्त्यं ज्येष्ठसाम्नामन्यतमद्
शास्त्र में कहे सन्ध्यादि कर्म न करना, और निषिद्ध हिंसादि को करना इत्या- दि के लिये प्रायश्चित्त करे वा न करे ऐसी मीमांसा नाम सन्देह करते हैं । इसमें पूर्वपक्षी कहते हैं कि प्रायश्चित्त न करे क्योंकि किया हुआ कर्म अपना फ- ल दिये बिना क्षीण ( नष्ट ) नहीं होता । इसीपर यह जनश्रुति चली है कि- ( अवश्यमेवभोक्तव्यं कृतंकर्मशुभाशुभम् । ) परन्तु उत्तर पक्ष के ऋषि तथा आचार्य कहते हैं कि प्रायश्चित्त अवश्य करे। क्योंकि श्रुति में लिखा है कि स्तोम यज्ञ करके फिर सोमपागादि का अधिकारी हो जाता है । व्रात्यस्तोम यज्ञ करके सब पापों से पार हो जाता है और जो अश्वमेध यज्ञ करता है वह ब्रह्महत्या के महापातक से भी मुक्त हो जाता है । और चोरी व्यभिचार आ- दि से दूषित निन्दित द्विज को अग्निष्टुत् यज्ञ करावे ॥ १ ॥ उन यज्ञों के करने की सामर्थ्य सर्वसाधारण लोगों को नहीं हो सकती इसलिये यज्ञादि के प्र- त्याम्नाय नाम प्रतिनिधि प्रायश्चित्तरूप शुभ कर्त्तव्य ये हैं कि-जप, तप, होम, उप- वास, दानकरना, इनका आगे क्रम से विशेष व्याख्यान करते हैं। उपनिषदरूप वे- दान्त ग्रन्थों का पाठ करना, गायत्र्यादि सब छन्दों में वेद संहिताओं का श्रद्धाभक्ति से अभ्यास,मधुमती (मधुवाता०) इत्यादि तीन ऋचा,अघमर्षणसूक्त, अथर्वशीर्ष,रुद्राध्याय,पुरुष सूक्त,राजन और रौहिण दोनों साम,बृहद्रथन्तरसाम, पुरुषगति, महानाम्नीऋचा, महावैराज, महादिवाकीर्त्य, ज्येष्ठ सामों में से कोई एक साम, बहिष्पवमान सूक्त, कूष्माण्डसूक्त,पवमानसूक्त, इनमें से किसी
भावार्थसंहिता ॥ ५३
बहिष्पवमानं कूष्माण्डानि पावमान्यः सावित्रीचेति पावनानि ॥ २ ॥ पयोव्रतता शाकभक्षता फलभक्षता प्रसृतयावको हिरण्यप्राशनं घृतप्राशनं सोमपानमिति च मेध्यानि ॥३॥ सर्वे शिलोच्चयाः सर्वाः स्रवन्त्यः पुण्या ह्रदास्तीर्थानि ऋषिनिवासा गोष्ठपरिस्कन्दा इति देशाः ॥ ४ ॥ ब्रह्मचर्यं सत्यवचनं सवनेषूदकोपस्पर्शनमार्द्रवस्त्रताऽधःशायिकाऽनाशक इति तपांसि ॥५॥ हिरण्यं गौर्वासोऽश्वो भूमिस्तिला घृतमन्नमिति देयानि ॥ ६ ॥ संवत्सरः षण्मासाश्चत्वारस्त्रयो द्वावैकश्चतुर्विंशत्यहो द्वादशाहः षडहस्त्र्यहोऽहोरात्रइति काला एतान्येवानादेशे विकल्पेन क्रियेरन् ॥७॥ एनस्सु गुरुषु गुरूणि
का वा कई का बहुत कालतक नियम से निरन्तर श्रद्धा के साथ अभ्यास करे तो पापों से मुक्त होजाता है ( यह सब जप का व्याख्यान है ) ॥ २ ॥ केवल दूध, वा शाक, फल, एक उलटे हाथ में जितना एकवार में भराजाय उतना कुलत्थ ( खुत्थी, ) अन्न एक दिन में खाना, इन दूध आदि के व्रतों से, तथा सुवर्ण, गोघृत वा सोमपान रसायन कल्प के विधान से खाना ये सब मेधानाम् बुद्धि को शुद्ध करनेवाले और जप तप के सहायक हैं ॥३॥ सब पहाड़, सब सोता झरना वा नदियां, पवित्र कुण्ड वा तीर्थ ( तालाव ) ऋषियों के रहने की तपोभूमि, किसी से सुरक्षित गोशाला ये सब स्थान जप तप के समय निवास के योग्य उपयोगी हैं ॥ ४ ॥ जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी रहना, सत्य बोलना, सायं प्रातःकाल और मध्यान्ह में तीनोंवार स्नान करना, गीले वस्त्र पहनना, भूमिपर लेटना सोना, कुछभी भोजन न करना ये सब तप कहाते हैं ॥ ५ ॥ सुवर्ण, गौ, वस्त्र, घोड़ा, भूमि, तिल' घी'अन्न, इन पदार्थों का सुपात्र धर्म निष्ठ विद्वान् ब्राह्मण को देना मुख्यदान है । इससे भी पाप कटते हैं ॥६॥ जहां प्रायश्चित्त का कोई समय नियत न किया हो वहां एक वर्ष छः मास, चारमास, तीनमास, दोमास, एकमास, चौबीशदिन, बारहदिन, छःदिन, तीनदिन, एकदिनरात, इन में से किसी एक नियत समय तक उक्त जप पाठादि प्रायश्चित्त करे ॥७॥ पापों के अधिक बड़े २ होनेपर अधिक दिनों तक और छोटे२ वा कम पापों में
५४ गौतमस्मृतिः ॥
लघुषु लघूनि कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्वप्रायश्चित्तं सर्वप्रायश्चित्तम् ॥ ८ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥
