अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावार्थसंहिता ॥ ६३
प्रकाशं पुमांसं घातयेत्पृथुक्तं वा गर्दभेनावकीर्णी निरृतिं चतुष्पथे यजेत तस्याजिनमूर्ध्वबालं परिधाय लोहितपात्रः सप्त गृहान् भैक्षं चरेत् कर्माचक्षाणः संवत्सरेण शुध्येत् ॥४॥ रेतस्कन्दने भये रोगे स्वप्नेऽग्नीन्धनभैक्षचरणानि सप्तरात्रं कृत्वाऽऽज्यहोमः सामिसन्धेर्वा रेतस्याभ्यां सूर्याभ्युदिते ब्रह्मचारी तिष्ठेदहरभुञ्जानोऽभ्यस्तमिते च रात्रिं जपन् सावित्रिमशुचिं दृष्ट्वाऽऽदित्यमीक्षेत प्राणायामं कृत्वाऽमेध्यप्राशने वाऽभोज्यभोजने निष्पुरीषीभावस्त्रिरात्रावरमभोजनं सप्तरात्रं वा स्वयं शीर्णान्युपयुञ्जानः फलान्यनतिक्रामन् प्राक्पञ्चनखे-
करके किसी नीच वर्णसे संयोग करे तो राजा बहुत से जन समुदाय में उस पापिनों को शिकारी कुत्तोंसे खिंचवा डाले। और उस नीच पापी कोभी जन समुदाय में कटवादे वा तपाई हुई लोहेकी खटिया पर लिटाके जलवादेवे। जो ब्राह्मणादि द्विज किसी व्रत में ब्रह्मचारी रहने का पूर्ण संकल्प करके बीच में स्त्री संयोग करे वह अवकीर्णी कहाता है। वह अवकीर्णी पुरुष काने गर्दभ से चौराहे पर निर्ऋति देवता का रात में यज्ञ करे। ऊपर को बाल करके उस के चर्म को ओढ़कर लालपात्र हाथ में लिये अपने पाप को कहता हुआ एक वर्ष तक सात घर से भिक्षा मांग के खावे तब शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ वीर्यपात होने पर, भय, रोग और दुःस्वप्न के समय ब्रह्मचारी के नियम और चिन्ह धारण करके सात दिन तक भिक्षा मांगकर भोजन और समिदाधान ठीक नियम से करता हुआ सामान्यार्थ वाले मन्त्र से वा (यजु० अ० १९ । १६) के (रेतोमूत्रं०) इत्यादि दो मन्त्रों से घी का होम करे। भोजन कुछ न करके दिन में खड़ा रहे और सूर्योस्त होने पर रात्रि में सावित्री गायत्री का जप करता हुआ खड़ा रहे। अशुद्ध वस्तु के दीखने पर प्राणायाम करके सूर्य्य नारायण का दर्शन करे। अपवित्र वा अभक्ष्य वस्तु के खानेने पर कम से कम तीन दिन भोजन न करे और विरेचक वस्तु खाकर मल को निकाल देवे अथवा नियम का उल्लङ्घन न करता हुआ सात दिन तक वृक्ष से स्वयं गिरे हुए केवल फलों को खाकर प्रायश्चित्त करे। पांच नखों वाले श्वाविधादि पांच को छोड़ के अन्य जीवों का मांस खावे तो उस का वमन करके गोघृत का प्राशन करे। गाली देने, झूठ बोलने और किसी को मारने पीटने पर
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