अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भावार्थसंहिता ॥ ६३
प्रकाशं पुमांसं घातयेत्पृथुक्तं वा गर्दभेनावकीर्णी निरृतिं चतुष्पथे यजेत तस्याजिनमूर्ध्वबालं परिधाय लोहितपात्रः सप्त गृहान् भैक्षं चरेत् कर्माचक्षाणः संवत्सरेण शुध्येत् ॥४॥ रेतस्कन्दने भये रोगे स्वप्नेऽग्नीन्धनभैक्षचरणानि सप्तरात्रं कृत्वाऽऽज्यहोमः सामिसन्धेर्वा रेतस्याभ्यां सूर्याभ्युदिते ब्रह्मचारी तिष्ठेदहरभुञ्जानोऽभ्यस्तमिते च रात्रिं जपन् सावित्रिमशुचिं दृष्ट्वाऽऽदित्यमीक्षेत प्राणायामं कृत्वाऽमेध्यप्राशने वाऽभोज्यभोजने निष्पुरीषीभावस्त्रिरात्रावरमभोजनं सप्तरात्रं वा स्वयं शीर्णान्युपयुञ्जानः फलान्यनतिक्रामन् प्राक्पञ्चनखे-
करके किसी नीच वर्णसे संयोग करे तो राजा बहुत से जन समुदाय में उस पापिनों को शिकारी कुत्तोंसे खिंचवा डाले। और उस नीच पापी कोभी जन समुदाय में कटवादे वा तपाई हुई लोहेकी खटिया पर लिटाके जलवादेवे। जो ब्राह्मणादि द्विज किसी व्रत में ब्रह्मचारी रहने का पूर्ण संकल्प करके बीच में स्त्री संयोग करे वह अवकीर्णी कहाता है। वह अवकीर्णी पुरुष काने गर्दभ से चौराहे पर निर्ऋति देवता का रात में यज्ञ करे। ऊपर को बाल करके उस के चर्म को ओढ़कर लालपात्र हाथ में लिये अपने पाप को कहता हुआ एक वर्ष तक सात घर से भिक्षा मांग के खावे तब शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ वीर्यपात होने पर, भय, रोग और दुःस्वप्न के समय ब्रह्मचारी के नियम और चिन्ह धारण करके सात दिन तक भिक्षा मांगकर भोजन और समिदाधान ठीक नियम से करता हुआ सामान्यार्थ वाले मन्त्र से वा (यजु० अ० १९ । १६) के (रेतोमूत्रं०) इत्यादि दो मन्त्रों से घी का होम करे। भोजन कुछ न करके दिन में खड़ा रहे और सूर्योस्त होने पर रात्रि में सावित्री गायत्री का जप करता हुआ खड़ा रहे। अशुद्ध वस्तु के दीखने पर प्राणायाम करके सूर्य्य नारायण का दर्शन करे। अपवित्र वा अभक्ष्य वस्तु के खानेने पर कम से कम तीन दिन भोजन न करे और विरेचक वस्तु खाकर मल को निकाल देवे अथवा नियम का उल्लङ्घन न करता हुआ सात दिन तक वृक्ष से स्वयं गिरे हुए केवल फलों को खाकर प्रायश्चित्त करे। पांच नखों वाले श्वाविधादि पांच को छोड़ के अन्य जीवों का मांस खावे तो उस का वमन करके गोघृत का प्राशन करे। गाली देने, झूठ बोलने और किसी को मारने पीटने पर
९
६४ गौतमस्मृतिः ॥
ऽभ्यश्छर्दिनो घृतप्राशनं चाक्रोशानृतहिंसासु त्रिरात्रं परम्- न्तपःसत्यवाक्ये वारुणीपावमनीभिर्होमो विवाहमैथुननिर्मा- त्संयोगेष्वदोषमेकेऽनृतं न तु खलु गुर्वर्थेषु यतः सप्त पुरुषा- नितश्च परंश्च हन्ति मनसापि गुरोरनृतं वदन्नल्पेष्व- प्यपध्वन्त्यावसायिनीगमने कृच्छ्राब्दोऽमत्या द्वादशरात्रमु- दक्यागमने त्रिरात्रं त्रिरात्रम् ॥ ५ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥२४॥
रहस्यं प्रायश्चित्तमविख्यातदोषस्य चतस्रऋचं तरत्सम- न्दीत्यप्सु जपेदप्रतिग्राह्यं प्रतिजिघृक्षन् प्रतिगृह्य वाऽभोज्यं बुभुक्षमाणः पृथिवीमावपेद्गत्वन्तराग्ममाण्डुकीपरस्पर्शा- च्छुद्धिमेके स्त्रीषु पयोव्रतो वा दशरात्रं घृतेन द्वितीयम्
अपराधी मनुष्य सत्य बोलने में परम तप वा पुण्य मानता हुआ सत्य कहे तो वरुण देवता वाली और पावमानी ऋचाओं से तीन दिन तक होम करे। विवाह और मैथुन की सिद्धि वा प्राप्ति के लिये मिथ्या भाषण में दोष नहीं यह किन्हीं आचार्यों का मत है। परन्तु गुरु के किसी छोटे प्रयोजन वा काम में भी झूठ न बोले क्योंकि आगे पीछे अपनी सात २ पीढ़ी कुल का वह मनुष्य नाश करता है कि जो गुरु से झूठ बोलता है। किसी अन्त्यज नीच स्त्री से जान कर संग करे तो एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करे और बिना जाने संग करे तो बारह दिन तक कृच्छ्रव्रत करे। तथा रजस्वला स्त्री से गमन करे तो तीन दिन प्रायश्चित्त करे ॥ ५ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौबीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥२४॥
जिस का दोष प्रसिद्ध न हुआ हो ऐसे गुप्त पापी का प्रायश्चित्त (ऋग्वेद अष्ट० ७ अ० १ । व० १५ तरत्समन्दी० ) इत्यादि चार ऋचाओं का जल में खड़े होकर जप करे। न लेने योग्य दान को लेना चाहता हुआ वा ले कर तथा अभक्ष्य वस्तु को खाना चाहता हुआ थोड़े जुते पृथिवी का दान करे। यदि ऋतु काल से भिन्न समय स्त्री में गमन करे तो कोई आचार्य स्नान करने मात्र से शुद्धि मानते हैं। स्त्रियों में गर्भपात करने पर पहिले दशदिन तक दूध का व्रत करे, फिर दूसरे दश दिन तक गोघृत ही खावे, फिर तीसरे दश दिन तक केवल जल पीके रहे। फिर प्रातःकाल दश दिन
भाषाधर्मसंहिता ॥ ६५
हुभिस्तृतीयं दिवादित्वेकभक्तको जलक्लिन्नवासा लोमा-
नि, नखानि, त्वचं, मांसं, शोणितं, स्नायु, अस्थि, मज्जान-
मिति होम आत्मनो मुखे मृत्योरास्ये जुहोमीत्यन्ततः
॥ १ ॥ सर्वेषामेतत्प्रायश्चित्तं भ्रूणहत्यायाः ॥ २ ॥ अथान्यदु-
क्तो नियमोऽग्ने त्वं पारयेति महाव्याहृतिभिर्जुहुयात्कूष्मा-
ण्डैश्चाज्यं तद्व्रतएव वा ब्रह्महत्यासुरापानस्तेयगुरुतल्पेषु
प्राणायामैः स्नानोऽघमर्षणं जपेत् सममश्वमेधावभृथेन सा-
वित्रीं वा सहस्रकृत्व आवर्तयन् पुनीते हैवात्मानमन्तर्जले
वाऽघमर्षणं त्रिरावर्तयन् पापेभ्यो मुच्यते मुच्यते ॥ ३ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥
तदाहुः कनिष्ठोऽवकीर्णी प्रविशतीति मरुतः प्राणेनेन्द्रं बलेन