अथ चतुःषष्टिषु यातनास्थानेषु दुःखान्यनुभूय तत्रेमानि लक्षणानि, भवन्ति ब्रह्महार्द्रकुष्ठो, सुरापः श्यावदन्तो, गुरुतल्पगः पङ्गुः, स्वर्णहारी कुनखी, श्वित्री वस्त्रापहारी, दर्दुरो तेजोपहारी, मण्डली स्नेहापहारी क्षयी तथा, अजीर्णवान्नापहारी, ज्ञानापहारी मूकः, प्रतिहन्ता गुरोरपस्मारी, गोघ्नो जात्यन्धः, पिशुनः पूतिनासः, पूतिवक्त्रस्तु सूचकः, शूद्रोध्यापकःश्वपाकस्त्रपुसीसचामरविक्रयी, मद्यप एकशफविक्रयी, मृगव्याधः कुण्डाशी, भृतकश्चैलिको वा नक्षत्री चार्बुदी नास्तिको रङ्गोपजीव्यभक्ष्यभक्षो गगदरी ब्रह्मपरुषतस्कराणां
थोड़े दिनों तक प्रायश्चित्त करे। कृच्छ्र अतिकृच्छ्र और चान्द्रायण ये सब पापों के प्रायश्चित्त हैं ॥ ८ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में उन्नीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
अब नरक दुःख भोग के चौंसठ स्थानों में प्राणी दुःखों का अनुभव करके फिर मनुष्य योनि में जन्म लेता है उसके ये निम्न चिन्ह होते हैं। ब्रह्महत्या करनेवाला-गलित कुष्ठी होता, मद्यपानी के श्याम (काले) दांत होते, गुरुपत्नी गामी पङ्गु (लंगड़ा) होता, सुवर्ण का चोर-बिगड़े नखोंवाला होता, वस्त्र चुरानेवाला-श्वेत कुष्ठी, दीपकादि प्रकाश का चुरानेवाला-दादकारोगी, घी तैलादि चिकनाई चुरानेवाला-मण्डल (चखन्देयुक्त) कुष्ठी तथा क्षयी (तपेदिक्क) रोगवाला होता है। अन्न चुराने वाला अजीर्णरोगी, ज्ञान (विद्या) का चोर-गूंगा, बदले में गुरु को पीटनेवाला मृगीरोगयुक्त, गोहत्यारा-जन्मान्ध, चुगल पीनसरोगी वा दुर्गन्ध युक्त नासिकावाला, निन्दक-मुखमें दुर्गन्धवाला, शूद्र को वेद पढ़ानेवाला-चाण्डाल, रांगा शीशा और चंवर बेंचनेवाला-मद्यपानी, एक (जुड़े) खुरवाले पशुओं को बेंचने वाला-बहेलिया, कूंड़े में खानेवाला-वैतनिक नौकर (दास) वा धोबी, शास्त्र को जाने विना नक्षत्रों की खगोल विद्या का अभिमानी-अर्बुद (मांसपिण्डका) रोगी, नास्तिक
भाषार्थसंहिता ॥ ५५
देशिकः पिशितः षण्डो महापंथिको गण्डकश्चाण्डालीपुक्कसीगोष्ववकीर्णी मध्वामेही धर्म्मपत्नीषु स्यानन्मैथुनप्रवर्त्तकः खल्वाटसगोत्रसमयस्र्यभिगामी श्लीपदी पितृमातृभगिनीस्र्यभिगाम्यावीजितस्तेषां कुब्जकुण्ठमण्डलव्याधितव्यङ्गदरिद्राल्पायुषोऽल्पबुद्धयश्चण्डषण्डशैलूषतस्करपरपुरुषप्रेष्यपरकर्म्मकराः खल्वाटवक्राङ्गसंकीर्णाः क्रूरकर्म्माणःक्रमशश्चान्तयाञ्श्चोपपद्यन्ते तस्मात्कर्त्तव्यमेवेह प्रायश्चित्तं विशुद्धैर्लक्षणैर्जायन्ते धर्म्मस्य धारणादिति धर्म्मस्यधारणादिति॥१॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥
त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं वेदविप्लावकं भ्रूणहनं
रंगों द्वारा जीविका करने वाला, अभक्ष्य भक्षण कर्त्ता-गण्डमाला का रोगी, ब्रह्मद्रोही तथा चोरों का उपदेशक-संकुचित तथा नपुंसक, निन्दित मार्ग में चलने वाला-गण्डरोगी । चाण्डाली, पुक्कसी और गौ के साथ मैथुन करनेवाला मधु प्रमेह युक्त होता, धर्मपत्नी स्त्रियों में मैथुन की प्रवृत्ति करने वाला-खल्वाट ( गंजा ), अपने गोत्र की स्त्री से संग करने वाला-श्लीपर्दी ( हाथी पांव का ) रोगी, पिता की बहिन ( फूफी ) माता की बहिन ( मौसी ) से संग करने वाला अत्यल्पवीर्य युक्त होता है । प्रयोजन यह कि उक्त दुष्कर्मों के वैसे २ अनिष्ट फल जन्मान्तरों में प्राणियों को होते हैं । और ऐसे पापी लोग विशेष कर जन्मान्तरों में कुब्ज (कुबड़े) आलसी, मण्डल-कोढ़ी, नित्यरोगी, शत्रु के नौकर, वा दास खल्वाट ( गंजे, ) वक्राङ्ग ( टेढ़े अंगों वाले, ) सकुंचे क्रूर-कठोर निर्दयी-हिंसाकर्मोंवाले क्रम से होते हैं । और चमार चाण्डालादि नीचों में जन्म लेते हैं । इसलिये प्रायश्चित्त अवश्य ही करने चाहिये जिस से जन्मान्तरों में धर्म के धारण करने से शुद्ध चिन्हों से युक्त उत्तम पुण्यात्माओं में जन्म होता है ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में वीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
पुत्र को चाहिये कि राजा का वध करने, शूद्र को यज्ञ कराने, वेद को डुबाने, व्यभिचार करके गर्भ पात करने, भील आदि नीचों के साथ सहवास करने और नीचों की स्त्रियों से संभोग करने वाले पिता को त्याग देवे । उस
८
५६ गौतमस्मृतिः ॥
