अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 644, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ गौतमस्मृतिः ॥
समं वा ज्यैष्ठिनेयेन यवीयसां प्रतिमातृ वा स्ववर्गे भाग विशेषः ॥ २ ॥
पितोत्सृजेत् पुत्रिकामनपत्योऽग्निं प्रजापतिं चेष्ट्वाऽस्मदर्थमपत्यमिति संवाद्याभिसन्धिमात्रात्पुत्रिकेत्येकेषां तत्संशयान्नोपयच्छेद्भ्रातृकाम् ॥ ३ ॥
पिण्डगोत्रर्षिसम्बन्धादृक्थं भजेरन् स्त्री चानपत्यस्य बीजं वा लिप्सेद् देवरवत्यन्यतो जातमभागम् ॥४॥
स्त्रीधनं दुहितृणामप्रत्तानामप्रतिष्ठितानां च भगिनी शुल्कं सोदर्याणामूर्ध्वं मातुः पूर्वं चैके ॥ ५ ॥
संसृष्टविभागः प्रेतानां ज्येष्ठस्य संसृष्टिनि प्रेतेऽसंसृष्टी ऋक्थभाक् विभक्तजः पित्र्यमेव ॥ ६ ॥ स्वयंम-
सके छोटे सहोदर भाइयों को मिले। अथवा प्रत्येक माता के ज्येष्ठ २ भाई को पिता यथोचित अधिक भाग देवे ॥ २ ॥
जिसके कोई पुत्र न हो किन्तु कन्या हो वह अग्नि और प्रजापति देवता के लिये आहुति देकर संकल्प करे कि इस कन्या को मैं पुत्र के स्थान में करता हूं जो पुत्र इस में होगा वही मेरा श्राद्धादि कर्म करेगा। कोई आचार्य कहते हैं कि ( इकरारनामा ) न करने पर मनसे मान लेने मात्र से भी कन्या उसकी पुत्रिका हो जाती है कि जिसके कोई पुत्र न हो। इसी कारण पिता की पुत्रिका हो जाने की शंका से उस कन्या से विवाह न करे जिसके कोई भाई न हो ॥ ३ ॥
जिसके पुत्र कन्या कोई भी न हो उसके धनादि को उसके सपिण्डवाले, वा सगोत्री अथवा वेद विद्या सम्बन्धी गुरु शिष्यादि लेवें और उसकी स्त्री को भी पति का धनादि मिलना चाहिये। अथवा स्त्री के कोई खास देवर हो तो वह नियोग विधि से वीर्य दान ले लेवे। अन्य गैर मनुष्य से सन्तान पैदा करे तो वह धन का भागी न होगा ॥ ४ ॥
जो माता का निज का स्त्रीधन हो उसको लेने का अधिकार बिना बिवाही या विवाहित दीन दुःखित लड़कियों का है। और सहोदर बहन के विवाह में कन्या के माता पिता ने जो धन लिया हो वह भी माता के मरने पर उन्हीं लड़कियों का होगा। कोई आचार्य कहते हैं कि माता की विद्यमानता में ही वह धन लड़कियों का हो जाता है ॥५॥
विभाग हो जाने पर फिर से जितने साफे में कोई व्यापार किया हो उनके मरजाने पर ज्येष्ठ भाई को उनका भाग मिलेगा। यदि ज्येष्ठ भी साझीदार हो के साथ ही समाप्त हो गया हो तो जो साझीदार नहीं थे उन अन्य भाइयों को वह भाग मिलना चाहिये। भाइयों का विभाग होजाने पर जो अन्य पुत्र उत्पन्न हो तो उसको वही धन का भाग मिलेगा जो पिता के अधिकार में हो ॥६॥ वैद्य भाई ने पैदा किये धन में से अपने अवैद्य भाइयों को भलेही भाग न