तक एकबार खाय, जलमें भिगा ये हुए वस्त्र पहिना करे और (लोमानि
स्वाहा ) इत्यादि मन्त्रों से आठ आहुति घी का होम करके (आ-
त्मनो० जुहोमि स्वाहा) इससे अन्त की आहुति देवे ॥ १ ॥ जो कोई
भ्रूणहत्या करे उन सभों का यहां प्रायश्चित्त है ॥२॥ इसके अनन्तर अन्य नियम यह
कहा है कि (अग्ने त्वं पारया० ऋ०म० १ सू० १८८ । मं० २) इस ऋचा के साथ तीन
महाव्याहृति लगाकर और कूष्माण्ड मन्त्रों से घी का होम करे । तथा ब्रह्म-
हत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, और गुरुपत्नीगमन इन महापातकों में भी
उसी पूर्वोक्त दश दिन दूध का व्रतादि कर के स्नान करने पश्चात् प्राणायामों
के साथ अघमर्षण सूक्त का जप करे तो यह काम अश्वमेध सम्बन्धी अवभृथ
स्नान के तुल्य पापों का नाश करनेवाला है। वा नित्य नियम से एक हज़ार
गायत्री का जप करता हुआ अपने को पवित्र ही कर लेता है । अथवा निरन्तर
जलाशय के भीतर डुबकी लगाके अघमर्षण सूक्त की तीन आवृत्ति करे तो
पापों से छूट जाता है ॥ ३५ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पच्चीशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२५॥
अब यह कहते हैं कि किस प्रकार से अवकीर्णी (ब्रह्मचर्य व्रत के भीतर
व्यभिचार करनेवाले ) का तेज घटता है वा हानि होती है। मरुत् देवतों में
६६ | गौतमस्मृतिः ॥
बृहस्पतिं ब्रह्मवर्चसेनाग्निमेवेतरेण सर्वेणेति सोऽमावास्यायां निश्यग्निमुपसमाधाय प्रायश्चित्ताज्याहुतीर्जुहोति कामाव- कीर्णोऽस्म्यवकीर्णोऽस्मि कामकामाय स्वाहा,कामाभिदुग्धो- ऽस्म्यभिदुग्धोऽस्मि कामकामाय स्वाहेति समिधमाधायानु- पर्युक्ष्य यज्ञवास्तु कृत्वोपस्थाय संमासिञ्चन्त्वित्येतया त्रिस्- पतिष्ठेत । त्रय इमे लोका एषां लोकानामभिजित्याअभि- क्रान्त्या इत्येतदेवैकेषां कर्माधिकृत्य पूतइव स्यात्सङ्गत्यं जुहुयादित्थमनुमन्त्रयेद् वरो दक्षिणेति॥१॥ प्रायश्चित्तमविशे- षाऽनाऽर्जवपैशुनप्रतिषिद्धाचारानाद्यप्राशनेषु ॥ २॥ शूद्रायां च रेतः सिक्त्वाऽयोनौ च दोषवति कर्मण्यभिसन्धिपूर्वेऽ- प्यलिङ्गाभिरपउपस्पृशेद्वारुणीभिरन्यैर्वा पवित्रैः प्रतिषिद्ध-
वाक्शक्ति, इन्द्र देवतामें बल, बृहस्पति में ब्रह्म तेज और अन्य सब शक्ति- यां अग्नि देवता में खिंचकर चली जाती हैं । इसलिये वह अवकीर्णी पुरुष अमावस्या की रात के समय अग्नि को स्थापित करके ( कामाव० ) इत्यादि दो मन्त्रों से दो प्रायश्चित्ताहुति होम करके अग्नि में प्रजापति के ध्या- नपूर्वक समिधा चढ़ाके द्वितीयवार ईशान कोण से लेकर प्रदक्षिण पर्युक्षण कर यज्ञशाला की कल्पना करके गृहाभिमानी देवता का उपस्थान ( गृहामा० ) इत्यादि मन्त्रों से करके ( संमासिञ्चन्तु० ) इस ऋचा से तीन बार स्तुति करे । किन्ही आचार्यों का मत है कि (त्रयइमेलोका०) इत्यादि श्रुति से उपस्थान करे । जो पुरुष मानस, वाचिक, कायिक रूप से अधिकांश शुद्ध हो वही इस उक्त प्रकार से होम और अनुमन्त्रण वा उपस्थान करे और दक्षिणा में ऋत्वि- जों को सुवर्णादि धन देवे ॥ १ ॥ कठोरता, चुगली, निन्दा, शास्त्र में निषेध किये काम को करने और अभक्ष्य के भक्षण में ॥२॥ तथा शूद्रा स्त्री के साथ संग करके और योनि से भिन्न स्थल में वीर्य पात करके तथा आसक्ति या आग्रह के सा- थ किसी दोष युक्त काम में प्रवृत्त होकर अप् ( जलवाचक ) चिन्ह जिनमें हो वा वरुण देवतावाली ऋचाओं से अथवा अन्य पवित्र मन्त्रों से होमादि प्रायश्चित्त करे । वाणी तथा मनके द्वारा निषिद्ध आचरण करनेपर पांच वा सब व्याहृतियोंद्वारा जल का आचमन करे और ( अहश्चमा० ) मन्त्र से
भाषार्थसहिता ॥ ६१
वाङ्मनसयोरपचारे व्याहृतयः संख्याताः पञ्च सर्वास्वपो- वाचामेदहश्च मादित्यश्च पुनातु स्वाहेति प्रातः, रात्रिश्च मा वरुणश्च पुनाविति सायमष्टौ वा समिधआदध्याद्देवकृत- स्येति हुत्वैवं सर्वस्मादेनसो मुच्यते मुच्यते ॥ ३ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षड्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २६ ॥
अथातः कृच्छ्रान् व्याख्यास्यामो हविष्यान्प्रातराशान् भुक्त्वा तिस्रो रात्रीर्नाश्नीयादथापरं त्र्यहं नक्तं भुञ्जीत, अ- थापरं त्र्यहं न कंचन याचेदथापरं त्र्यहमुपवसेत्तिष्ठेदहनि रात्रावासीत क्षिप्रकामः सत्यं वदेदनार्यैन संभाषेत रौरवयौ- धाजिने नित्यं प्रयुञ्जीतानुसवनमुदकोपस्पर्शनमापोहिष्ठे- ति तिसृभिः पवित्रवतीभिर्मार्जयेत्, हिरण्यवर्णाः शुचयः पा- वकाइत्यष्टाभिः॥१॥अथोदकतर्पणम्-ॐनमोह्माय मोह्माय
प्रातःकाल तथा ( रात्रिश्चमा० ) मन्त्र से सायंकाल में होम करे । अथवा दो मन्त्र ये और ( देवकृतस्यै० यजु० अ०८ । १३ ) के छः मन्त्र इन सब से आठ समिधा अग्नि में चढ़ावे ऐसा करने से सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥३॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छब्बीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥
अब यहां से आगे कृच्छ्रव्रतों का व्याख्यान करेंगे। प्रातःकाल पहिले प्रारम्भ के दिन हविष्यान्न भोजन करके आगे तीन रात्री बीतने तक कुछ भोजन न करे । इसके पश्चात् तीन दिन रात्रि में भोजन करे । इसके पश्चात् तीन दिन किसी से कुछ याचना करके न खावे किन्तु यदि बिना मांगे जो मिले वही खा लेवे । इस के बाद तीन दिन उपवास करे कुछ न खावे, दिन में खड़ा रहे रात में बैठा रहे । शीघ्र ही पाप निवृत्ति और शुभफल प्राप्ति चाहता हो तो सत्य ही बोले और शूद्रादि नीचों के साथ संभाषण न करे । रुरु (रोज) और योध नामक मृगों के चम वस्त्र की जगह ओढ़े । सायं प्रातः और मध्यान्ह में तीनों बार ( आपोहिष्ठा० ) इत्यादि तीन मन्त्रों से स्नान करे और ( हिरण्यवर्णाः शुचयः पावकाः० ) इत्यादि आठ मन्त्रों से नित्य मार्जन करे ॥ १ ॥ फिर ( ओं नमोहमाय० ) इत्यादि मन्त्रों को पढ़ता हुआ प्रत्येक नमः