यश्चान्त्यावसायिभिः सह संवसेदन्त्यावसायिन्या वा तस्य विद्यागुरून्द्योनिसंबन्धांश्च सन्निपात्य सर्वाण्युदकादीनि प्रेतकर्म्माणि कुर्युः पात्रं चास्य विपर्य्यस्येयुः ॥ १ ॥ दासः कर्मकरो वाऽवकरादमेध्यपात्रमानीय दासीघटात् पूरयित्वा दक्षिणाभिमुखः पदा विपर्य्यस्येदमुमनुदकं करोमीति नामग्राहं तं सर्वेऽन्वालभेरन् प्राचीनावीतिनो मुक्तशिखा विद्यागुरवो योनिसंबन्धाश्च वीक्षेरन्नप उपस्पृश्य ग्रामं प्रविशन्ति ॥२॥ अतऊर्ध्वं तेन संभाष्य तिष्ठेदेकरात्रं जपन्सावित्रीमज्ञानपूर्वं ज्ञानपूर्वं चेत्त्रिरात्रम्॥३॥यस्तु प्रायश्चित्तेन शुध्येत्तस्मिन् शुद्धे शातकुम्भमयं पात्रं पुण्यतमाद्ध्रदात् पूरयित्वा स्रवन्तीभ्यो वा ततएनमुपस्पर्शयेयुः ॥४॥ अथास्मै तत्पात्रं दद्युस्तत्सं-
पिता के विद्या गुरुओं और कुटुम्बियों को एकत्र करके जलदानादि प्रेतकर्म उस के लिये ( उस के जीवित रहते ही तिलाञ्जलि दे देवें ) करें तथा निम्नरीति से जलपात्र को फेंके ॥ १ ॥ कहार वा किसी शूद्र नौकर द्वारा घूरे पर से मट्टी का अशुद्ध पात्र मगाकर कहारिन के घड़े से उस में जल भर के अपसव्य हो दक्षिण को मुखकर (अमुम्-अनुदकं करोमि) इस मन्त्र के अमुं शब्द के स्थान में पिता का द्वितीयान्त नाम बोलता हुआ उस जल भरे घड़े को पग से मारके फेंक देवे, साथ ही विद्यागुरु और कुटुम्बी लोग चोटी की गांठ खोल कर अपसव्य हुए उस घड़े को फेंकते हुए पुत्र का पीछे देखते हुए हाथ से स्पर्श करें । पश्चात् जल का स्पर्श करके गांव को सब चले आवें ॥ २ ॥ इस कृत्य के पश्चात् बिना जाने जो कोई उस पतितके साथ संभाषण करे तो वह गायत्री का जप करता हुआ एक रातभर खड़ा रहे । यदि जान कर उस के साथ संभाषण करे तो तीन दिन गायत्री का जप करता हुआ प्रायश्चित्त करे ॥३॥ यदि राजा की हत्यादि करने वाला वह पतित प्रायश्चित्त करके शुद्ध हो जावे तो उस के शुद्ध हो जाने पर सुवर्ण के पात्र को किसी पवित्र कुण्ड वा बहती हुई नदियों से भर के विद्यागुरु और कुटुम्बी लोग उस प्रायश्चित्ती का अभिषेक करें ॥४॥ इस के बाद वह सुवर्ण का पात्र उस प्रायश्चित्ती को देदेवें । वह उस
भाषार्थसहिता ॥ ५७
प्रतिगृह्य जपेत् ओं-शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तं शिवमन्तरिक्षम्। यो रोचनस्तमिह गृण्हामीत्येतैर्यजुर्भिस्तरत्समन्दीभिः पावमानीभिः कूष्माण्डैश्चाज्यं जुहुयाद्धिरण्यं ब्राह्मणाय वा दद्याद् गामाचार्याय ॥५॥ यस्य च प्राणान्तिकं प्रायश्चित्तं स मृतः शुध्येत्तस्य सर्वाण्युदकादीनि प्रेतकर्माणि कुर्युरेतद्देव शान्त्युदकं सर्वेषूपपातकेषु सर्वेषूपपातकेषु ॥ ६ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकविंशोध्यायः ॥ २१ ॥
ब्रह्महसुरापगुरुतल्पगमातृपितृयोनिसंबन्धगस्तेननास्तिकनिन्दितकर्माभ्यासिपतितात्याग्यपतितत्यागिनः पतिताः पातकसंयोजकांश्च तैंश्चाब्दं समाचरन् ॥१॥ द्विजातिकर्मभ्यो हानिः पतनं परत्र चासिद्धिस्तामेके नरकं त्रीणि प्रथमा-
सुवर्णके पात्र को हाथ में लेकर (ओं शान्ताद्यौः०) इत्यादि मन्त्रका जप करे। तदनन्तर (तरन्तमन्दी०) सूक्त, पावमानी ऋचाओं, तथा कूष्माण्डसूक्तों से घृत का होम करे। अथवा सुपात्र ब्राह्मण को सुवर्ण का दान और गुरु को गौ दान देवे ॥ ५॥ जिस अपराधी का प्रायश्चित्त ऐसा हो कि जिस में उस का प्राणान्त हो जाय तो वह मर कर शुद्ध होता है। उस के तिलाञ्जलि आदि सब मृतक कर्म पुत्रादि कुटुम्बियों को शास्त्रानुकूल करने चाहिये यही सब उपपातकों में शान्ति का जल उस के लिये है ॥ ६ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में इक्कीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२१॥
ब्रह्महत्यारा, मद्यपीने वाला, गुरु पत्नी से व्यभिचार कर्त्ता, माता और पिता के कुल की स्त्रियों से गमन करने वाला, सुवर्ण का चोर, नास्तिक (वेदनिन्दक,) निन्दित (छलकपटादि ) कर्मों को जो बार २ करे, जो पतित को न त्यागे, जो पतित नहीं हुआ उसे त्याग देवे, जो निर्दोष को पातक लगावे, और जो एक वर्ष तक पतितों का संग करे ये सब पतित कहाते हैं ॥ १ ॥
