अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ गौतमस्मृतिः ॥
संहमाय धुन्वते तापसाय पुनर्वसवे नमोनमो मौञ्ज्यायो- र्म्याय वसुविन्दाय सर्वविन्दाय नमोनमः पाराय सुपाराय महापाराय पारयिष्णवे नमोनमो रुद्राय पशुपतये महते देवाय त्र्यम्बकायैकचराधिपतये हराय शर्वायेशानायोग्राय वज्रिणे घृणिने कपर्दिने नमोनमः सूर्यायादित्याय नमोनमो नीलग्रीवाय शितिकण्ठाय नमो नमः कृष्णाय पिङ्गलाय नमो नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय वृद्धायेन्द्राय हरिकेशायोर्ध्वरेतसे नमो नमः सत्याय पावकाय पावकवर्णाय नमो नमः कामाय का- मरूपिणे नमोनमो दीप्ताय दीप्तरूपिणे नमोनमस्तीक्ष्णाय तीक्ष्णरूपिणे नमोनमः सौम्याय सुपुरुषाय महापुरुषाय म- ध्यमपुरुषायोत्तमपुरुषाय नमोनमो ब्रह्मचारिणे नमोनमश्च- न्द्रललाटाय नमोनमः कृत्तिवाससे पिनाकहस्ताय नमोनम इति ॥ २ ॥ एतदेवादित्योपस्थानमेताएवाज्याहुतयो द्वादश- रात्रस्यान्ते चरुं श्रपयित्वैताभ्यो देवताभ्यो जुहुयात्-अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा, इन्द्राग्निभ्या- मिन्द्राय विश्वेभ्यो देवेभ्यो ब्रह्मणे प्रजापतयेऽग्नये स्विष्टकृत इति ॥ ३ ॥ ततो ब्राह्मणतर्पणम् ॥४॥ एतेनैवातिकृच्छ्रो व्या- ख्यातो यावत्सकृदाददीत तावदश्नीयादब्भक्षस्तृतीयः स कृ-
के साथ जल से शिव जी के लिये देवतर्पण करे ॥ २ ॥ इन्हीं मन्त्रों से सूर्यो- पस्थान तथा इन्हीं से घी की आहुति देवे यहां तक का सब कृत्य प्रतिपादन करे । कृच्छ्र व्रत के बारहवें दिन समाप्ति में गृह्यसूत्रोक्त विधि से चरु पका कर ( अग्नये स्वाहा ) इत्यादि मन्त्रों से चरु की दश आहुति देवे ॥ ३ ॥ इस के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजनादि से तृप्त करे ॥ ४ ॥ इसी क्रम से अति- कृच्छ्र व्रत का व्याख्यान जानो । उस में इतनी विशेषता है कि बीच के छः दिनों में जो भोजन कहा है सो उतना ही एक दिन में खावे कि जितना एक बार में मुख में खासके अर्थात् एक ग्रास मात्र एक दिन में भोजन करे तथा आगे पीछे तीन २ दिन सर्वथा उपवास करे । और जिस में बीच के