अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 647, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीगणेशानमः ॥
अथशातातपस्मृतिप्रारम्भः
प्रायश्चित्तविहीनानां महापातकिनांनृणाम् ।
नरकान्तेभवेज्जन्म चिन्हाङ्कितशरीरिणाम् ॥ १ ॥
प्रतिजन्मभवेत्तेषां चिन्हंतत्पापसूचितम् ।
प्रायश्चित्तेकृतेयाति पश्चात्तापवतांपुनः ॥ २ ॥
महापातकजंचिन्हं सप्तजन्मनिजायते ।
उपपापोद्भवंपञ्च त्रीणिपापसमुद्भवम् ॥ ३ ॥
दुष्कर्मजानृणांरोगा यान्तिचोपक्रमैःशमम् ।
जप्यैःसुरार्चनैर्होमैर्दानैस्तेषांशमोभवेत् ॥ ४ ॥
पूर्वजन्मकृतंपापं नरकस्यपरिक्षये ।
बाधतेव्याधिरूपेण तस्यजप्यादिभिःशमः ॥ ५ ॥
कुष्ठंचराजयक्ष्माच प्रमेहोग्रहणीतथा ।
जिन ने प्रायश्चित्त नहीं किया ऐसे महापातकी मनुष्यों का नरक भोग के अन्त में महापातकों के चिन्हों से युक्त मनुष्य योनि में जन्म होता है ॥१॥
पातक को जताने वाले चिन्ह जन्म २ में उन लोगों के होते हैं । बार २ प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप करने से वे चिन्ह छूट जाते हैं ॥ २ ॥
महापातक का चिन्ह सात जन्म तक, उपपातक का पांच जन्म तक, और अन्य साधारण पापों का चिन्ह तीन जन्म तक प्रकट होता है ॥ ३ ॥
निन्दित कर्म से पैदा हुये रोग उपक्रमों आगे कहे ( उपायों ) से शांत होते हैं । उन रोगों की शांति जप, देवताओं का पूजन, होम, और दान, देने से होती है ॥ ४ ॥
पूर्व जन्म में किया पाप नरक भोगने के अन्त में व्याधि रूप होकर दुःख देता है । उस की शान्ति जप आदि से करे ॥ ५ ॥
कुष्ठ, राजयक्ष्मा ( क्षयी-तपेदिक ) संग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र ( सूजाक ) मूगी, खांसी, अतीसार, और