• ब्राह्मणादि द्विज अपने २ कर्मों से हीन हो जायं अपने कर्मों के अधिकारी न रहें यही पतित होना कहाता है। इन की जन्मान्तर में सिद्धि नहीं होती। इसी असिद्धि को कोई आचार्य नरक होना कहते हैं । ब्रह्महत्या, सुरा (मद्य) पान, सुवर्ण की चोरी इन तीन महापातकों का प्रायश्चित्त नहीं है यह मनुजी की राय है। कोई आचार्य कहते हैं कि गुरुपत्नी को छोड़ के अन्य
५८ गौतमस्मृतिः ॥
न्यनिर्दैश्यानीति मनुर्न स्त्रीषु गुरुतल्पगः पततीत्येके भ्रूणहनि ॥२॥ हीनवर्णसेवायां च स्त्रीपतति कौटसाक्ष्यं राजगामि पैशुनं गुरोरनृताभिशंसनं महापातकसमानि, अपाङ्क्त्यानां प्राग्दुर्बलाद्गोघ्नब्रह्मोज्झतन्मन्त्रकृदवकीर्णिपतितसावित्रीकेषूपपातर्क याजनाध्यापनादृत्विगाचार्यों पतनीयसेवायां च हेयावन्यत्र हानात्पतति तस्य च प्रतिग्रहीतेत्येके न कर्हिचिन्मातापितृरोर्वृत्तिर्दायं तु न भजेरन् ब्राह्मणाभिशंसने दोषस्तावन् द्विरनेनसि दुर्बलहिंसायामपि मोचने शक्तश्चेत् ॥ ३ ॥
त्रियों से व्यभिचार करने पर मनुष्य पतित नहीं होता (अर्थात् गुरु पत्नी गमन की अपेक्षा कम-थोड़ा पाप लगता है परन्तु गुरुपत्नी गामी महापातकी होने से अवश्य पतित हो जाता है) परन्तु व्यभिचार के पश्चात् भ्रूण हत्या करे तो अवश्य ही पतित होता है ॥२॥ भ्रूण (गर्भ) हत्या करने और अपने से नीच वर्ण के पुरुष की सेवा (उस के साथ रहने संयोग) करने से स्त्री भी पतित होजाती है। जान कर झूठी गवाही, राजा से किसी का ऐसा झूठा अपराध कहना जिस से राजा उसे मरवाडाले, जानकर गुरु के साथ मिथ्या भाषण करना ये कर्म महापातकों के समान हैं। दुर्बल को छोड़ के जाति-पांति से बाहर किये हुओं में-गोहत्यारा, वेद का त्यागी, इन का भेली सलाही, ब्रह्मचर्य नियम में रहते समय व्यभिचार कर्त्ता, और संस्कार हीन व्रात्य ये सब मुख्य उपपातकी हैं। अनधिकारियों को यज्ञ कराने, पढ़ाने, और पतित होने योग्य किसी श्रीमान् की सेवा में रहने से ऋत्विज् और प्राचार्य्य (गुरु) त्यागने योग्य होते हैं। जो इन दोनों को न त्यागे वह भी पतित हो जाता है। पतित का दान लेने वाला भी पतित होता है यह किन्हीं आचार्यों का मत है। पुत्र ऐसा कभी न करे कि पतित हुए माता पिता को भोजन वस्त्र न दे किन्तु भोजन वस्त्र से उन की रक्षा तबभी करे परन्तु पतित माता पिता का धनादि पुत्र न लेवे। ब्राह्मण की निन्दा करने में भी जाति से पतित होने का दोष लगता है, यदि ब्राह्मण निर्दोष होतो उस की निन्दा में द्विगुण दोष लगता है। यदि क्षमा करने में समर्थ हो वा क्षमाका मौका (अवसर) होतो निर्बल दीन असमर्थ की हिंसा करने में भी दूना पाप लगता है। ॥ ३ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ५९
अभिक्रुद्धावगोरणं ब्राह्मणस्य वर्षशतमस्वर्ग्यं निघाते सहस्रं लोहितदर्शने यावतस्तत्प्रस्कन्द्य पांसून् संगृह्णीयात्सङ्गृह्णीयात्४ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वाविंशोध्यायः ॥ २२ ॥ प्रायश्चित्तमग्नौ सक्तिर्ब्रह्मघ्नस्त्रिरवच्छादि तस्य लक्ष्यं वा स्याज्जन्ये शस्त्रभृताम् ॥१॥ खट्वाङ्गकपालपाणिर्वा द्वादशसंवत्सरान् ब्रह्मचारी भैक्षाय ग्रामं प्रविशेत् स्वकर्माचक्षाणः पथोऽपक्रामेत्सन्दर्शनादार्यस्य स्थानासनाभ्यां विहरन् सवनेषूदकोपस्पर्शी शुध्येत्, प्राणलाभे वा तन्निमित्ते ब्राह्मणस्य द्रव्यापचये वा त्र्यवरं प्रतिरोधोऽश्वमेधावभृथे वान्ययज्ञे-
क्रोध करके ब्राह्मण पर गुरावे तो १०० वर्ष, ब्राह्मण को पीटे तो १००० वर्ष और यदि ऐसा मारे जिस में खून गिरने लगे तो मही के जितने परमाणु ब्राह्मण के रुधिर से भीगें उतने ही वर्षों तक उस पापी को नरक भोगना पड़ता है ॥ ४ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में बाईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥
