अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २ | शातातपस्मृतिः ॥ |
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मूत्रकृच्छ्राश्मरीकासा अतीसारभगन्दरी ॥ ६ ॥
दुष्टव्रणंगण्डमाला पक्षाघातोऽक्षिनाशनम्।
इत्येवमादयोरोगा महापापोद्भवाःस्मृताः ॥ ७ ॥
जलोदरंयकृत्प्लीहा शूलशोफव्रणानिच ।
श्वासाजीर्णज्वरच्छर्द्दि भ्रममोहगलग्रहाः ॥ ८ ॥
रक्तार्बुदविसर्पाद्या उपपापोद्भवागदाः ।
दण्डापतानकश्चित्र वपुःकम्पविचर्चिकाः ॥ ९ ॥
वल्मीकपुण्डरीकाद्या रोगाःपापसमुद्भवाः ।
अर्शआद्यानृणांरोगा अतिपापाद्भवन्तिहि ॥ १० ॥
अन्येश्चबहवोरोगा जायन्तेवर्णसंकरात् ।
उच्यन्तेचनिदानानि प्रायश्चित्तानिचैक्रमात् ॥११॥
महापापेषुसर्वस्वं तदर्द्धमुपपातके ।
दद्यात्पापेषुषष्ठांशं कल्प्यंव्याधिबलाबलम् ॥ १२ ॥
अथसाधारणंतेषु गोदानादिषुकथ्यते ॥ १३ ॥
भगंदर ॥ ६ ॥ वा भयंकर फोड़ा, दुष्टघाव, गंडमाला, पक्षाघात, और नेत्रों का नाश इत्यादि रोग महापापों से पैदा होने वाले कहे हैं ॥७॥ सूजन को लिये फोड़े, जलोदर, यकृत् (दहिनी ओर पेट में मांस का गोला) प्लीहा (तिल्ली) शूल, मांस, अजीर्ण, ज्वर, वमन, भ्रम, मोह, (मूर्छा) गलग्रह (गले का पकड़ना) ॥ ८ ॥ रक्तार्बुद, विसर्प, इत्यादि रोग उपपातकों से पैदा होते हैं। दंडापतानक, (डंडे के समान शरीर तन जाय) कंपना, श्वेतकुष्ठ, खाज ॥ ९ ॥ वल्मीक, (गढ़े) पुंडरीक, (दाद का भेद) आदि रोग साधारण पापों से होते हैं। और अर्श (बवासीर) आदि रोग मनुष्यों को अतिपाप करने से होते हैं ॥ १० ॥ अन्य भी बहुत से रोग अनेक पापों के घाल मेल से होते हैं। उन के निदान कारण और प्रायश्चित्त क्रम से कहते हैं ॥ ११ ॥ महापातकों में सब धन उपपातकों में उस से आधा और अन्य पापों में अपने सब धन का छठा भाग दान करे उन में भी व्याधि की न्यूनाधिकता देख कर न्यूनाधिक की कल्पना करे ॥१२॥ अथ गोदान आदि में साधारण विचार कहते हैं ॥१३॥