६८ गौतमस्मृतिः ॥
संहमाय धुन्वते तापसाय पुनर्वसवे नमोनमो मौञ्ज्यायो- र्म्याय वसुविन्दाय सर्वविन्दाय नमोनमः पाराय सुपाराय महापाराय पारयिष्णवे नमोनमो रुद्राय पशुपतये महते देवाय त्र्यम्बकायैकचराधिपतये हराय शर्वायेशानायोग्राय वज्रिणे घृणिने कपर्दिने नमोनमः सूर्यायादित्याय नमोनमो नीलग्रीवाय शितिकण्ठाय नमो नमः कृष्णाय पिङ्गलाय नमो नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय वृद्धायेन्द्राय हरिकेशायोर्ध्वरेतसे नमो नमः सत्याय पावकाय पावकवर्णाय नमो नमः कामाय का- मरूपिणे नमोनमो दीप्ताय दीप्तरूपिणे नमोनमस्तीक्ष्णाय तीक्ष्णरूपिणे नमोनमः सौम्याय सुपुरुषाय महापुरुषाय म- ध्यमपुरुषायोत्तमपुरुषाय नमोनमो ब्रह्मचारिणे नमोनमश्च- न्द्रललाटाय नमोनमः कृत्तिवाससे पिनाकहस्ताय नमोनम इति ॥ २ ॥ एतदेवादित्योपस्थानमेताएवाज्याहुतयो द्वादश- रात्रस्यान्ते चरुं श्रपयित्वैताभ्यो देवताभ्यो जुहुयात्-अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा, इन्द्राग्निभ्या- मिन्द्राय विश्वेभ्यो देवेभ्यो ब्रह्मणे प्रजापतयेऽग्नये स्विष्टकृत इति ॥ ३ ॥ ततो ब्राह्मणतर्पणम् ॥४॥ एतेनैवातिकृच्छ्रो व्या- ख्यातो यावत्सकृदाददीत तावदश्नीयादब्भक्षस्तृतीयः स कृ-
के साथ जल से शिव जी के लिये देवतर्पण करे ॥ २ ॥ इन्हीं मन्त्रों से सूर्यो- पस्थान तथा इन्हीं से घी की आहुति देवे यहां तक का सब कृत्य प्रतिपादन करे । कृच्छ्र व्रत के बारहवें दिन समाप्ति में गृह्यसूत्रोक्त विधि से चरु पका कर ( अग्नये स्वाहा ) इत्यादि मन्त्रों से चरु की दश आहुति देवे ॥ ३ ॥ इस के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजनादि से तृप्त करे ॥ ४ ॥ इसी क्रम से अति- कृच्छ्र व्रत का व्याख्यान जानो । उस में इतनी विशेषता है कि बीच के छः दिनों में जो भोजन कहा है सो उतना ही एक दिन में खावे कि जितना एक बार में मुख में खासके अर्थात् एक ग्रास मात्र एक दिन में भोजन करे तथा आगे पीछे तीन २ दिन सर्वथा उपवास करे । और जिस में बीच के
भाषार्थसहिता ॥ ६९
च्छ्रातिकृच्छ्रः ॥५॥ प्रथमं चरित्वा शुचिः पूतः कर्मण्यो भव- ति, द्वितीयं चरित्वा यत्किंचिदन्यन्महापातकेभ्यः पापं कुरुते तस्मान्मुच्यते, तृतीयं चरित्वा सर्वस्मादेनसो मुच्यते । अथैतां- स्त्रीन् कृच्छ्रान् चरित्वा सर्व्वेषु वेदेषु स्नातो भवति सर्व्वैर्द्दे- वैर्ज्ञातो भवति यश्चैवं वेद यश्चैवं वेद ॥ ६ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अथातश्चान्द्रायणं तस्योक्तो विधिः कृच्छ्रे वपनं व्रतं चरेत् श्वोभूतां पौर्णमासीमुपवसेत्-आप्यायस्व, संतेपयांसि, नवोनव, इति चैताभिस्तर्पणमाज्यहोमो हविष्प्रद्यानुमन्त्रण- मुपस्थानं चन्द्रमसो यद्देवा देवहेलनमिति चतसृभिश्चाज्यं जुहुयात्, देवकृतस्येति चान्ते समिद्भिः-ॐभूर्भुवः स्वस्तपः,-
छः दिनों में भी केवल जल ही पीकर रहे वह कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत कहाता है ये तीन प्रकार के कृच्छ्र कहाते हैं ॥ ५ ॥ पहिला कृच्छ्रव्रत का करने से शुद्ध पवित्र हुआ धर्म के यज्ञादि शुभ कर्म करने योग्य होता है । द्वितीय अति- कृच्छ्रव्रत का अनुष्ठान करके जो कुछ महापातकों से भिन्न उपपातकादि किये वा करता है उन सब से मुक्त हो जाता है । और तीसरे कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करके छोटे बड़े सभी पापोंने मुक्त शुद्ध निर्दोष होजाता है । और यदि इन तीनों कृच्छ्रों का एक साथ क्रमशः अनुष्ठान करे तो सब वेदों में निष्णात निपुण होता अर्थात् सब वेदों के पढ़ने के पुण्य फल का भागी होता, सब देवता उसको जानते और कृपादृष्टि करते हैं । और जो इन कृच्छ्रों की ऐसी महिमा को यथार्थ जानता है उस को भी यही फल प्राप्त होता है ॥६॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्ताईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२७॥
अब चान्द्रायण व्रत का जैसा विधान धर्मशास्त्रकारों ने कहा माना है सो कहते हैं । चतुर्दशी के दिन चान्द्रायण करने वाला केश शमश्रु सब का मुण्डन कराके केवल शिखामात्र रक्खे । और उसी दिन उपवास करे ओर (आ- प्यायस्वसमेतु० । संसृपयांसि० यजु० अ० १२ । ११२ । ११३ । नवो नवो भवति० ऋ० अ० ८ अ० ३ व० २३ ) इन तीन मन्त्रों से पौर्णमासी के दिन चन्द्रमा दे- वता के लिये तर्पण, घी का होम, हविष्य का अनुमन्त्रण, ( अर्थात् हविष्य
| ७० | गौतमस्मृतिः ॥ |
|---|
सत्यं,यशः, श्रीरूपं गोरोजस्तेजः पुरुषो धर्म्मः शिवशिव इत्ये- तैर्ग्रासानुमन्त्रणं प्रतिमन्त्रं मनसा नमः स्वाहेति वा, सर्वं ग्रासप्रमाणमास्याविकारेण चरुभैक्षसक्तुकणयावकपयोदधि- घृतमूलफलोदकानि हवींष्युत्तरोत्तरं प्रशस्तानि पौर्णमास्यां पञ्चदश ग्रासान् भुक्तवैकापचयेनापरपक्षमश्नीयादमावास्या- यामुपोष्यैकोपचयेन पूर्वपक्षं विपरीतमेकेषाम् ॥ १ ॥ एष चान्द्रायणो मासो मासमेकमाप्त्वा विपापो विपाप्मा सर्वमे- नो हन्ति द्वितीयमाप्त्वा दशपूर्वान्दशावरानात्मानं वैकविंशं