अब ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त कहते हैं । १-अपनी इच्छा से आंखें बन्द कर नीचे को शिर कर २ के अत्यन्त प्रज्वलित अग्नि में तीनवार गिर २ कर जल जावे । २-विद्वान् ब्राह्मण के हाथ में धनुषबाण वा बन्दूक देकर सहर्ष उन के हाथ से अनेक मनुष्यों के सामने गोली खाकर मर जावे ॥१॥ अथवा ३-एक खटिया का पांव ( मचवा ) और मनुष्य की खोपड़ी हाथ में लेकर बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी रहता हुआ वन में वा एकान्त जंगल में कुटी बनाकर निवास करे । भिक्षा मांगने के लिये एक बार नित्य अपने पाप को कहता हुआ गांव में जाया करे । भिक्षा के लिये जाते आते समय रास्ता में कोई द्विज मिले तो मार्ग से हट जावे । अपने स्थान और आसन के इधर उधर भ्रमण करे कहीं अन्यत्र न जावे । सायं, प्रातः और मध्याह्न काल में तीनो बार स्नान करे इस प्रकार बारह वर्ष के प्रायश्चित्त से शुद्ध होता है । ४-अथवा ब्रह्महत्या करने वाला किसी ब्राह्मण को मृत्यु से बचावे । ५-यदि किसी ब्राह्मण के धन को चोर ले जाते हों तो सच्चे मन से तीनवार चोरों से धन छीन लेने की चेष्टा करे यदि न भी छीन पावे तो भी शुद्ध हो जाता है ६-राजा के अश्वमेध वा अन्य यज्ञ समाप्ति के अवभृथ स्नान के समय राजा तथा विद्वानों
६० गौतमस्मृतिः ॥
ऽप्यग्निष्टुदन्तर्वोत्सुसृष्टश्चेदब्राह्मणवधे ॥२॥ हत्वाप्यात्रेयीं चत्र गर्भं चाविज्ञाते ॥३॥ ब्राह्मणस्य राजन्यवधे षड्वार्षिकं प्राकृतं ब्रह्मचर्यमृषभैकसहस्राश्च गा दद्यात् ॥४॥ वैश्ये त्रैवा- र्षिकं ऋषभैकशताश्च गा दद्यात्॥५॥ शूद्रे संवत्सरं ऋषभैकाद- शाश्च गा दद्यादनात्रेयीं चैवं गां च ॥६॥ शूद्रवन्मण्डूकन- कुलकाकाव्यश्वहरमूषिकांश्च ॥७॥ हिंसासु चास्थिमतां सहस्रं हत्वाऽनस्थिमतामनडुद्भारंच ॥८॥ अपिवाऽस्थिमतामेकैक- स्मिन् किंचित् किंचिद्दद्यात् ॥६॥ षण्डे च पलालभारः सीसमा- के सामने अपना दोष प्रकट करके सब के साथ स्नान करे तो पाप से छूट जाता है । १-यदि मार डालने की मनसा से न मारा हो और ब्राह्मण मर गया हो तो किसी यज्ञ में भीतरी ऋचा से अग्नि की स्तुति वा अग्निष्टुत् नामक यज्ञ करने से शुद्ध हो जाता है ॥ २ ॥ ब्रह्महत्या करने वाला इन सात प्रकार के प्रायश्चित्तों में से देश, काल, शक्ति और अपराध की योग्यता- नुसार कोई एक प्रायश्चित्त करे । ब्राह्मण पुरुष से ब्राह्मणी में स्थापित अ- ज्ञात ( जिस में स्त्री वा पुरुष के चिन्ह न प्रकट हुए हों ऐसे) गर्भ को और रजस्वला ब्राह्मणी के मार डालने पर भी यही उक्त प्रायश्चित्त है ॥ ३ ॥ यदि ब्राह्मण किसी क्षत्रिय का वध करे तो ब्रह्मचारी रहता हुआ छः वर्ष व्रत करे अथवा उक्त प्रायश्चित्तों में से आधा प्रायश्चित्त करे । तथा एक बैल और हजार १००० गौओं का दान करे ॥ ४ ॥ यदि ब्राह्मण किसी वैश्य को मार डाले तो ब्रह्मचर्य के सहित तीन वर्ष प्रायश्चित्त करके एक बैल तथा सौ गौ दक्षिणा में देवे ॥ ५ ॥ यदि ब्राह्मण किसी शूद्र का वध करे तो एक वर्ष प्रायश्चित्त और एक बैल दश गौ दक्षिणा में देवे । रजस्वला से भिन्न ब्राह्मणी के वध में भी यही व्रत करे तथा एक गौ एक बैल द- क्षिणा में देवे ॥ ६ ॥ मेंढक, न्योला, कौवा, भेड़, घोड़े को देकर वापस लेने वाला, और मूषिक इन को मारने पर शूद्र की हत्या में कहे प्रायश्चित्त करे ॥ ७ ॥ गिरगिटादि हड्डी वाले छोटे २ एक हजार १००० जीवों की हत्या करने और विना हड्डी वाले दंश मशकादि एक गाड़ी भर मारे तो शूद्र हत्या का व्रत करे ॥ ८ ॥ अथवा हड्डी वाले एक २ जीव की हत्या मध्ये किंचित् २ दान करे ॥ ९ ॥ नपुंसक जीव की हत्या में एक बोझा, पलाल एक माशा
भाषार्थसहिता ॥ ६१
षकञ्च वराहे घृतघटः सर्पे लोहदण्डः ब्रह्मबन्ध्वां च लल- नायां जीवो वैजिके न किंचित् तल्पान्नधनलाभबधेषु पृथक्व- र्षाणि द्वे परदारे त्रीणि श्रोत्रियस्य द्रव्यलाभे चोत्सर्गो यथा- स्थानं वा गमयेत् प्रतिषिद्धमनः संयोगे सहस्रवाक्चेदग्न्युत्सा- दिनिराकृत्युपपातकेषु चैवं स्त्रीचातिचारिणी गुप्ता पिण्डंतु ल- भेताप्यमानुषीषु गोवर्ज्जं स्त्रीकृते कूष्माण्डैर्घृतहोमो घृतहोमः १०
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३॥
सुरापस्य ब्राह्मणस्योष्णमासिञ्चेयुः सुरामास्ये मृतः
