भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषाधर्मसंहिता ॥ ६५

हुभिस्तृतीयं दिवादित्वेकभक्तको जलक्लिन्नवासा लोमा-
नि, नखानि, त्वचं, मांसं, शोणितं, स्नायु, अस्थि, मज्जान-
मिति होम आत्मनो मुखे मृत्योरास्ये जुहोमीत्यन्ततः
॥ १ ॥ सर्वेषामेतत्प्रायश्चित्तं भ्रूणहत्यायाः ॥ २ ॥ अथान्यदु-
क्तो नियमोऽग्ने त्वं पारयेति महाव्याहृतिभिर्जुहुयात्कूष्मा-
ण्डैश्चाज्यं तद्व्रतएव वा ब्रह्महत्यासुरापानस्तेयगुरुतल्पेषु
प्राणायामैः स्नानोऽघमर्षणं जपेत् सममश्वमेधावभृथेन सा-
वित्रीं वा सहस्रकृत्व आवर्तयन् पुनीते हैवात्मानमन्तर्जले
वाऽघमर्षणं त्रिरावर्तयन् पापेभ्यो मुच्यते मुच्यते ॥ ३ ॥

इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥

तदाहुः कनिष्ठोऽवकीर्णी प्रविशतीति मरुतः प्राणेनेन्द्रं बलेन


तक एकबार खाय, जलमें भिगा ये हुए वस्त्र पहिना करे और (लोमानि
स्वाहा ) इत्यादि मन्त्रों से आठ आहुति घी का होम करके (आ-
त्मनो० जुहोमि स्वाहा) इससे अन्त की आहुति देवे ॥ १ ॥ जो कोई
भ्रूणहत्या करे उन सभों का यहां प्रायश्चित्त है ॥२॥ इसके अनन्तर अन्य नियम यह
कहा है कि (अग्ने त्वं पारया० ऋ०म० १ सू० १८८ । मं० २) इस ऋचा के साथ तीन
महाव्याहृति लगाकर और कूष्माण्ड मन्त्रों से घी का होम करे । तथा ब्रह्म-
हत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, और गुरुपत्नीगमन इन महापातकों में भी
उसी पूर्वोक्त दश दिन दूध का व्रतादि कर के स्नान करने पश्चात् प्राणायामों
के साथ अघमर्षण सूक्त का जप करे तो यह काम अश्वमेध सम्बन्धी अवभृथ
स्नान के तुल्य पापों का नाश करनेवाला है। वा नित्य नियम से एक हज़ार
गायत्री का जप करता हुआ अपने को पवित्र ही कर लेता है । अथवा निरन्तर
जलाशय के भीतर डुबकी लगाके अघमर्षण सूक्त की तीन आवृत्ति करे तो
पापों से छूट जाता है ॥ ३५ ॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पच्चीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२५॥

अब यह कहते हैं कि किस प्रकार से अवकीर्णी (ब्रह्मचर्य व्रत के भीतर
व्यभिचार करनेवाले ) का तेज घटता है वा हानि होती है। मरुत् देवतों में

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