वस्तु को देखते हुए मन्त्र पढ़ना) और उपस्थान करे। तदनन्तर (यद्देवादेव० यजु० अ० २० । १४—१९) इन चार मन्त्रोंसे घी का होम करके (देवकृतस्यै-नसो० यजु० अ० ८ । १३) के छः मन्त्रों द्वारा समिधाओं का होम करके (ओं भूः०) इत्यादि प्रकार—भूः, भुवः, स्वः, तपः, सत्यम्, यशः, श्रीः, रूपम्, गौः, ओजः, तेजः, पुरुषः, धर्मः, शिवः, शिवः, इन प्रत्येक के साथ ओं लगा-कर एक २ को पढ़ २ क्रम से १५ ग्रासों को देखे। और प्रत्येक ग्रास को खाते समय (नमः स्वाहा) ऐसा मन से कहता जावे। जिस में मुख की स्वाभाविक दशा में विकार न हो (अधिक फैलाने न पड़े) वही एक ग्रास का प्रमाण जानो। चरु, (भात) भिक्षा का अन्न, जौ का सत्तू, कण, कुलत्थ, गौ के दूध, दही, घी, मूल, फल, जल, ये सब व्रत में खाने योग्य हविष्यान्न हैं। इन में अगला २ श्रेष्ठ है। पौर्णमासी को पन्द्रह ग्रास खाकर आगे कृष्णपक्ष की प्र-त्येक प्रतिपदादि तिथियों में एक २ ग्रास घटाता जावे। प्रतिपदा को १४ द्वितीया को १३ इत्यादि प्रकार, चतुर्दशी को एक ग्रास खाकर अमावास्या को निराहार उपवास करे। फिर शुक्ल प्रतिपदा से एक २ ग्रास बढ़ाता जाय पौर्णमासी को फिर १५ ग्रास खावे (यही पिपीलिका मध्य चान्द्रायण व्रत कहाता है) किन्हीं ऋषियों का मत है कि कृष्णपक्ष में एक २ ग्रास बढ़ाकर, शुक्ल पक्ष में घटावे (यही यवमध्य चान्द्रायण व्रत है) ॥ १ ॥ यह चान्द्रा-यण एक मासका कहाता है। एक मास व्रत करके पापों से मुक्त होकर सब मलिनता वा अपराधों को नष्ट करता, द्वितीय चान्द्रायण व्रत करके अपने कुल की दश पिछली दश अगली और इक्कीसवें अपने को तथा जिस पङ्क्ति
भाषाभाष्यसहिता ॥ ७१
पङ्क्तीश्च पुनाति संवत्सरमाप्त्वा चन्द्रमसः सलोकतामा- प्नोत्याप्नोति ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
ऊर्ध्वं पितुः पुत्रा ऋक्थं भजेरन् निवृत्ते रजसि मातुर्जीवति चेच्छति सर्व्वं वा पूर्व्वजस्येतरान्विभृयात् पितृवत् ॥ १ ॥ विभागे तु धर्मवृद्धिर्विंशतिभागो ज्येष्ठस्य मिथुनमुभयतो- दद्युक्तो रथो गोवृषः काणखोरकूटखञ्जा मध्यमस्यानेकश्चे- दविर्धान्यायसी गृहमनायुक्तं चतुष्पदाञ्चैकैकं यवीयसः समं चेतरत्सर्व्वं द्वयंशी वा पूर्व्वजः स्यादेकैकमितरेषामेकैकं वा धनरूपं काम्यं पूर्व्वः पूर्व्वो लभेत दशतः पशूनां नैकशफाने- कशफानां वृषभोऽधिको ज्येष्ठस्य ऋषभषोड़शा ज्येष्टिनेयस्य
में बैठ उस को पवित्र कर देता है। और एक वर्ष तक चान्द्रायण व्रत करे तो मरणानन्तर चन्द्रलोक सम्बन्धी स्वर्ग प्राप्त होता है ॥ २ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में अट्ठाईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२८॥
पिता का स्वर्गवास होने वा संन्यासादि द्वारा पृथक् होनेपर पुत्रलोग पिता के धनादि का विभागकर लेवें । अथवा पिताके जीवित विद्यमान रहते भी जब माता का रजोधर्म होना बन्द होजाय तब पिता की इच्छा वा आज्ञा हो तो विभाग करलें । अथवा ज्येष्ठ भ्राता सब धन का मालिक रहे और अन्य सब भाइयों का पिता के तुल्य भरण पोषण करे ॥ १ ॥ यदि सब भाई विभाग करें तो धर्मानुकूल ज्येष्ठ भाई को धनका वीसवां भाग, एकर घोड़ा घोड़ी युक्तरथ और एक बैल इतना अधिक मिलना चाहिये । काणा, लंगड़ा, और एक रुष्ट पुष्ट बैल मध्यम-( मझिले ) भाई को अधिक, यदि मझिले भाई कई हों तो भेड़ें, धान्य ( गेहूं आदि ) लोहे के वस्तु, और घर इनमें जो२ अधिक हों उन में से सब बीचके भाइयों को यथा सम्भव अधिक मिले और एकर बैल सहित गाड़ी छोटे को अधिक दी जावे । इनसे भिन्न जो सामान रहा वह सब को बराबर मिले। अथवा दो भाग ज्येष्ठ भाई लेवे तथा अन्य सबको एक२ भाग मिलें। अथवा छोटे२ भाई की अपेक्षा एक२ धनरूप-मूल्यवान् अंश बड़े२ सब को अधिक मिले। अथवा दश घोड़े और बैलों में से एक बैल ज्येष्ठ भाई को अधिक दिया जावे। सबसे बड़ी पिता की स्त्री के बड़े पुत्र को एक बैल तथा १५ अन्य पशु अधिक मिलें। अथवा उसकी बराबर हो उ-
७२ गौतमस्मृतिः ॥
समं वा ज्यैष्ठिनेयेन यवीयसां प्रतिमातृ वा स्ववर्गे भाग विशेषः ॥ २ ॥
पितोत्सृजेत् पुत्रिकामनपत्योऽग्निं प्रजापतिं चेष्ट्वाऽस्मदर्थमपत्यमिति संवाद्याभिसन्धिमात्रात्पुत्रिकेत्येकेषां तत्संशयान्नोपयच्छेद्भ्रातृकाम् ॥ ३ ॥
पिण्डगोत्रर्षिसम्बन्धादृक्थं भजेरन् स्त्री चानपत्यस्य बीजं वा लिप्सेद् देवरवत्यन्यतो जातमभागम् ॥४॥
स्त्रीधनं दुहितृणामप्रत्तानामप्रतिष्ठितानां च भगिनी शुल्कं सोदर्याणामूर्ध्वं मातुः पूर्वं चैके ॥ ५ ॥
संसृष्टविभागः प्रेतानां ज्येष्ठस्य संसृष्टिनि प्रेतेऽसंसृष्टी ऋक्थभाक् विभक्तजः पित्र्यमेव ॥ ६ ॥ स्वयंम-
सके छोटे सहोदर भाइयों को मिले। अथवा प्रत्येक माता के ज्येष्ठ २ भाई को पिता यथोचित अधिक भाग देवे ॥ २ ॥
जिसके कोई पुत्र न हो किन्तु कन्या हो वह अग्नि और प्रजापति देवता के लिये आहुति देकर संकल्प करे कि इस कन्या को मैं पुत्र के स्थान में करता हूं जो पुत्र इस में होगा वही मेरा श्राद्धादि कर्म करेगा। कोई आचार्य कहते हैं कि ( इकरारनामा ) न करने पर मनसे मान लेने मात्र से भी कन्या उसकी पुत्रिका हो जाती है कि जिसके कोई पुत्र न हो। इसी कारण पिता की पुत्रिका हो जाने की शंका से उस कन्या से विवाह न करे जिसके कोई भाई न हो ॥ ३ ॥
जिसके पुत्र कन्या कोई भी न हो उसके धनादि को उसके सपिण्डवाले, वा सगोत्री अथवा वेद विद्या सम्बन्धी गुरु शिष्यादि लेवें और उसकी स्त्री को भी पति का धनादि मिलना चाहिये। अथवा स्त्री के कोई खास देवर हो तो वह नियोग विधि से वीर्य दान ले लेवे। अन्य गैर मनुष्य से सन्तान पैदा करे तो वह धन का भागी न होगा ॥ ४ ॥