शीशा, सुअर के मारने में एक घड़ा घी, सांप के मारने में लोहे का डंडा, निन्दित कुलटा ब्राह्मणी के मारने पर भी लोह दण्ड का दान देवे। बीज सम्बन्धी जीव के भुंजा ने आदि द्वारा नाश होने पर कुछ प्रायश्चित्त नहीं है। शय्या, अन्न, धन के लेने देने में अज्ञान से किसी मनुष्य का मृत्यु होतो भिन्न २ यथोचित वर्षों प्रायश्चित्त होगा। परस्त्री की हत्या में दो वर्ष, वेदपाठी की स्त्री की हत्या में तीन वर्ष प्रायश्चित्त करे। कहीं पड़ा हुआ धन मिले तो धर्म खाते में उस का दान कर देवे अथवा ज्ञात होजाय कि अमुक का है तो उसीके घर पहुंचा देवे। शास्त्रविरुद्ध निषिद्ध कामों में जो मनको लगावे और वर्जने पर सहस्रों विरुद्ध बातें कहे, जिस ने स्थापित अग्नि का और वेदाध्ययन का त्याग किया हो। इत्यादि उपपातकों में और व्यभिचारिणी स्त्री ये उचित प्रायश्चित्त न करें तो घर से निकाल दिये जावें, खाने को भोजन भी इन को न मिले। पर जो स्त्री पीछे भी अपनी यथावत् रक्षा कर ले तो उस को अन्न भोजन मात्र मिला करे। मनुष्य स्त्री से भिन्न गौ को छोड़ के जो पुरुष अन्य पश्वादि से मैथुन करे वह कूष्माण्ड सूक्तों द्वारा अग्नि में घृत का होम प्रायश्चित्त करे ॥ १० ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२३॥
अब मद्य पीने का प्रयश्चित कहते हैं। मदिरा को अत्यन्त गर्म अग्निवर्ण कर के जानकर मद्यपीनेवाले ब्राह्मण के मुख में उसकी राय से प्रायश्चित्त देनेवाले लोग छोड़ें उससे मरकर वह शुद्ध होता है। यदि अज्ञान से मद्य पीलिया
६२ गौतमस्मृतिः ॥
शुद्ध्येदमत्य़ा पाने पयो घृतमुदकं वायुं प्रति त्र्यहं तप्तानि स कृच्छ्रस्ततोऽस्य संस्कारः ॥ १ ॥ मूत्रपुरीषरेतसां च प्रा- शने श्वापदोष्ट्रखराणां चाङ्गस्य ग्राम्यकुक्कुटशूकरयोश्च ग- न्धाघ्राणे सुरापस्य प्राणायामो घृतप्राशनं च पूर्वैश्च दष्टस्य ॥ २॥ तल्पे लोहशयने गुरुतल्पगः शयीत सूमीं ज्वलन्तीं वा श्लिष्येल्लिङ्गं वा सवृषणमुत्कृत्याञ्जलावाधाय दक्षिणाप्रतीचीं दिशं व्रजेदजिह्ममाशरीरनिपातान्मृतः शुध्येत् ॥ ३॥ सखि- सयोनिसगोत्राशिष्यभार्यासु स्नुषायां गवि च गुरुतल्पस- मोऽवकरइत्येके, श्वभिःखादयेद्राजा निहीनवर्णगमने स्त्रियं
हो तो दूध, घी, जल, और वायु इन को तीन २ दिन गर्म कर २ पीवे इस बारह दिन के व्रत का नाम तप्त कृच्छ्र है । इस के बाद उस का फिर उपनयन सं- स्कार कराया जावे ॥ १ ॥ अज्ञान से विष्ठा, मूत्र, और वीर्य के खानेने पर भी वही तप्त कृच्छ्र और पुनःसंस्कार होना चाहिये । तथा श्वापद, ऊंट, गधा, गांव का मुरगा और गांव के सुवर का मांस खाने पर भी वही पूर्वोक्त प्रा- यश्चित्त जानो । यज्ञ करने वाले ब्राह्मण को यदि मद्य पीने वाले का गन्ध लगजाय तो तीन वार प्राणायाम करके गोघृत खावे तब शुद्ध होता है । तथा जिस को श्वापदादि काटे वह भी यही प्रायश्चित्त करे ॥ २ ॥ जिस ने गुरु पत्नी से गमन किया हो वह लोहे की खटिया को अत्यन्त गर्म करके उसपर लेटजावे । अथवा लोहेकी स्त्री बनवा के अग्निमें अत्यन्त तपाके उसको जोर से लिपट जावे । अथवा अण्डकोशों सहित उपस्थेन्द्रिय को काट के दोनों हाथ की अंजली में धरके दक्षिण पश्चिम के बीचकी नैऋत दिशाको जबतक शरीर न गिर जाय सीधा चला जावे लौट कर पीछे भी न देखे इस प्रकार मर जाने पर शुद्ध होता है ॥ ३ ॥ मित्र की पत्नी, सगी बहन, अपने गोत्र की स्त्री, और शिष्य की स्त्री, पुत्र वधू, और गौ इन से संयोग करना गुरुपत्नी के संयोग के तुल्य महापातक है । कोई आचार्य यह कहते हैं कि उक्त स्त्रियों से गमन करने वाले को कूड़ा करकट के समान त्याग देना योग्य है, फिर क- भी जाति पांक्ति में न लेवें । यदि उच्च कुलकी स्त्री अपने पतिका निरादर
भावार्थसंहिता ॥ ६३
प्रकाशं पुमांसं घातयेत्पृथुक्तं वा गर्दभेनावकीर्णी निरृतिं चतुष्पथे यजेत तस्याजिनमूर्ध्वबालं परिधाय लोहितपात्रः सप्त गृहान् भैक्षं चरेत् कर्माचक्षाणः संवत्सरेण शुध्येत् ॥४॥ रेतस्कन्दने भये रोगे स्वप्नेऽग्नीन्धनभैक्षचरणानि सप्तरात्रं कृत्वाऽऽज्यहोमः सामिसन्धेर्वा रेतस्याभ्यां सूर्याभ्युदिते ब्रह्मचारी तिष्ठेदहरभुञ्जानोऽभ्यस्तमिते च रात्रिं जपन् सावित्रिमशुचिं दृष्ट्वाऽऽदित्यमीक्षेत प्राणायामं कृत्वाऽमेध्यप्राशने वाऽभोज्यभोजने निष्पुरीषीभावस्त्रिरात्रावरमभोजनं सप्तरात्रं वा स्वयं शीर्णान्युपयुञ्जानः फलान्यनतिक्रामन् प्राक्पञ्चनखे-
