अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 649, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥
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गोदानेवत्सयुक्तागौः सुशीलाचपयस्विनी ।
सर्वस्वंयत्रदेयंस्यात्तत्रङ्च्छायदानहि ॥ १४ ॥
गोशतंतुयदादद्यात् सर्व्वाऽलङ्कारभूषितम् ।
वृषदानेशुभोऽनड्वा ञ्छुक्लाम्बरःसक्रांचनः ॥१५॥
धौरेयंहेमसंयुक्तं दद्याद्वस्त्रसमन्वितम् ।
दशधेनुसमंपुण्यं प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ १६ ॥
निवर्त्तनानिभूदाने दशदद्याद्विजातये ।
दशहस्तेनदण्डेन त्रिंशद्दण्डंनिवर्त्तनम् ॥ १७ ॥
दशतान्येवगोचर्म्म दत्वास्वर्गंमहीयते ।
सुवर्णशतनिष्केन्तु तदर्द्धाद्धेप्रमाणतः ॥ १८ ॥
अश्वदानेमृदुश्लक्ष्णमश्वंसीपस्करंदिशेत् ।
महिषींमाहिषेदाने दद्यात्स्वर्णाम्बरान्विताम् ॥१९॥
दद्याद्गजंमहादाने सुवर्णफलसंयुक्तम् ॥ २० ॥
लक्षसंख्यार्हणं पुष्पं प्रदद्याद्देवतार्चने ।
जहां सर्वस्व देने का मौका हो और सब देने की इच्छा न हो तो दरिद्र दशा में दूध देती हुई सुशीला बछड़ा से युक्त एक गौ का दान करने से सर्वस्व दान का फल जानो ॥ १४ ॥ यदि सम्पन्न होतो वस्त्र तथा आभूषणों से शोभायमान सौ गौओं का दान करे । बैल देने के अवसर पर श्वेत वस्त्र और सुवर्ण युक्त शुभ चिन्हों वाले बैल का दान करे ॥ १५ ॥
यदि सुवर्ण और वस्त्र सहित हृष्ट पुष्ट धुरंधर बैल का दान करे तो विद्वान् लोग दश गोदान के बराबर पुण्य कहते हैं ॥ १६ ॥ पृथिवी के दान में ब्राह्मण को दश निवर्त्तन भूमि देवे, दश हाथ के दंड से तीस दंड का एक निवर्त्तन होता है ॥ १७ ॥ दश निवर्त्तन को गोचर्म कहते हैं, इस गोचर्म प्रमाण भूमिका दान देकर मनुष्य स्वर्ग में पूजता है । सौ निष्क (तोला) के चौथाई २५ निष्क को सुवर्ण कहते हैं ॥ १८॥ घोड़े के दान में कोमल श्लक्ष्ण चिकने वा सुन्दर घोड़े को चढ़ने की सामग्री सहित देवे । भैंस के दान में सुवर्ण और वस्त्रों सहित भैंस को देवे ॥ १९ ॥ महादान में सुवर्ण और फल सहित हाथी को देवे ॥ २० ॥ देवता के पूजन में पूजा के निमित्त एक लाख फूल