जो माता का निज का स्त्रीधन हो उसको लेने का अधिकार बिना बिवाही या विवाहित दीन दुःखित लड़कियों का है। और सहोदर बहन के विवाह में कन्या के माता पिता ने जो धन लिया हो वह भी माता के मरने पर उन्हीं लड़कियों का होगा। कोई आचार्य कहते हैं कि माता की विद्यमानता में ही वह धन लड़कियों का हो जाता है ॥५॥
विभाग हो जाने पर फिर से जितने साफे में कोई व्यापार किया हो उनके मरजाने पर ज्येष्ठ भाई को उनका भाग मिलेगा। यदि ज्येष्ठ भी साझीदार हो के साथ ही समाप्त हो गया हो तो जो साझीदार नहीं थे उन अन्य भाइयों को वह भाग मिलना चाहिये। भाइयों का विभाग होजाने पर जो अन्य पुत्र उत्पन्न हो तो उसको वही धन का भाग मिलेगा जो पिता के अधिकार में हो ॥६॥ वैद्य भाई ने पैदा किये धन में से अपने अवैद्य भाइयों को भलेही भाग न
भाषार्थसंहिता ॥ १३
र्जितमवैद्येभ्यो वैद्यः कामं न दद्यात् ॥७॥ अवैद्याः समं विभ-
जेरन् ॥८॥ पुत्रा औरसक्षेत्रजदत्तकृत्रिमगूढोत्पन्नापविद्धा ऋ-
क्थभाजः कानीनसहोढपौनर्भवपुत्रिकापुत्रस्वयंदत्तक्रीता गो-
त्रभाजश्चतुर्थांशिनश्चौरसाद्यभावे ब्राह्मणस्य राजन्यापुत्रो
ज्येष्ठो गुणसंपन्नस्तुल्यांशभाग्ज्येष्ठांशहीमन्यदूराजन्यावैश्या-
पुत्रसमवाये स यथा ब्राह्मणीपुत्रेण क्षत्रियाञ्चेच्छूद्रापुत्रोऽप्यन-
पत्यस्य शुश्रूषुश्चेल्लभेत वृत्तिमूलमन्तेवासिविधिना सवर्णा-
पुत्रोऽप्यन्यायवृत्तो न लभेतेकेषां ब्राह्मणस्याऽनपत्यस्य श्रो-
त्रिया ऋक्थं भजेरन् राजेतरेषां जडक्लीबौ भर्त्तव्यावपत्यं ज-
डस्य भागार्हं शूद्रापुत्रवत् प्रतिलोमास्तूदकयोगक्षेमकृतान्ने-
देव उसमें न्यायानुसार उनका अधिकार नहीं है ॥७॥ वैद्य से भिन्न भाई अन्य मार्ग
से प्राप्त धन का बराबर विभाग कर लेवें ॥८॥ १-औरस-( विवाहिता स्त्री में
उत्पन्न ) २-क्षेत्रज-( वाग्दानान्तर पति के मरने पर देवर से उत्पन्न ) ३-दत्त
(गोदलिया) ४-कृत्रिम-(अपने किसी सजातीय गुण दोषज्ञ सुलक्षण पुत्र गुणयुक्त
को पुत्र नियत करे) ५-गूढोत्पन्न (जिसको स्त्री में किसी अज्ञात पुरुष से उत्पन्न
हुआ) ६-अपविद्ध (माता पिता वा अन्य किसी ने त्यागदिया हो-और बनादि
में जिस को पड़ा मिले तो वह उसी का है ) ये छःपुत्र पिता के धनके भागी
हैं । कानीन (विवाह से पहिले कन्या में उत्पन्न) सहोढ (विवाह के समय जो गर्भ
में हो) पौनर्भव (पुनर्भू स्त्री ने अन्य पुरुष से उत्पन्न किया) पुत्री का पुत्र, स्वयं-
दत्त ( जिस के माता पिता न रहे हों वा उन ने अकारण त्याग दिया हो
तब जिसके शरण में वह आवे ) क्रीत ( जिसके माता पिता को धनादि दे-
कर लिया हो) ये सब कानीनादि अपने गोत्र के माने जावें और अन्यों की
अपेक्षा चतुर्थांश के भागी हैं । ब्राह्मण पुरुष से ब्राह्मणी में उत्पन्न कोई पुत्र
न हो तो क्षत्रिया स्त्री में उत्पन्न पुत्र शुभगुण संयुक्त हो तो ज्येष्ठ माना
जाय और बराबर भाग उसको मिलें । परन्तु क्षत्रिया, वैश्या दोनों स्त्रियों
के पुत्र ब्राह्मण से हों तो ज्येष्ठांश का अधिक भाग किसी को न मिलेगा ।
यदि क्षत्रिय पुरुष से विवाहित वैश्य स्त्री में उत्पन्न हो तो वह ज्येष्ठांश का
भागी होगा । जिस द्विज के कोई अन्य पुत्र न हो तो विवाहित शूद्रा स्त्री
का पुत्र यदि शिष्य के समान पिता की सेवा शुश्रूषा करता हो तो भोजनादि
निर्वाह मात्र जीविका मिलने का अधिकारी है । और किन्हीं आचार्यों का
मत है कि सवर्णा स्त्री से उत्पन्न हुआ भी पुत्र कुमार्गी हो तो उसको कुछ
भी भाग न मिलना चाहिये । जिस ब्राह्मण के कोई सन्तान वा समीपी वा-
रिस ( दायभागी ) न हो उसका धन वेदपाठी ब्राह्मणों को मिलना चाहिये।
७४ गौतमस्मृतिः ॥
ष्वविभागः स्त्रीषु च संयुक्तास्वनाज्ञाते दशावरैः शिष्टैरूहव-
द्भिभिरलुब्धैः प्रशस्तं कार्यम् ॥ ९ ॥ चत्वारश्चतुर्णां पारगा
वेदानां प्रागुत्तमास्त्रयआश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रयएतान्
दशावरान् पांरषदित्याचक्षते, असंम्भवे चैतेषामश्रोत्रियो वै-
दविच्छिष्टो विप्रतिपत्तौ यदाह यतोऽयमप्रभवो भूतानां हिं-
सानुग्रहयोगेषु धम्मिंणां विशेषेण स्वर्गं लोकं धर्मविदाप्नो-
ति ज्ञानाभिनिवेशोऽस्यामिति धर्मो धर्मः ॥ १० ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
समाप्ता चेयं गौतमसंहिता ॥
क्षत्रियादि निर्वंश मनुष्यों का धन राजा लेवे। मूढ़ और नपुंसक सन्तानों को भोजन वस्त्रादि निर्वाहमात्र मिलना चाहिये। पर जड़ (मूढ़) का पुत्र अच्छा हो तो उसको धनका दायभाग मिलना चाहिये। नीचे वर्ण से उत्तम वर्ण की स्त्री में उत्पन्न हुए प्रतिलोम सन्तानों को शूद्रा पुत्र के समान भोजनादि के निर्वाहमात्र जीविका मिले। जल देने, आमदनी लेने, कोषकी रक्षा करने पकाये अन्न में और विवाहित स्त्रियों में से भाग लेने का अधिकार प्रतिलोमा-दि से हुए सन्तानों को नहीं है। यदि प्रायश्चित्तादि किसी विषय में हुए सं-देहका निर्णय धर्मशास्त्रों से न जानाजाय तो विधि पूर्वक गुरु मुखसे वेद पढ़े तर्कशास्त्र में प्रवीण निर्लोभी दश विद्वान् मिलके जो निर्णय करें वही प्रशस्त जानो ॥९॥ आद्योपान्त चारों वेदों को पढ़ने जानने वाले चार (ये चारा उत्तम कोटिमें) ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तीन उत्तम आश्रमी और तीन स्मार्त्तादि धर्म को भिन्न २ अंगोंमें यथावत् जानने वाले इन दश विद्वानों की दशावरा धर्मसभा कहाती है। इन दश का मिलना असम्भव हो तो यद्यपि विधि-पूर्वक जिसने वेद को न पढ़ा हो पर वेद का मर्म जानता हो अन्य शास्त्रों में शिक्षित हो ऐसा एक ही पुरुष धर्मविषयक परस्पर विरुद्ध दो पक्षोंमें जो कुछ कहे वही ठीक माना जावे क्योंकि वेदोक्त धर्म के अभाव में प्राणियों की स्थिति नहीं रह सकती न उत्पत्ति हो सकती है किन्तु प्रलय का मौका आ जाता है। हिंसा और दया के विभागों के लिये धर्मात्माओं में विशेष कर वेदोक्त धर्म का जानने वाला ही धर्मज्ञान और धर्म में तत्पर होने के कारण स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। इसलिये वेद ही धर्म है ॥१०॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के ब्राह्मणसर्वस्व मासिक पत्रसम्पादक पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में उनतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥
और यहगौतमसंहिता भी समाप्त हुई ॥ ओं शान्तिः ॥ ३ ॥
श्रीगणेशानमः ॥
अथशातातपस्मृतिप्रारम्भः
प्रायश्चित्तविहीनानां महापातकिनांनृणाम् ।
नरकान्तेभवेज्जन्म चिन्हाङ्कितशरीरिणाम् ॥ १ ॥
प्रतिजन्मभवेत्तेषां चिन्हंतत्पापसूचितम् ।
प्रायश्चित्तेकृतेयाति पश्चात्तापवतांपुनः ॥ २ ॥
महापातकजंचिन्हं सप्तजन्मनिजायते ।
उपपापोद्भवंपञ्च त्रीणिपापसमुद्भवम् ॥ ३ ॥
दुष्कर्मजानृणांरोगा यान्तिचोपक्रमैःशमम् ।
जप्यैःसुरार्चनैर्होमैर्दानैस्तेषांशमोभवेत् ॥ ४ ॥
पूर्वजन्मकृतंपापं नरकस्यपरिक्षये ।
बाधतेव्याधिरूपेण तस्यजप्यादिभिःशमः ॥ ५ ॥
कुष्ठंचराजयक्ष्माच प्रमेहोग्रहणीतथा ।
जिन ने प्रायश्चित्त नहीं किया ऐसे महापातकी मनुष्यों का नरक भोग के अन्त में महापातकों के चिन्हों से युक्त मनुष्य योनि में जन्म होता है ॥१॥
पातक को जताने वाले चिन्ह जन्म २ में उन लोगों के होते हैं । बार २ प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप करने से वे चिन्ह छूट जाते हैं ॥ २ ॥
महापातक का चिन्ह सात जन्म तक, उपपातक का पांच जन्म तक, और अन्य साधारण पापों का चिन्ह तीन जन्म तक प्रकट होता है ॥ ३ ॥
निन्दित कर्म से पैदा हुये रोग उपक्रमों आगे कहे ( उपायों ) से शांत होते हैं । उन रोगों की शांति जप, देवताओं का पूजन, होम, और दान, देने से होती है ॥ ४ ॥
पूर्व जन्म में किया पाप नरक भोगने के अन्त में व्याधि रूप होकर दुःख देता है । उस की शान्ति जप आदि से करे ॥ ५ ॥
कुष्ठ, राजयक्ष्मा ( क्षयी-तपेदिक ) संग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र ( सूजाक ) मूगी, खांसी, अतीसार, और
| २ | शातातपस्मृतिः ॥ |
|---|
मूत्रकृच्छ्राश्मरीकासा अतीसारभगन्दरी ॥ ६ ॥
दुष्टव्रणंगण्डमाला पक्षाघातोऽक्षिनाशनम्।
इत्येवमादयोरोगा महापापोद्भवाःस्मृताः ॥ ७ ॥
जलोदरंयकृत्प्लीहा शूलशोफव्रणानिच ।
श्वासाजीर्णज्वरच्छर्द्दि भ्रममोहगलग्रहाः ॥ ८ ॥
रक्तार्बुदविसर्पाद्या उपपापोद्भवागदाः ।
दण्डापतानकश्चित्र वपुःकम्पविचर्चिकाः ॥ ९ ॥
वल्मीकपुण्डरीकाद्या रोगाःपापसमुद्भवाः ।
अर्शआद्यानृणांरोगा अतिपापाद्भवन्तिहि ॥ १० ॥
अन्येश्चबहवोरोगा जायन्तेवर्णसंकरात् ।
उच्यन्तेचनिदानानि प्रायश्चित्तानिचैक्रमात् ॥११॥
महापापेषुसर्वस्वं तदर्द्धमुपपातके ।
दद्यात्पापेषुषष्ठांशं कल्प्यंव्याधिबलाबलम् ॥ १२ ॥
अथसाधारणंतेषु गोदानादिषुकथ्यते ॥ १३ ॥
भगंदर ॥ ६ ॥ वा भयंकर फोड़ा, दुष्टघाव, गंडमाला, पक्षाघात, और नेत्रों का नाश इत्यादि रोग महापापों से पैदा होने वाले कहे हैं ॥७॥ सूजन को लिये फोड़े, जलोदर, यकृत् (दहिनी ओर पेट में मांस का गोला) प्लीहा (तिल्ली) शूल, मांस, अजीर्ण, ज्वर, वमन, भ्रम, मोह, (मूर्छा) गलग्रह (गले का पकड़ना) ॥ ८ ॥ रक्तार्बुद, विसर्प, इत्यादि रोग उपपातकों से पैदा होते हैं। दंडापतानक, (डंडे के समान शरीर तन जाय) कंपना, श्वेतकुष्ठ, खाज ॥ ९ ॥ वल्मीक, (गढ़े) पुंडरीक, (दाद का भेद) आदि रोग साधारण पापों से होते हैं। और अर्श (बवासीर) आदि रोग मनुष्यों को अतिपाप करने से होते हैं ॥ १० ॥ अन्य भी बहुत से रोग अनेक पापों के घाल मेल से होते हैं। उन के निदान कारण और प्रायश्चित्त क्रम से कहते हैं ॥ ११ ॥ महापातकों में सब धन उपपातकों में उस से आधा और अन्य पापों में अपने सब धन का छठा भाग दान करे उन में भी व्याधि की न्यूनाधिकता देख कर न्यूनाधिक की कल्पना करे ॥१२॥ अथ गोदान आदि में साधारण विचार कहते हैं ॥१३॥
भाषार्थसहिता ॥
३
गोदानेवत्सयुक्तागौः सुशीलाचपयस्विनी ।
सर्वस्वंयत्रदेयंस्यात्तत्रङ्च्छायदानहि ॥ १४ ॥
गोशतंतुयदादद्यात् सर्व्वाऽलङ्कारभूषितम् ।
वृषदानेशुभोऽनड्वा ञ्छुक्लाम्बरःसक्रांचनः ॥१५॥
धौरेयंहेमसंयुक्तं दद्याद्वस्त्रसमन्वितम् ।
दशधेनुसमंपुण्यं प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ १६ ॥
निवर्त्तनानिभूदाने दशदद्याद्विजातये ।
दशहस्तेनदण्डेन त्रिंशद्दण्डंनिवर्त्तनम् ॥ १७ ॥
दशतान्येवगोचर्म्म दत्वास्वर्गंमहीयते ।
सुवर्णशतनिष्केन्तु तदर्द्धाद्धेप्रमाणतः ॥ १८ ॥
अश्वदानेमृदुश्लक्ष्णमश्वंसीपस्करंदिशेत् ।
महिषींमाहिषेदाने दद्यात्स्वर्णाम्बरान्विताम् ॥१९॥
दद्याद्गजंमहादाने सुवर्णफलसंयुक्तम् ॥ २० ॥
लक्षसंख्यार्हणं पुष्पं प्रदद्याद्देवतार्चने ।
जहां सर्वस्व देने का मौका हो और सब देने की इच्छा न हो तो दरिद्र दशा में दूध देती हुई सुशीला बछड़ा से युक्त एक गौ का दान करने से सर्वस्व दान का फल जानो ॥ १४ ॥ यदि सम्पन्न होतो वस्त्र तथा आभूषणों से शोभायमान सौ गौओं का दान करे । बैल देने के अवसर पर श्वेत वस्त्र और सुवर्ण युक्त शुभ चिन्हों वाले बैल का दान करे ॥ १५ ॥
