अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 641, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ६९
च्छ्रातिकृच्छ्रः ॥५॥ प्रथमं चरित्वा शुचिः पूतः कर्मण्यो भव- ति, द्वितीयं चरित्वा यत्किंचिदन्यन्महापातकेभ्यः पापं कुरुते तस्मान्मुच्यते, तृतीयं चरित्वा सर्वस्मादेनसो मुच्यते । अथैतां- स्त्रीन् कृच्छ्रान् चरित्वा सर्व्वेषु वेदेषु स्नातो भवति सर्व्वैर्द्दे- वैर्ज्ञातो भवति यश्चैवं वेद यश्चैवं वेद ॥ ६ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अथातश्चान्द्रायणं तस्योक्तो विधिः कृच्छ्रे वपनं व्रतं चरेत् श्वोभूतां पौर्णमासीमुपवसेत्-आप्यायस्व, संतेपयांसि, नवोनव, इति चैताभिस्तर्पणमाज्यहोमो हविष्प्रद्यानुमन्त्रण- मुपस्थानं चन्द्रमसो यद्देवा देवहेलनमिति चतसृभिश्चाज्यं जुहुयात्, देवकृतस्येति चान्ते समिद्भिः-ॐभूर्भुवः स्वस्तपः,-
छः दिनों में भी केवल जल ही पीकर रहे वह कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत कहाता है ये तीन प्रकार के कृच्छ्र कहाते हैं ॥ ५ ॥ पहिला कृच्छ्रव्रत का करने से शुद्ध पवित्र हुआ धर्म के यज्ञादि शुभ कर्म करने योग्य होता है । द्वितीय अति- कृच्छ्रव्रत का अनुष्ठान करके जो कुछ महापातकों से भिन्न उपपातकादि किये वा करता है उन सब से मुक्त हो जाता है । और तीसरे कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करके छोटे बड़े सभी पापोंने मुक्त शुद्ध निर्दोष होजाता है । और यदि इन तीनों कृच्छ्रों का एक साथ क्रमशः अनुष्ठान करे तो सब वेदों में निष्णात निपुण होता अर्थात् सब वेदों के पढ़ने के पुण्य फल का भागी होता, सब देवता उसको जानते और कृपादृष्टि करते हैं । और जो इन कृच्छ्रों की ऐसी महिमा को यथार्थ जानता है उस को भी यही फल प्राप्त होता है ॥६॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्ताईशवां अध्याय पूरा हुआ ॥२७॥
अब चान्द्रायण व्रत का जैसा विधान धर्मशास्त्रकारों ने कहा माना है सो कहते हैं । चतुर्दशी के दिन चान्द्रायण करने वाला केश शमश्रु सब का मुण्डन कराके केवल शिखामात्र रक्खे । और उसी दिन उपवास करे ओर (आ- प्यायस्वसमेतु० । संसृपयांसि० यजु० अ० १२ । ११२ । ११३ । नवो नवो भवति० ऋ० अ० ८ अ० ३ व० २३ ) इन तीन मन्त्रों से पौर्णमासी के दिन चन्द्रमा दे- वता के लिये तर्पण, घी का होम, हविष्य का अनुमन्त्रण, ( अर्थात् हविष्य