करके किसी नीच वर्णसे संयोग करे तो राजा बहुत से जन समुदाय में उस पापिनों को शिकारी कुत्तोंसे खिंचवा डाले। और उस नीच पापी कोभी जन समुदाय में कटवादे वा तपाई हुई लोहेकी खटिया पर लिटाके जलवादेवे। जो ब्राह्मणादि द्विज किसी व्रत में ब्रह्मचारी रहने का पूर्ण संकल्प करके बीच में स्त्री संयोग करे वह अवकीर्णी कहाता है। वह अवकीर्णी पुरुष काने गर्दभ से चौराहे पर निर्ऋति देवता का रात में यज्ञ करे। ऊपर को बाल करके उस के चर्म को ओढ़कर लालपात्र हाथ में लिये अपने पाप को कहता हुआ एक वर्ष तक सात घर से भिक्षा मांग के खावे तब शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ वीर्यपात होने पर, भय, रोग और दुःस्वप्न के समय ब्रह्मचारी के नियम और चिन्ह धारण करके सात दिन तक भिक्षा मांगकर भोजन और समिदाधान ठीक नियम से करता हुआ सामान्यार्थ वाले मन्त्र से वा (यजु० अ० १९ । १६) के (रेतोमूत्रं०) इत्यादि दो मन्त्रों से घी का होम करे। भोजन कुछ न करके दिन में खड़ा रहे और सूर्योस्त होने पर रात्रि में सावित्री गायत्री का जप करता हुआ खड़ा रहे। अशुद्ध वस्तु के दीखने पर प्राणायाम करके सूर्य्य नारायण का दर्शन करे। अपवित्र वा अभक्ष्य वस्तु के खानेने पर कम से कम तीन दिन भोजन न करे और विरेचक वस्तु खाकर मल को निकाल देवे अथवा नियम का उल्लङ्घन न करता हुआ सात दिन तक वृक्ष से स्वयं गिरे हुए केवल फलों को खाकर प्रायश्चित्त करे। पांच नखों वाले श्वाविधादि पांच को छोड़ के अन्य जीवों का मांस खावे तो उस का वमन करके गोघृत का प्राशन करे। गाली देने, झूठ बोलने और किसी को मारने पीटने पर
९
६४ गौतमस्मृतिः ॥
ऽभ्यश्छर्दिनो घृतप्राशनं चाक्रोशानृतहिंसासु त्रिरात्रं परम्- न्तपःसत्यवाक्ये वारुणीपावमनीभिर्होमो विवाहमैथुननिर्मा- त्संयोगेष्वदोषमेकेऽनृतं न तु खलु गुर्वर्थेषु यतः सप्त पुरुषा- नितश्च परंश्च हन्ति मनसापि गुरोरनृतं वदन्नल्पेष्व- प्यपध्वन्त्यावसायिनीगमने कृच्छ्राब्दोऽमत्या द्वादशरात्रमु- दक्यागमने त्रिरात्रं त्रिरात्रम् ॥ ५ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥
रहस्यं प्रायश्चित्तमविख्यातदोषस्य चतस्रऋचं तरत्सम- न्दीत्यप्सु जपेदप्रतिग्राह्यं प्रतिजिघृक्षन् प्रतिगृह्य वाऽभोज्यं बुभुक्षमाणः पृथिवीमावपेद्गत्वन्तराग्ममाण्डुकीपरस्पर्शा- च्छुद्धिमेके स्त्रीषु पयोव्रतो वा दशरात्रं घृतेन द्वितीयम्
अपराधी मनुष्य सत्य बोलने में परम तप वा पुण्य मानता हुआ सत्य कहे तो वरुण देवता वाली और पावमानी ऋचाओं से तीन दिन तक होम करे। विवाह और मैथुन की सिद्धि वा प्राप्ति के लिये मिथ्या भाषण में दोष नहीं यह किन्हीं आचार्यों का मत है। परन्तु गुरु के किसी छोटे प्रयोजन वा काम में भी झूठ न बोले क्योंकि आगे पीछे अपनी सात २ पीढ़ी कुल का वह मनुष्य नाश करता है कि जो गुरु से झूठ बोलता है। किसी अन्त्यज नीच स्त्री से जान कर संग करे तो एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करे और बिना जाने संग करे तो बारह दिन तक कृच्छ्रव्रत करे। तथा रजस्वला स्त्री से गमन करे तो तीन दिन प्रायश्चित्त करे ॥ ५ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौबीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२४॥
जिस का दोष प्रसिद्ध न हुआ हो ऐसे गुप्त पापी का प्रायश्चित्त (ऋग्वेद अष्ट० ७ अ० १ । व० १५ तरत्समन्दी० ) इत्यादि चार ऋचाओं का जल में खड़े होकर जप करे। न लेने योग्य दान को लेना चाहता हुआ वा ले कर तथा अभक्ष्य वस्तु को खाना चाहता हुआ थोड़े जुते पृथिवी का दान करे। यदि ऋतु काल से भिन्न समय स्त्री में गमन करे तो कोई आचार्य स्नान करने मात्र से शुद्धि मानते हैं। स्त्रियों में गर्भपात करने पर पहिले दशदिन तक दूध का व्रत करे, फिर दूसरे दश दिन तक गोघृत ही खावे, फिर तीसरे दश दिन तक केवल जल पीके रहे। फिर प्रातःकाल दश दिन
भाषाधर्मसंहिता ॥ ६५
हुभिस्तृतीयं दिवादित्वेकभक्तको जलक्लिन्नवासा लोमा-
नि, नखानि, त्वचं, मांसं, शोणितं, स्नायु, अस्थि, मज्जान-
मिति होम आत्मनो मुखे मृत्योरास्ये जुहोमीत्यन्ततः