यदि सुवर्ण और वस्त्र सहित हृष्ट पुष्ट धुरंधर बैल का दान करे तो विद्वान् लोग दश गोदान के बराबर पुण्य कहते हैं ॥ १६ ॥ पृथिवी के दान में ब्राह्मण को दश निवर्त्तन भूमि देवे, दश हाथ के दंड से तीस दंड का एक निवर्त्तन होता है ॥ १७ ॥ दश निवर्त्तन को गोचर्म कहते हैं, इस गोचर्म प्रमाण भूमिका दान देकर मनुष्य स्वर्ग में पूजता है । सौ निष्क (तोला) के चौथाई २५ निष्क को सुवर्ण कहते हैं ॥ १८॥ घोड़े के दान में कोमल श्लक्ष्ण चिकने वा सुन्दर घोड़े को चढ़ने की सामग्री सहित देवे । भैंस के दान में सुवर्ण और वस्त्रों सहित भैंस को देवे ॥ १९ ॥ महादान में सुवर्ण और फल सहित हाथी को देवे ॥ २० ॥ देवता के पूजन में पूजा के निमित्त एक लाख फूल
एकादशजपेद्रुद्रान्दशांशंगुग्गुलैर्घृतैः ॥ २२ ॥
४ शातातपस्मृतिः ॥
दद्याद्द्विजसहस्राय मिष्टान्नंद्विजभोजने ॥ २१ ॥ रुद्रजाप्यंलक्षपुष्पैः पूजयित्वाचत्र्यम्बकम् । एकादशजपेद्रुद्रान्दशांशंगुग्गुलैर्घृतैः ॥ २२ ॥ हुत्वाभिषेचनंकुर्यान्मन्त्रैर्वरुणदैवतैः । शान्तिकेगणशान्तिश्च ग्रहशान्तिकपूर्विका ॥ २३ ॥ धान्यदानेशुभंधान्यं खारीषष्टिमितंस्मृतम् । वस्त्रदानेपट्टवस्त्र द्वयंकर्पूरसंयुतम् ॥ २४ ॥ दशपञ्चाष्टचतुर उपवेश्यद्विजान्शुभान् । तेषामनुज्ञयासर्वं प्रायश्चित्तमुपक्रमेत् ॥ २५ ॥ विधायवैष्णवंश्राद्धं संकल्प्यनिजकाम्यया । धेनुंदद्याद्द्विजातिभ्यो दक्षिणांचापिशक्तितः ॥२६॥ अलंकृत्ययथाशक्ति वस्त्रालङ्करणैर्द्विजान् । याचेद्दण्डप्रमाणेन प्रायश्चित्तंयथादितम् ॥ २७ ॥ तेषामनुज्ञयाकृत्वा प्रायश्चित्तंयथाविधि ।
और ब्राह्मणों के भोजन में एक सहस्र ब्राह्मणों को मिष्टान्न देवे ॥२१॥ रुद्र देवता के जप में एक लक्ष फूलों से महादेव जी का पूजन करके ग्यारह रुद्रों का जप करे तथा गुग्गुल और घी से दशांश ॥ २२ ॥ होम करके वरुण देवता वाले मन्त्रों से अभिषेक करे और शांति के कर्म मे ग्रहों की शांति करके गण देवताओं की शान्ति करे ॥ २३ ॥ अन्न के दान में साठ मन शुभ जौ चावल गेहूं अन्न देना कहा है । वस्त्र के दान में कपूर सहित रेशम के दो वस्त्र (धोती दुपट्टा) देने कहे हैं ॥२४॥ दश, पांच, आठ, अथवा चार, श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणों को बैठा कर उन की आज्ञा से सब प्रकार के प्रायश्चित्त का आरम्भ करे ॥ २५ ॥ विष्णुक श्राद्ध करके अपनी कामना के अनुसार संकल्प करके ब्राह्मणों को गौ और शक्ति के अनुसार दक्षिणा देवे ॥ २६ ॥ अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र और आभूषण द्वारा ब्राह्मणों को शोभायमान करके उन से दण्ड (पाप) के प्रमाणानुसार शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त को मांगे ॥२७॥ उन की आज्ञा से विधि पूर्वक प्रायश्चित्त करके फिर प्रायश्चित्त की पूर्त्ति के
भाषाऽर्थसहिता ॥ ५
पुनस्तान्परिपूर्णार्थं मर्चयेद्विधिवद्विजान् ॥ २८ ॥
दद्याद्व्रतानिनामानि तेभ्यःश्रद्धासमन्वितः ।
संतुष्टाब्राह्मणादद्युरनुज्ञांव्रतकारिणे ॥ २९ ॥
जपच्छिद्रंतपश्चिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि ।
सर्वंभवतिनिश्छिद्रं यस्यचेच्छन्तिब्राह्मणाः ॥ ३० ॥
ब्राह्मणायानिभाषन्ते मन्यन्तेतानिदेवताः ।
सर्वदेवमयाविप्रा नतद्वचनमन्यथा ॥ ३१ ॥
उपवासोव्रतंचैव स्नानंतीर्थफलंतपः ।
विप्रैस्सम्पादितंयस्य सम्पन्नंतस्यतत्फलम् ॥ ३२ ॥
सम्पन्नमितियद्वाक्यं वदन्तिक्षितिदेवताः ।
प्रणम्यशिरसाधार्यमग्निष्टोमफलंलभेतू ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणाजङ्गमंतीर्थं निर्मलंसार्वकामिकम् ।
तेषांवाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्तिमलिनाजनाः ॥ ३४ ॥
लिये उन ब्राह्मणों का विधिवत् पूजन करे ( अर्थात् जब प्रसन्न संतुष्ट हो कर ( संपूर्णमस्तु ) ऐसा आशीर्वाद देवें तो कार्य सफल होता है ) ॥ २८ ॥ प्रायश्चित्ती पुरुष अपने किये व्रत और नामों का श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों से निवेदन करे वा समर्पण करे कि यह सब आप लोगों का हो है । तब संतुष्ट हुए ब्राह्मण व्रत के करने वाले पुरुष को आज्ञा देवें कि तुम्हारा व्रत सफल हो ॥ २९ ॥ जप, तप, यज्ञ कर्म, इन में जो छिद्र ( न्यूनता ) होती है वह सब ब्राह्मणों की आज्ञा से पूर्ण हो जाती है ॥ ३० ॥ जो बात शुद्ध ब्राह्मण कहते हैं उसे देवता भी मानते हैं क्योंकि ब्राह्मण सब देवताओं के रूप हैं इस से उन का वचन अन्यथा [झूठा] नहीं हो सकता ॥३१॥ उपवास, व्रत, स्नान, तीर्थ का फल, ये सब जिसके ब्राह्मणों ने सफल कह दिये उस को इन का फल सिद्ध 'होजाता है ॥ ३२ ॥ जिस कर्म में भूमि के देवता ब्राह्मण ( सम्पन्नम् ) सिद्ध हुआ यह वाक्य कहदें उस वाक्य को प्रणाम करके जो शिर पर धारण करता है वह अग्निष्टोम यज्ञ के फल को प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ संपूर्ण कामनाओं के देने वाले ब्राह्मण लोग निर्मल जंगम ( चेतन ) तीर्थ हैं उन के वाक्य रूपी जल से ही मलिन जन शुद्ध होजाते हैं ॥ ३४ ॥
२
६ शातातपस्मृतिः ॥
तेभ्योऽनुज्ञामभिप्राप्य प्रतिगृह्यतथाशिषः । भोजयित्वाद्द्विजान्शक्त्या भुञ्जीतसहबन्धुभिः ॥३५॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके साधा- रणविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
