भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ६१

वाङ्मनसयोरपचारे व्याहृतयः संख्याताः पञ्च सर्वास्वपो- वाचामेदहश्च मादित्यश्च पुनातु स्वाहेति प्रातः, रात्रिश्च मा वरुणश्च पुनाविति सायमष्टौ वा समिधआदध्याद्देवकृत- स्येति हुत्वैवं सर्वस्मादेनसो मुच्यते मुच्यते ॥ ३ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षड्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २६ ॥

अथातः कृच्छ्रान् व्याख्यास्यामो हविष्यान्प्रातराशान् भुक्त्वा तिस्रो रात्रीर्नाश्नीयादथापरं त्र्यहं नक्तं भुञ्जीत, अ- थापरं त्र्यहं न कंचन याचेदथापरं त्र्यहमुपवसेत्तिष्ठेदहनि रात्रावासीत क्षिप्रकामः सत्यं वदेदनार्यैन संभाषेत रौरवयौ- धाजिने नित्यं प्रयुञ्जीतानुसवनमुदकोपस्पर्शनमापोहिष्ठे- ति तिसृभिः पवित्रवतीभिर्मार्जयेत्, हिरण्यवर्णाः शुचयः पा- वकाइत्यष्टाभिः॥१॥अथोदकतर्पणम्-ॐनमोह्माय मोह्माय


प्रातःकाल तथा ( रात्रिश्चमा० ) मन्त्र से सायंकाल में होम करे । अथवा दो मन्त्र ये और ( देवकृतस्यै० यजु० अ०८ । १३ ) के छः मन्त्र इन सब से आठ समिधा अग्नि में चढ़ावे ऐसा करने से सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥३॥

यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में छब्बीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥

अब यहां से आगे कृच्छ्रव्रतों का व्याख्यान करेंगे। प्रातःकाल पहिले प्रारम्भ के दिन हविष्यान्न भोजन करके आगे तीन रात्री बीतने तक कुछ भोजन न करे । इसके पश्चात् तीन दिन रात्रि में भोजन करे । इसके पश्चात् तीन दिन किसी से कुछ याचना करके न खावे किन्तु यदि बिना मांगे जो मिले वही खा लेवे । इस के बाद तीन दिन उपवास करे कुछ न खावे, दिन में खड़ा रहे रात में बैठा रहे । शीघ्र ही पाप निवृत्ति और शुभफल प्राप्ति चाहता हो तो सत्य ही बोले और शूद्रादि नीचों के साथ संभाषण न करे । रुरु (रोज) और योध नामक मृगों के चम वस्त्र की जगह ओढ़े । सायं प्रातः और मध्यान्ह में तीनों बार ( आपोहिष्ठा० ) इत्यादि तीन मन्त्रों से स्नान करे और ( हिरण्यवर्णाः शुचयः पावकाः० ) इत्यादि आठ मन्त्रों से नित्य मार्जन करे ॥ १ ॥ फिर ( ओं नमोहमाय० ) इत्यादि मन्त्रों को पढ़ता हुआ प्रत्येक नमः