अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 646, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ गौतमस्मृतिः ॥
ष्वविभागः स्त्रीषु च संयुक्तास्वनाज्ञाते दशावरैः शिष्टैरूहव-
द्भिभिरलुब्धैः प्रशस्तं कार्यम् ॥ ९ ॥ चत्वारश्चतुर्णां पारगा
वेदानां प्रागुत्तमास्त्रयआश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रयएतान्
दशावरान् पांरषदित्याचक्षते, असंम्भवे चैतेषामश्रोत्रियो वै-
दविच्छिष्टो विप्रतिपत्तौ यदाह यतोऽयमप्रभवो भूतानां हिं-
सानुग्रहयोगेषु धम्मिंणां विशेषेण स्वर्गं लोकं धर्मविदाप्नो-
ति ज्ञानाभिनिवेशोऽस्यामिति धर्मो धर्मः ॥ १० ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
समाप्ता चेयं गौतमसंहिता ॥
क्षत्रियादि निर्वंश मनुष्यों का धन राजा लेवे। मूढ़ और नपुंसक सन्तानों को भोजन वस्त्रादि निर्वाहमात्र मिलना चाहिये। पर जड़ (मूढ़) का पुत्र अच्छा हो तो उसको धनका दायभाग मिलना चाहिये। नीचे वर्ण से उत्तम वर्ण की स्त्री में उत्पन्न हुए प्रतिलोम सन्तानों को शूद्रा पुत्र के समान भोजनादि के निर्वाहमात्र जीविका मिले। जल देने, आमदनी लेने, कोषकी रक्षा करने पकाये अन्न में और विवाहित स्त्रियों में से भाग लेने का अधिकार प्रतिलोमा-दि से हुए सन्तानों को नहीं है। यदि प्रायश्चित्तादि किसी विषय में हुए सं-देहका निर्णय धर्मशास्त्रों से न जानाजाय तो विधि पूर्वक गुरु मुखसे वेद पढ़े तर्कशास्त्र में प्रवीण निर्लोभी दश विद्वान् मिलके जो निर्णय करें वही प्रशस्त जानो ॥९॥ आद्योपान्त चारों वेदों को पढ़ने जानने वाले चार (ये चारा उत्तम कोटिमें) ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तीन उत्तम आश्रमी और तीन स्मार्त्तादि धर्म को भिन्न २ अंगोंमें यथावत् जानने वाले इन दश विद्वानों की दशावरा धर्मसभा कहाती है। इन दश का मिलना असम्भव हो तो यद्यपि विधि-पूर्वक जिसने वेद को न पढ़ा हो पर वेद का मर्म जानता हो अन्य शास्त्रों में शिक्षित हो ऐसा एक ही पुरुष धर्मविषयक परस्पर विरुद्ध दो पक्षोंमें जो कुछ कहे वही ठीक माना जावे क्योंकि वेदोक्त धर्म के अभाव में प्राणियों की स्थिति नहीं रह सकती न उत्पत्ति हो सकती है किन्तु प्रलय का मौका आ जाता है। हिंसा और दया के विभागों के लिये धर्मात्माओं में विशेष कर वेदोक्त धर्म का जानने वाला ही धर्मज्ञान और धर्म में तत्पर होने के कारण स्वर्गलोक को प्राप्त होता है। इसलिये वेद ही धर्म है ॥१०॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के ब्राह्मणसर्वस्व मासिक पत्रसम्पादक पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में उनतीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥
और यहगौतमसंहिता भी समाप्त हुई ॥ ओं शान्तिः ॥ ३ ॥