ब्रह्महानरकस्यान्ते पाण्डुकुष्ठीप्रजायते । प्रायश्चित्तंप्रकुर्वीत सततंतत्प्रशान्तये ॥ १ ॥ चत्वारःकलशाःकार्याः पञ्चरत्नसमन्विताः । पञ्चपल्लवसंयुक्ताः सितवस्त्रेणसंयुताः ॥ २ ॥ अश्वस्थानादिमृद्युक्तास्तीर्थोदकसुपूरिताः । कषायपञ्चकोपेता नानाविधफलान्विताः ॥ ३ ॥ सर्व्वौषधिसमायुक्ताः स्थाप्याःप्रतिदिशंद्विजैः । रौप्यमष्टदलं पद्मं मध्यकुम्भोपरिन्यसेत् ॥ ४ ॥ तस्योपरिन्यसेद्देवं ब्रह्माणंचचतुर्मुखम् ।
उन ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर उन के आशीर्वाद को ग्रहण करके और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपने बन्धुओं सहित स्वयं भोजन करे ॥ ३५ ॥
यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद मे कर्मविपाक विषयक साधारण विधि रूप प्रथमाध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
ब्रह्महत्यारा पुरुष नरक भोग के अन्त में श्वेत कुष्ठी होता है इस लिये वह पुरुष उस पाप के शान्त्यर्थ प्रायश्चित्त करे ॥१॥ पांचों रत्न पांच पल्लव और श्वेत वस्त्रों से युक्त चार तांबे के कलश लीपे हुये शुद्ध स्थल में स्थापित करे ॥२॥ गोशाला घुड़शालादि की सात मट्टी कलशों के नीचे धरे तथा तीर्थों के जल से कलशों को भरे और पांच कषाय (कसैली वस्तु) और अनेक प्रकार के फलों से संयुक्त करे ॥३॥ सब औषधियों से युक्त करके पूर्वादि चारों दिशाओं में उनको स्थापित करे और बीच में स्थापित किये पांचवें कलश पर चांदी का आठ दल का कमल रक्खे ॥ ४ ॥ उस कमल पर छः मासे सुवर्ण से बनायी
भाषासंहिता ॥ ३
पलाद्धार्द्धप्रमाणेन सुवर्णेनवनिर्मितम् ॥ ५ ॥ अर्चयेत्पुरुषसूक्तेन त्रिकालंप्रतिवासरम् । यजमानःशुभैर्गन्धैः पुष्पैर्धूपैर्यथाविधि ॥ ६ ॥ पूर्वादिकम्भेषुततो ब्राह्मणा ब्रह्मचारिणः । पठेयुःस्वस्ववेदांस्त ऋग्वेदप्रभृतीञ्शनैः ॥ ७ ॥ दशांशेनततोहोमो ग्रहशान्तिपुरःसरम् । मध्यकुम्भेविधातव्यो घृताक्तैस्तलव्रीहिभिः ॥ ८ ॥ द्वादशाहमिदंकर्म्म समाप्यद्विजपुङ्गवः । भद्रपीठेयजमानमभिषिञ्चेद्यथाविधि ॥ ९ ॥ ततोदद्याद्यथाशक्ति गोभूहेमतिलादिकम् । ब्राह्मणेभ्यस्तथादेयमाचार्याययथाविधि ॥ १० ॥ आदित्यावसवोरुद्रा विश्वेदेवामरुद्गणाः । प्रीताःसर्वेव्यपोहन्तु ममपापंसुदारुणम् ॥ ११ ॥
चार मुखों वाली ब्रह्मा जी की प्रतिमा स्थापित करे ॥ ५॥ यजमान पुरुष प्रति दिन तीनों काल में पुरुष सूक्त (सहस्र शीर्षा०) इत्यादि मन्त्रों द्वारा सुन्दर गन्ध, पुष्प, धूपों से ब्रह्मा जी का विधिवत् पूजन करै ॥ ६ ॥ साथ ही पूर्वादि दिशाओं में स्थापित चारों घटों के समीप चार ब्रह्मचारी ब्राह्मण ऋग्वेद आदि अपने २ वेदों को सावधान चित्त होके पढ़ें। अर्थात् पूर्व में ऋग्वेद, दक्षिण में यजुः, पश्चिम में साम और उत्तर में अथर्ववेद का पाठ करें ॥ ७ ॥ फिर ग्रहशांति पूर्वक मध्यस्थकलश के समीप दशांश होम घी मिले तिल और व्रीहि धानों से करै ॥८॥ बारह दिन में उत्तम धर्म निष्ठा ब्राह्मण इस कर्म को समाप्त करा के कल्याण कारी पीढ़ा (आराम चौकी) पर बैठे हुये यजमान का विधि पूर्वक अभिषेक करै ॥९॥ फिर शक्ति के अनुसार गौ, भूमि, सुवर्ण, तिल इन पदार्थों का दान ब्राह्मणों को और आचार्य गुरु को यजमान श्रद्धा से देवे ॥१०॥ १२ आदित्य ८ वसु ११ रुद्र १३ विश्वेदेव और ४९ मरुद्गण ये सब गण देवता मुझ पर प्रसन्न होकर मेरे दारुण कठिन भयंकर पाप को निवृत्त करें ॥ ११ ॥
८ शातातपस्मृतिः ॥
इत्युदीर्य्यमुहुर्भक्त्या तमाचार्य्यंक्षमापयेत् ।
एवंविधानेविहिते श्वेतकुष्ठीविशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
कुष्ठोगोवधकारोस्यान्तरकान्तेऽस्यनिष्कृतिः ।
स्थापयेद्घटमेकन्तु पूर्वोक्तद्रव्यसंयुतम् ॥ १३ ॥
रक्तचन्दनलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पाम्बरान्वितम् ।
रक्तकुम्भन्तुतंकृत्वा स्थापयेद्दक्षिणांदिशम् ॥ १४ ॥
ताम्रपात्रंन्यसेत्तत्र तिलचूर्णेनपूरितम् ।
तस्योपरिन्यसेद्देवं हेमनिष्कमयंयमम् ।
यजेत्पुरुषसूक्तेन पापंमेशाम्यतामिति ॥ १५ ॥
सामपारायणंकुर्यात्कलशेतत्रसामवित् ।
दंशांशंसर्षपैर्हुत्वा पावमान्यभिषेचने ॥ १६ ॥
विहितेधर्मराजानमाचार्य्यायनिवेदयेत् ॥ १७ ॥
यमोऽपिमहिषारूढो दण्डपाणिर्भयावहः ।
इस प्रकार भक्ति श्रद्धा से बारंबार प्रार्थना करके गुरु जी से अपराध क्षमा करावे। ऐसा विधान करने से श्वेत कुष्ठी शुद्ध होजाता है ॥ १२ ॥ गोहत्या करनेवाला नरक भोग के अन्त जन्मान्तर में कुष्ठी होता है। उस समय निम्न प्रायश्चित्त करे- पूर्वोक्त पंचरत्नादि सहित एक कलश स्थापित करे ॥१३॥ उस पर लालचन्दन का लेपन कर कण्ठ में लाल वस्त्र लपेटे। ऊपर लाल पुष्प धरे। इस प्रकार कलश को रक्तवर्ण करके पूजन स्थान के दक्षिणभाग में स्थापित करे ॥ १४ ॥ कूटे हुए तिलों से भरा तांबे का पात्र उस कलश के ऊपर धरे उसके ऊपर एक तोला सुवर्ण से बनायी यमराज देवता की प्रतिमा स्थापित करके मेरा पाप शान्त हो, ऐसी प्रार्थना करके पुरुष सूक्त से यमदेवता का पूजन करे ॥१५॥ सामवेदी विद्वान् कलश के समीप में सामवेद का पारायण करे। इस प्रकार बारह दिन त्रिकाल पूजन करके अन्त में सर्षप-सरसों द्वारा दशांश का होम कर पावमानी ऋचाओं से ब्राह्मण लोग यजमान का अभिषेक करें ॥ १६ ॥ यह विधान होजाने पर धर्मराज की प्रतिमा आचार्य को देदेवे ॥ १७ ॥ दण्ड हाथ में लिये भैंसापर सवार दक्षिण दिशा के स्वामी भय कर यमराज मेरे पाप को