॥ १ ॥ सर्वेषामेतत्प्रायश्चित्तं भ्रूणहत्यायाः ॥ २ ॥ अथान्यदु-
क्तो नियमोऽग्ने त्वं पारयेति महाव्याहृतिभिर्जुहुयात्कूष्मा-
ण्डैश्चाज्यं तद्व्रतएव वा ब्रह्महत्यासुरापानस्तेयगुरुतल्पेषु
प्राणायामैः स्नानोऽघमर्षणं जपेत् सममश्वमेधावभृथेन सा-
वित्रीं वा सहस्रकृत्व आवर्तयन् पुनीते हैवात्मानमन्तर्जले
वाऽघमर्षणं त्रिरावर्तयन् पापेभ्यो मुच्यते मुच्यते ॥ ३ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥
तदाहुः कनिष्ठोऽवकीर्णी प्रविशतीति मरुतः प्राणेनेन्द्रं बलेन
तक एकबार खाय, जलमें भिगा ये हुए वस्त्र पहिना करे और (लोमानि
स्वाहा ) इत्यादि मन्त्रों से आठ आहुति घी का होम करके (आ-
त्मनो० जुहोमि स्वाहा) इससे अन्त की आहुति देवे ॥ १ ॥ जो कोई
भ्रूणहत्या करे उन सभों का यहां प्रायश्चित्त है ॥२॥ इसके अनन्तर अन्य नियम यह
कहा है कि (अग्ने त्वं पारया० ऋ०म० १ सू० १८८ । मं० २) इस ऋचा के साथ तीन
महाव्याहृति लगाकर और कूष्माण्ड मन्त्रों से घी का होम करे । तथा ब्रह्म-
हत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, और गुरुपत्नीगमन इन महापातकों में भी
उसी पूर्वोक्त दश दिन दूध का व्रतादि कर के स्नान करने पश्चात् प्राणायामों
के साथ अघमर्षण सूक्त का जप करे तो यह काम अश्वमेध सम्बन्धी अवभृथ
स्नान के तुल्य पापों का नाश करनेवाला है। वा नित्य नियम से एक हज़ार
गायत्री का जप करता हुआ अपने को पवित्र ही कर लेता है । अथवा निरन्तर
जलाशय के भीतर डुबकी लगाके अघमर्षण सूक्त की तीन आवृत्ति करे तो
पापों से छूट जाता है ॥ ३५ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पच्चीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२५॥
अब यह कहते हैं कि किस प्रकार से अवकीर्णी (ब्रह्मचर्य व्रत के भीतर
व्यभिचार करनेवाले ) का तेज घटता है वा हानि होती है। मरुत् देवतों में
६६ | गौतमस्मृतिः ॥
बृहस्पतिं ब्रह्मवर्चसेनाग्निमेवेतरेण सर्वेणेति सोऽमावास्यायां निश्यग्निमुपसमाधाय प्रायश्चित्ताज्याहुतीर्जुहोति कामाव- कीर्णोऽस्म्यवकीर्णोऽस्मि कामकामाय स्वाहा,कामाभिदुग्धो- ऽस्म्यभिदुग्धोऽस्मि कामकामाय स्वाहेति समिधमाधायानु- पर्युक्ष्य यज्ञवास्तु कृत्वोपस्थाय संमासिञ्चन्त्वित्येतया त्रिस्- पतिष्ठेत । त्रय इमे लोका एषां लोकानामभिजित्याअभि- क्रान्त्या इत्येतदेवैकेषां कर्माधिकृत्य पूतइव स्यात्सङ्गत्यं जुहुयादित्थमनुमन्त्रयेद् वरो दक्षिणेति॥१॥ प्रायश्चित्तमविशे- षाऽनाऽर्जवपैशुनप्रतिषिद्धाचारानाद्यप्राशनेषु ॥ २॥ शूद्रायां च रेतः सिक्त्वाऽयोनौ च दोषवति कर्मण्यभिसन्धिपूर्वेऽ- प्यलिङ्गाभिरपउपस्पृशेद्वारुणीभिरन्यैर्वा पवित्रैः प्रतिषिद्ध-
वाक्शक्ति, इन्द्र देवतामें बल, बृहस्पति में ब्रह्म तेज और अन्य सब शक्ति- यां अग्नि देवता में खिंचकर चली जाती हैं । इसलिये वह अवकीर्णी पुरुष अमावस्या की रात के समय अग्नि को स्थापित करके ( कामाव० ) इत्यादि दो मन्त्रों से दो प्रायश्चित्ताहुति होम करके अग्नि में प्रजापति के ध्या- नपूर्वक समिधा चढ़ाके द्वितीयवार ईशान कोण से लेकर प्रदक्षिण पर्युक्षण कर यज्ञशाला की कल्पना करके गृहाभिमानी देवता का उपस्थान ( गृहामा० ) इत्यादि मन्त्रों से करके ( संमासिञ्चन्तु० ) इस ऋचा से तीन बार स्तुति करे । किन्ही आचार्यों का मत है कि (त्रयइमेलोका०) इत्यादि श्रुति से उपस्थान करे । जो पुरुष मानस, वाचिक, कायिक रूप से अधिकांश शुद्ध हो वही इस उक्त प्रकार से होम और अनुमन्त्रण वा उपस्थान करे और दक्षिणा में ऋत्वि- जों को सुवर्णादि धन देवे ॥ १ ॥ कठोरता, चुगली, निन्दा, शास्त्र में निषेध किये काम को करने और अभक्ष्य के भक्षण में ॥२॥ तथा शूद्रा स्त्री के साथ संग करके और योनि से भिन्न स्थल में वीर्य पात करके तथा आसक्ति या आग्रह के सा- थ किसी दोष युक्त काम में प्रवृत्त होकर अप् ( जलवाचक ) चिन्ह जिनमें हो वा वरुण देवतावाली ऋचाओं से अथवा अन्य पवित्र मन्त्रों से होमादि प्रायश्चित्त करे । वाणी तथा मनके द्वारा निषिद्ध आचरण करनेपर पांच वा सब व्याहृतियोंद्वारा जल का आचमन करे और ( अहश्चमा० ) मन्त्र से