अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 645, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ १३
र्जितमवैद्येभ्यो वैद्यः कामं न दद्यात् ॥७॥ अवैद्याः समं विभ-
जेरन् ॥८॥ पुत्रा औरसक्षेत्रजदत्तकृत्रिमगूढोत्पन्नापविद्धा ऋ-
क्थभाजः कानीनसहोढपौनर्भवपुत्रिकापुत्रस्वयंदत्तक्रीता गो-
त्रभाजश्चतुर्थांशिनश्चौरसाद्यभावे ब्राह्मणस्य राजन्यापुत्रो
ज्येष्ठो गुणसंपन्नस्तुल्यांशभाग्ज्येष्ठांशहीमन्यदूराजन्यावैश्या-
पुत्रसमवाये स यथा ब्राह्मणीपुत्रेण क्षत्रियाञ्चेच्छूद्रापुत्रोऽप्यन-
पत्यस्य शुश्रूषुश्चेल्लभेत वृत्तिमूलमन्तेवासिविधिना सवर्णा-
पुत्रोऽप्यन्यायवृत्तो न लभेतेकेषां ब्राह्मणस्याऽनपत्यस्य श्रो-
त्रिया ऋक्थं भजेरन् राजेतरेषां जडक्लीबौ भर्त्तव्यावपत्यं ज-
डस्य भागार्हं शूद्रापुत्रवत् प्रतिलोमास्तूदकयोगक्षेमकृतान्ने-
देव उसमें न्यायानुसार उनका अधिकार नहीं है ॥७॥ वैद्य से भिन्न भाई अन्य मार्ग
से प्राप्त धन का बराबर विभाग कर लेवें ॥८॥ १-औरस-( विवाहिता स्त्री में
उत्पन्न ) २-क्षेत्रज-( वाग्दानान्तर पति के मरने पर देवर से उत्पन्न ) ३-दत्त
(गोदलिया) ४-कृत्रिम-(अपने किसी सजातीय गुण दोषज्ञ सुलक्षण पुत्र गुणयुक्त
को पुत्र नियत करे) ५-गूढोत्पन्न (जिसको स्त्री में किसी अज्ञात पुरुष से उत्पन्न
हुआ) ६-अपविद्ध (माता पिता वा अन्य किसी ने त्यागदिया हो-और बनादि
में जिस को पड़ा मिले तो वह उसी का है ) ये छःपुत्र पिता के धनके भागी
हैं । कानीन (विवाह से पहिले कन्या में उत्पन्न) सहोढ (विवाह के समय जो गर्भ
में हो) पौनर्भव (पुनर्भू स्त्री ने अन्य पुरुष से उत्पन्न किया) पुत्री का पुत्र, स्वयं-
दत्त ( जिस के माता पिता न रहे हों वा उन ने अकारण त्याग दिया हो
तब जिसके शरण में वह आवे ) क्रीत ( जिसके माता पिता को धनादि दे-
कर लिया हो) ये सब कानीनादि अपने गोत्र के माने जावें और अन्यों की
अपेक्षा चतुर्थांश के भागी हैं । ब्राह्मण पुरुष से ब्राह्मणी में उत्पन्न कोई पुत्र
न हो तो क्षत्रिया स्त्री में उत्पन्न पुत्र शुभगुण संयुक्त हो तो ज्येष्ठ माना
जाय और बराबर भाग उसको मिलें । परन्तु क्षत्रिया, वैश्या दोनों स्त्रियों
के पुत्र ब्राह्मण से हों तो ज्येष्ठांश का अधिक भाग किसी को न मिलेगा ।
यदि क्षत्रिय पुरुष से विवाहित वैश्य स्त्री में उत्पन्न हो तो वह ज्येष्ठांश का
भागी होगा । जिस द्विज के कोई अन्य पुत्र न हो तो विवाहित शूद्रा स्त्री
का पुत्र यदि शिष्य के समान पिता की सेवा शुश्रूषा करता हो तो भोजनादि
निर्वाह मात्र जीविका मिलने का अधिकारी है । और किन्हीं आचार्यों का
मत है कि सवर्णा स्त्री से उत्पन्न हुआ भी पुत्र कुमार्गी हो तो उसको कुछ
भी भाग न मिलना चाहिये । जिस ब्राह्मण के कोई सन्तान वा समीपी वा-
रिस ( दायभागी ) न हो उसका धन वेदपाठी ब्राह्मणों को मिलना चाहिये।